सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना

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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

अनुदान का खतरनाक खेल

हिन्दुस्तानी सियासत में नकद अनुदान के मुद्दे पर इन दिनों घमासान का आलम है। सबसे बुजुर्ग पार्टी कांग्रेस का मानना है कि नव उदारवाद के इस दौर में नकद अनुदान के सहारे ही समाज के कमजोर तबके की स्थिति सुधारी जा सकती है। जबकि, मुख्य विपक्षी भाजपा और उसके सहयोगी संगठन इसे कांग्रेस की चुनावी नौटंकी बता रहे हैं। वे कहते हैं कि नकद अनुदान का लालच दे कर कांग्रेस गांव-गांव में कार्यकर्ता बनाने की कोशिश कर रही है। इस जुबानी जंग और मतभेद के बीच सबसे बड़ी समानता यह है कि नव उदारवाद समर्थक ये दोनों पार्टियां कम से कम अनुदान को जायज मान रही हैं। यानी गरीबों को अनुदान दिए जाने के खिलाफ नहीं हैं।
मेरी राय इनसे इतर है। मेरी समझ से देश में 'अनुदान' एक खतरनाक खेल बन चुका है। इसके सहारे नव उदारवाद की वकालत करने वाली पार्टियां सियासी रोटी सेंक रही हैं। साथ ही वह पूंजीवाद को मजबूती देना चाह रही हैं। इस गहरी चाल से अपना देश कई अर्थों में कमजोर होता जा रहा है। हर गांव और हर आदमी अब अनुदान के खेल में उलझा हुआ है। वह संघर्ष करना और हक की लड़ाई लडऩा भूलता जा रहा है। किसी तरह अनुदान मिल जाए, वह इसी सोंच में डूबा रहता है। वहीं, अनुदान के इस नापाक खेल से पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार की नींव मजबूत हुई हैं।
बिहार में डीजल अनुदान इसका जीवंत उदाहरण है। आप इसके सहारे अनुदान के खेल को आसानी से समझ सकते हैं। एक किसान जिसके खेत बिजली और पानी के अभाव में सूख जाते हैं। फसलें चौपट हो जाती हैं। प्राय: हर साल ऐसा होता है। लेकिन वह समस्या के स्थाई निदान के लिए व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं लडऩा चाहता है। संघर्ष की बातें नहीं करना चाहता है। नहर में पानी और खेती के लिए 24 घंटे बिजली देने की मांग सरकार से नहीं करता है। वह नुकसान के बदले सिर्फ मुआवजे की मांग करता है। सरकार भी अनुदान देने की घोषणा कर उन्हें उलझा देती हैं। फिर अनुदान का सियासी खेल शुरू होता है। किसान अनुदान के लिए पंचायत से प्रखंड तक चक्कर लगाता है। दलालों की मदद लेता है। अंत में कुछ रुपये उसके हाथ लगते हैं, और वह सारे गम भूल जाता है। हर साल यही पटकथा दोहराई जाती है।
दरअसल, पूंजीवाद समाज के एक तबके को पंगु बनाकर रखना चाहता है। समवेत विकास में उसकी कोई आस्था नहीं होती। 1990 से पूर्व देश में किसान जिस मर्दाना तेवर के साथ हक के लिए लड़ते थे, व्यवस्था परिवर्तन की बात सोचते थे, वह अब कहां दिखता है? कई छोटी पार्टियों के तेवर अब कमजोर पड़ते जा रहे हैं, क्योंकि पूंजीवाद जनसंघर्षों को धीरे धीरे निगल रहा है। दरअसल, अनुदान वह पूंजीवादी चारा है जिसके सहारे आसानी से व्यवस्था को पंगु बनाया जा सकता है। यह लोकतंत्र को मजबूत करने वाले जनप्रतिरोध को कमजोर ही नहीं पूरी तरह अपाहिज बना देता है। हर क्षेत्र में अनुदान, बात बात में अनुदान कहीं न कहीं भारतीय लोकतंत्र के लिए घातक है। अपने देश व राज्य में कायदे से बुनियादी ढांचा को और मजबूत और बेहतर करने की जरूरत है, ताकि हर कोई साधन संपन्न हो सके। किसी भी व्यक्ति को अनुदान देने और लेने की जरूरत नहीं पड़े। (सोपान स्‍टेप में प्रकाशित)
- एम. अखलाक

उखड़े खंभे

कहानी - हरिशंकर परसाई  
नाट्य अनुवाद व निर्देशन - एम. अखलाक 
गीत - जयराम शुक्‍ल, अदम गोंडवी व अज्ञात
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सूत्रधार का नाचते हुए मंच पर प्रवेश
सूत्रधार और कोरस मंडली -
नहीं सुनाएं भजन कीर्तन नहीं गान व तान,
नहीं दिखाएं नाटक वाटक न कोई मंच मचान।
हम तो सच बतलाने आए
सच ही सच दिखलाने आए,
सच कहना जो पागलपन है
समझो हम पगलाने आए।
(नाल पर थाप के साथ अखबार बेचने वाले की इंट्री होती है।) 
अखबारवाला -
आज की ताजा खबर, आज की ताजा खबर। मनरेगा में छह सौ करोड़ का घोटाला।
आज की ताजा खबर, आज की ताजा खबर। सूबे में शराब पीने से 50 लोगों की मौत।
आज की ताजा खबर, आज की ताजा खबर। अधिकारी का बेटा घुस लेते गिरफ्तार।
आज की ताजा खबर, आज की ताजा खबर (धीरे-धीरे स्‍वर कम होता चला जाता है।) 
(मंच पर लोग बातचीत कर रहे हैं।)
आदमी एक - अरे भइया, पूछिए मत, किसी भी दफ्तर में चले जाइए, बिना रिश्‍वत काम नहीं होता।
आदमी दो - हां, कल प्रखंड कार्यालय में जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए गया था, वहां भी कर्मचारी घूस मांग रहे थे।
आदमी तीन - हां भइया, बात तो आप बिल्‍कुल ठीक कह रहे हैं। कोई किसी की सुनने वाला नहीं है।
आदमी चार - आप नहाने की बात कह रहे हैं। यहां तो पीने के लिए भी पानी नसीब नहीं है। तीन दिन से नहीं नहाए हैं। देह में खुजली हो रही है।
आदमी पांच - अब देखिए ना, गलत बिजली बिल भेज दिया। जब सुधरवाने के लिए बिजली आफ‍िस गए तो वहां भी कर्मचारी घूस मांगने लगे।
आदमी छह - यही हाल तो रेलवे स्‍टेशन पर भी है। बिना दलाल के टिकट तक नहीं मिलता।
महिला एक - अरे प्रीति जानती हो, मुजफ्फरपुर में दो महीना से एक लड़की गायब है। पुलिस नहीं खोज पा रही है।
महिला दो - हां दीदी, कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति बड़ी खराब है। गांव गांव में शराब बिक रहा है। लड़कियों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है।
 
(मुनादी की आवाज सुनाई देती है, सभी चौंककर देखते हैं। उसके पीछे पीछे जाते हैं।)
 
मुनादी वाला - सुनो सुनो सुनो....। राजा का हुक्‍म सुनो...।  राजा ने कहा है, राज्‍य के सभी मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटका दिया जाएगा।
(मुनादी वाला प्रस्‍थान कर जाता है। मंच पर भीड़ है। कोलाहल है। एक बिजली खंभे के नीचे लोग आपस में बातचीत कर रहे हैं।)
 
भीड़ - वाह भइया, अब जाके राजा जी ने सही कदम उठाया है।
भीड़ - हां भइया, राजा का हुक्‍म बिल्‍कुल सही है।
भीड़ - हां हां, मुनाफाखोरों ने जीना हराम कर दिया है।
भीड़ - भइया, यहां तो बस कहने को सरकार है।
भीड़ - तब क्‍या, चारों ओर भ्रष्‍टाचार का बोल-बाला है।
भीड़- मुखिया से मंत्री तक, कलकटर से चपरासी तक बिना घूस लिए काम नहीं करते।
भीड़ - अरे भाई, तभी तो राजा ने मुनाफाखोरों को बिजली के खंभे से लटकाने की घोषणा की है।
भीड़ का समवेत स्‍वर - प्रेम से बोलो खंभा जी महाराज की जय।
(देखते-देखते लोग बिजली के खंभे की पूजा करना शुरू कर देते हैं। आरती उतारी जाती है।)
(नाल पर थाप के साथ परिवेश बदलता है।
शाम का समय। लोग बेचैन हैं।)
आदमी - अरे मुनिलाल, देख तो घड़ी में क्‍या बज रहे हैं।
आदमी - पांच बजने वाले हैं, भइया।
आदमी - अरे अभी तक कोई आया नहीं।
आदमी - हां, मुनाफाखोर कब टांगे जाएंगे समझ में नहीं आता।
आदमी - अरे, हम तो यही देखने के लिए आज काम पर भी नहीं गए। लगता है दिन बेकार जाएगा।
आदमी - कहीं, मुनादी वाला मजाक तो नहीं कर रहा था।
आदमी - चुप कर, राजा का आदमी कभी झूठ बोलेगा। साले को राजा जी फांसी पर चढ़ा देंगे।
आदमी - चलो, राजा के पास चलते हैं।
भीड़ - हां, हां चलो भाइयों, चलो।
(कुर्सी पर राजा विरजमान हैं। भीड़ खड़ी है।)
गीत --- 
रउरा शासन के नइखे जवाब भाई जी,
राउर कुर्सी से झरेला गुलाब भाई जी।
 
आदमी - महाराज, आपने तो कहा था कि मुनाफाखोर बिजली के खम्भे से लटकाये जाएंगे।
आदमी - महाराज, खम्भे तो वैसे ही खड़े हैं।
आदमी -  और मुनाफाखोर स्वस्थ और सानन्द हैं।राजा - कहा है तो उन्हें खम्भों पर टाँगा ही जाएगा।
आदमी - महाराज, लेकिन ऐसा कब होगा।
राजा - धैर्य रखो, थोड़ा समय लगेगा।
आदमी - महाराज, लेकिन कब तक। 
राजा - टाँगने के लिये फन्दे चाहिये। मैंने फन्दे बनाने का आर्डर दे दिया है। उनके मिलते ही सब मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से टाँग दूँगा।
आदमी - पर, सुना है महाराज, फन्दे बनाने का ठेका भी एक मुनाफाखोर ने ही लिया है।
राजा - तो क्या हुआ? उसे उसके ही फन्दे से टाँगा जाएगा।
आदमी - पर वह तो कह रहा था कि फाँसी पर लटकाने का ठेका भी मैं ही ले लूँगा।
राजा - नहीं, ऐसा नहीं होगा। फाँसी देना निजी क्षेत्र का उद्योग अभी नहीं हुआ है।
आदमी - (समवेत स्‍वर में)  तो कितने दिन बाद वे लटकाए जाएंगे।
राजा - आज से ठीक सोलहवें दिन वे तुम्हें बिजली के खम्भों से लटके दीखेंगे।
(नाल पर थाप के साथ सूत्रधार आता है। दृश्‍य बदलता है। मंच से राजा की कुर्सी हट हो जाती है। लोग दिन गिनने लगे।)
सूत्रधार -
नहीं सुनाएं भजन कीर्तन नहीं गान व तान,
नहीं दिखाएं नाटक वाटक न कोई मंच मचान।
हम तो सच बतलाने आए
सच ही सच दिखलाने आए,
सच कहना जो पागलपन है
समझो हम पगलाने आए।
 
 
(नाल पर थाप के साथ सीन बदलता है। सुबह का समय है। लोग मुंह हाथ धो रहे हैं।) 
 
 
आदमी - अरे यह क्‍या हुआ। बिजली के सारे खम्भे उखड़े पड़े हैं।
आदमी - हां, रात न आँधी आयी न भूकम्प आया, फिर ये खम्भे कैसे उखड़ गये!
आदमी - आज तो सोलहवा दिन है। राजा ने आज ही तो लटकाने की बात कही थी।
आदमी - हां, लेकिन अब क्‍या होगा।
आदमी - अरे वो देखो, खंभे के पास मजदूर खड़ा है। चलो उससे पूछते हैं।
आदमी - अरे भाई, यहां के बिजली के खंभे कहां गए।
मजदूर - मजदूरों से रात को ये खम्भे उखड़वाये गये हैं।
आदमी - अरे, ऐसा कैसे हो सकता है। तुम्‍हे पता है आज खंभों पर मुनाफाखोर लटकाए जाने वाले थे। राजा ने हुक्‍म दिया था।
आदमी - अरे, पकड़ कर ले चलो इसे राजा के पास।
 
(दृश्‍य बदलता है। राजा का दरबार। लोग मजदूर के साथ उपस्थित हैं।)
 
गीत --- 
रउरा शासन के नइखे जवाब भाई जी,
राउर कुर्सी से झरेला गुलाब भाई जी।

आदमी - महाराज, आप मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से लटकाने वाले थे, पर रात में सब खम्भे उखाड़ दिये गये। हम इस मजदूर को पकड़ लाये हैं। यह कहता है कि रात को सब खम्भे उखड़वाये गये हैं।
राजा - (मजदूर से) क्यों रे, किसके हुक्म से तुम लोगों ने खम्भे उखाड़े?”
मजदूर - सरकार, ओवरसियर साहब ने हुक्म दिया था।
राजा - ओवरसियर को बुलाया जाए।
अरदली - ओवरसियर हाजिर हो। 
राजा - क्यों जी तुम्हें मालूम है, मैंने आज मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटकाने की घोषणा की थी?
ओवरसियर - जी सरकार!
राजा - फिर तुमने रातों-रात खम्भे क्यों उखड़वा दिये?
ओवरसियर - सरकार, इंजीनियर साहब ने कल शाम हुक्म दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ दिये जाएं।
राजा - इंजीनियर को बुलाया जाए।
अरदली - इंजीनियर हाजिर हो।
इंजीनियर - सरकार, बिजली इंजीनियर ने आदेश दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ देना चाहिये।
राजा - बिजली इंजीनियर को बुलाया जाए।
अरदली - बिजली इंजीनियर हाजिर हो।
बिजली इंजीनियर - (हाथ जोड़कर) सेक्रेटरी साहब का हुक्म मिला था।
राजा - सेक्रेटरी को बुलाया जाए।
अरदली - सेक्रेटरी हाजिर हो।
राजा - खम्भे उखाड़ने का हुक्म तुमने दिया था।
सेक्रेटरी - जी सरकार! मैंने।
राजा - यह जानते हुए भी कि आज मैं इन खम्भों का उपयोग मुनाफाखोरों को लटकाने के लिये करने वाला हूँ, तुमने ऐसा दुस्साहस क्यों किया।
सेक्रेटरी - साहब, पूरे शहर की सुरक्षा का सवाल था। अगर रात को खम्भे न हटा लिये जाते, तो आज पूरा शहर नष्ट हो जाता!
राजा - यह तुमने कैसे जाना? किसने बताया तुम्हें?
सेक्रेटरी - मुझे विशेषज्ञ ने सलाह दी थी कि यदि शहर को बचाना चाहते हो तो सुबह होने से पहले खम्भों को उखड़वा दो।
राजा - कौन है यह विशेषज्ञ? भरोसे का आदमी है?
सेक्रेटरी - बिल्कुल भरोसे का आदमी है सरकार। घर का आदमी है। मेरा साला होता है। मैं उसे हुजूर के सामने पेश करता हूँ।
अरदली - विशेषज्ञ हाजिर हो।
विशेषज्ञ - सरकार, मैं विशेषज्ञ हूँ और भूमि तथा वातावरण की हलचल का विशेष अध्ययन करता हूँ। मैंने परीक्षण द्वारा पता लगाया है कि जमीन के नीचे एक भयंकर प्रवाह घूम रहा है। मुझे यह भी मालूम हुआ कि आज वह बिजली हमारे शहर के नीचे से निकलेगी। आपको मालूम नहीं हो रहा है, पर मैं जानता हूँ कि इस वक्त हमारे नीचे भयंकर बिजली प्रवाहित हो रही है। यदि हमारे बिजली के खम्भे जमीन में गड़े रहते तो वह बिजली खम्भों द्वारा ऊपर आती और उसकी टक्कर अपने पावरहाउस की बिजली से होती। तब भयंकर विस्फोट होता। शहर पर हजारों बिजलियाँ एक साथ गिरतीं। तब न एक प्राणी जीवित बचता, न एक इमारत खड़ी रहती। मैंने तुरन्त सेक्रेटरी साहब को यह बात बतायी और उन्होंने ठीक समय पर उचित कदम उठाकर शहर को बचा लिया।
समवेत स्‍वर - बाप रे, चलो अच्‍छा हुआ। जान बची।
राजा - तो भाइयो, अब आप ही बताइए, ऐसी स्थिति में क्‍या किया जाए।
समवेत स्‍वर - कोई बात नहीं महाराज। प्रजा आपके साथ है। प्रजा आपके साथ है।
(भीड़ धीरे धीरे प्रस्‍थान कर रही होती है तभी...)
विशेषज्ञ - तो महाराज देखी आपने मेरी विशेषज्ञता। आखिर आपके राज्‍य का विशेषज्ञ हूं। आपका खाता हूं तो आपका गाना ही पड़ेगा।
राजा - शाबाश। बहुत अच्‍छा किया। तुम्‍हे जरूर इनाम मिलेगा।
 
(भीड़ राजा व विशेषज्ञ की बात सुनकर चौंक जाती है। लोगों के चेहरे के भाव बदल जाते हैं। सीन फ्रीज हो जाता है।)
 
सूत्रधार - दोस्‍तों, देखा आपने। यह सत्‍ता का असली चेहरा है। लोग अब राजा के हुक्‍म और मुनाफाखोरों को भूल गए हैं। खबर है कि मुनाफाखोरों ने इस एवज में बड़ी रकम चुकाई है। सेक्रेटरी की पत्नी के नाम- २ लाख रुपये, श्रीमती बिजली इंजीनियर के नाम १ लाख, श्रीमती इंजीनियर के नाम १ लाख, श्रीमती विशेषज्ञ के नाम २५ हजार, श्रीमती ओवरसियर के नाम ५ हजार रुपये बैंक खातों में जमा करा दिए गए हैं।
 
हां, ‘मुनाफाखोर संघ’  ने ‘धर्मादा’ खाते में भी दान पुण्‍य किया है। कोढ़ियों की सहायता के लिये २ लाख, विधवाश्रम के लिए १ लाख, क्षय रोग अस्पताल के लिए १ लाख, पागलखाने के लिए २५ हजार, अनाथालय के लिए ५ हजार और तवायफों के कल्‍याण के लिए दस हजार रुपये दान स्‍वरूप दिया है।
 
जाइए, अब आप भी विश्राम कीजिए। एक मिनट- लेकिन सोचिएगा, यह व्‍यवस्‍था कैसे बदलेगी।
 
गीत -
जितने हरामखोर थे कुर्बो जवार में
प्रधान बन के आ गए अगली कतार में।
काजू भूनी प्‍लेट में विस्‍की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में।।
 
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समाप्‍त
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बुधवार, 5 जून 2013

महिला शौचालय के लिए तरसे बापू के गांव

पंचायतीराज और महिलाएं- 4
समुचित विकास के लिए जेंडर बजट बनाने वाले बिहार में लैंगिक असमानता चरम पर है। शहर से गांव तक स्‍थिति बेहद खराब है। अगर सियासी भागीदारी की बात छोड़ दें तो महिलाओं को पुरुषों के बराबर कई क्षेत्रों में संसाधन और अवसर नहीं मिल रहे हैं। यह हालत तब है जबकि पंचायतों में 50 फीसद, पुलिस में 35 फीसद और सहकारी संस्‍थाओं में 50 फीसद महिला आरक्षण का राज्‍य सरकार ने प्रावधान कर रखा है। उदाहरण के तौर पर पंचायतीराज व्‍यवस्‍था से जुड़ी महिलाओं की एक गंभीर समस्‍या पर नजर दौड़ाई जाए तो लैंगिक असमानता की भयावह तस्‍वीर दिखती है। पंचायतों, नगर पंचायतों, प्रखंड कार्यालयों और जिला मुख्‍यालयों में 'महिला शौचालय' जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्‍ध नहीं है। महिलाओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
क्‍या है गांवों की तस्‍वीर
आइए, आपको मुजफ्फरपुर जिले की कुछ तस्‍वीरें दिखाते हैं। ऐसी तस्‍वीरें सूबे के तमाम जिलों में दिख जाएंगी। गायघाट प्रखंड की बलौरनिधि पंचायत की मुखिया हैं पुनीता देवी। इनसे पहले मुखिया थीं शोभा देवी। इस पंचायत पर महिलाओं का कब्‍जा रहा है। लेकिन पंचायत भवन परिसर तथा उसके आसपास कोई महिला शौचालय नहीं है। इसी प्रखंड की लदौर पंचायत के मुखिया हैं दीपक कुमार झा। उनकी पंचायत में चार महिला वार्ड सदस्‍य, एक महिला विकास मित्र और एक महिला पंचायत समिति सदस्‍य हैं। लेकिन इन महिला जनप्रतिनिधियों के लिए यहां भी महिला शौचालय नदारद है। इतना ही नहीं गायघाट प्रखंड मुख्‍यालय का भी यही हाल है। साहेबगंज प्रखंड की विशुनपुर कल्‍याण पंचायत की मुखिया रंभा देवी, अहियापुर पंचायत की मुखिया गायत्री देवी, बासदेवपुर सराय की मुखिया मीना देवी और राजेपुर की मुखिया कबूतरी देवी कहती हैं कि प्रखंड क्षेत्र में 21 ग्राम पंचायतें हैं। किसी भी पंचायत में महिला शौचालय की व्‍यवस्‍था नहीं है। इस प्रखंड में एक नगर पंचायत भी है। यहां की मुख्‍य पार्षद किरण देवी हैं। बताती हैं कि यहां पुरुषों के लिए दो शौचालय बनाए गए हैं,  लेकिन महिलाओं के लिए एक भी नहीं। औराई प्रखंड की अतरार पंचायत की मुखिया अंजू देवी और घनश्‍यामपुर की मुखिया मंजू देवी कहती हैं कि पंचायतों की बात तो दूर प्रखंड मुख्‍यालय में भी महिला शौचालय की व्‍यवस्‍था नहीं है। जब जरूरत पड़ती है तो महिलाएं आसपास के घरों में या दूर झाड़ियों में चली जाती हैं। कुढ़नी प्रखंड की दरियापुर कफेन के मुखिया रामेश्‍वर महतो के अनुसार, पंचायत में छह महिला जनप्रतिनिधि हैं। चूंकि किसी पंचायत में महिलाओं के लिए अलग शौचालय की व्‍यवस्‍था नहीं है, इसलिए यहां भी नहीं है। प्रमुख संघ के नेता सह सकरा प्रखंड के प्रमुख श्‍याम कल्‍याण कहते हैं कि सार्वजनिक स्‍थानों पर महिला शौचालय का नहीं होना अमानवीय पहलू है। यह मानवाधिकार का उल्‍लंघन भी है। पंचायतों और प्रखंडों की बात तो दूर जिले के किसी भी सरकारी कार्यालयों में महिला शौचालय की व्‍यवस्‍था नहीं है। इस समस्‍या का निदान खुद पंचायतों और नगर पंचायतों को करना चाहिए। वैसे, प्रमुख संघ भी इसे आंदोलन का मुद्दा बनाएगा।

निर्मल ग्राम का भी बुरा हाल
चौंकाने वाली बात यह है कि जिन पंचायतों को निर्मल ग्राम का पुरस्‍कार मिल चुका है, वहां भी महिला शौचालय नहीं बने हैं। कांटी व मड़वन प्रखंड की महिलाओं ने पिछले साल प्रखंड विकास पदाधिकारियों का घेराव किया था। उनका आरोप था कि प्रखंड क्षेत्र में कहीं भी महिला शौचालय नहीं है। जबकि प्रखंड विकास पदाधिकारियों का कहना था कि शौचालय बनने के बाद ही पंचायतों को निर्मल ग्राम का पुरस्‍कार मिला है। खैर, महिलाओं के आंदोलन के बाद मुखियों पर कार्रवाई भी हुई। स्‍वयंसेवी संस्‍था निर्देश की परियोजना पदाधिकारी रंभा सिंह कहती हैं कि महिला शौचालय निर्माण के प्रति प्रशासन और पंचायत प्रतिनिधियों का गंभीर नहीं होना इस बात का सुबूत है कि लैंगिक असमानता चरम पर है। इस समस्‍या को जड़ से खत्‍म करना होगा, तभी समाज का समुचित विकास हो पाएगा।
पंचायतों को करनी होगी पहल
दरअसल, स्वस्थ समाज के लिए लैंगिक समानता जरूरी है। स्त्री और पुरुष के देहगत विभेद से ऊपर उठने के बाद ही स्वस्थ-समतामूलक समाज का निर्माण किया जा सकता है। यह बात ध्यान रखनी होगी कि लैंगिक समानता तथा संवेदनशीलता की गारंटी केवल पंचायतीराज व्‍यवस्‍था में महिलाओं की भागीदारी और उनकी संख्या से नहीं मिल सकती। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पंचायतीराज व्‍यवस्‍था लैंगिक संवेदनशीलता तथा उसकी नीतियों और संरचना के महत्व को कितना समझती हैं। महिला समाख्‍या सोसाइटी की जिला समन्‍वयक पूनम कुमारी कहती हैं कि पंचायतों को रणनीति बनाकर अपने यहां महिला शौचालय का निर्माण कराना चाहिए। खासकर जहां महिला मुखिया हैं उन्‍हें उदाहरण पेश करने की जरूरत है। इससे अन्‍य पंचायतें भी प्रेरणा लेंगी और हालात बदलेंगे। जिला परिषद की पूर्व अध्‍यक्ष किरण देवी कहती हैं, '' बिहार में लैंगिक असमानता एक गंभीर समस्‍या है। हर स्‍तर पर महिलाएं सुविधा और अवसर से वंचित हैं। राज्‍य सरकार समस्‍या के निदान के लिए ठोस कार्ययोजना बनाए। उसे पंचायतों की मदद से जमीन पर उतारे। साथ ही, प्रबुद्धजन इस असमानता को खत्‍म करने के लिए आगे आएं। महिला शौचालय सिर्फ महिला जनप्रतिनिधियों की ही नहीं, बल्‍िक  सभी महिलाओं की जरूरत है। यही नहीं ऐसी कई बुनियादी जरूरतें हैं जिनके लिए महिलाएं तरस रही हैं।
रिपोर्ट - एम. अखलाक

सोमवार, 3 जून 2013

एजेंडे से गायब ‘महिलाओं की सेहत’


पंचायतीराज और महिलाएं - 3
'‘यदि गांव की कोई महिला माहवारी से है तो उसे चार-पांच दिन एक अलग कमरे में रहना पड़ेगा। उन दिनों चाहकर भी स्नान नहीं कर सकती है। खाना नहीं बना सकती। यदि बनाएगी तो कोई खाएगा नहीं। परिवार में यदि कोई शुभ कार्य प्रस्तावित है और उसी बीच माहवारी की संभावना बन जाए तो दवा खाकर माहवारी को टालना उसकी मजबूरी है। चाहे सेहत भाड़ में जाए। ऐसा नहीं करने पर वह किसी भी शुभ कार्य में शामिल नहीं हो सकती। इसी तरह माहवारी के दिनों में गांव की लड़कियां स्कूल नहीं जाती हैं।’'
यह कड़वी सच्चाई है तेजी से बदल रहे बिहार के गांवों की। हर गांव में ऐसे मामले मिल जाएंगे। सुदूर गांवों की तो स्थिति और भी भयावह है। दरअसल, ग्रामीण महिलाओं की सेहत का सवाल अब भी पंचायतीराज व्यवस्था का अहम एजेंडा नहीं बन पाया है। तमाम पंचायतें सिर्फ सड़क, पानी, भवन निर्माण, मिड-डे मील, आंगनबाड़ी, इंदिरा आवास, बीपीएल सूची, पेंशन वितरण आदि योजनाओं तक सिमट कर रह गई हैं। जिन पंचायतों का नेतृत्व खुद महिलाएं कर रही हैं, वहां भी यह सवाल एजेंडे से गायब है। 
गैर सरकारी संगठन ‘प्लान इंडिया’ और कुछ वेबसाइटों की रिपोर्ट पर यकीन करें तो देश में 70 फीसद ग्रामीण महिलाएं सैनेटरी नैपकिन की पहुंच से दूर हैं। इसमें बिहार की ग्रामीण महिलाएं भी शामिल हैं। गांव की महिलाओं और स्त्री रोग विशेषज्ञों के बीच देशभर में कराए गए सर्वे में पाया गया है कि माहवारी के दौरान देखरेख नहीं होने से ग्रामीण क्षेत्रें की किशोरियां कम से कम 50 दिन स्कूल नहीं जा पाती हैं। देश में माहवारी से गुजरने वाली 35-5 करोड़ महिलाओं में केवल 12 फीसदी महिलाएं ही सैनिटरी नैपकिनों का इस्तेमाल करती हैं।
मुजफ्फरपुर जिले की स्त्री रोग विशेषज्ञ डाक्टर ज्योति कहती हैं कि जागरुकता के अभाव में आज भी ग्रामीण महिलाएं माहवारी के समय गंदे कपड़े, मिट्टी और राऽ आदि इस्तेमाल करती हैं। कई महिलाएं तो एक ही कपड़े को बार-बार धोकर यूज करती हैं। इससे हमेशा संक्रमण का ऽतरा बना रहता है। यह उनकी प्रोडक्टिविटी पर भी बुरा असर डालता है। उन्हें यूट्रस संबंधी कई बीमारियों का शिकार बना देता है। हर दिन गंभीर बीमारियों से परेशान महिलाएं इलाज के लिए आती रहती हैं। जो महिलाएं दवाओं का सेवन कर माहवारी को रोकती हैं, पहले तो उनका मासिक चक्र अनियमित हो जाता है। उसके बाद शारीरिक समस्याएं बढ़ जाती हैं।
महिला समाख्या सोसाइटी की जिला कार्यक्रम समन्वयक पूनम कुमारी कहती हैं कि गांवों में महिलाओं की बड़ी आबादी सैनेटरी नैपकिन खरीदने में अक्षम है। यही वजह है कि किसी भी चीज से काम चला लेती हैं। इसका बुरा असर उनकी सेहत पर पड़ रहा है।
सरकार की योजना का लाभ उठाएं 

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ग्रामीण महिलाओं को इस तरह की परेशानी से उबारने के लिए ‘वन रुपीज सेनेटरी नैपकिन’ नामक योजना चला रही है। इसके तहत ग्रामीण महिलाएं केवल एक रुपये में नैपकिन ऽरीद सकती हैं। इसके लिए उन्हें गांव के सरकारी अस्पतालों में जाने की भी जरूरत नहीं है। आशा कार्यकर्ता ही घूमघूम की एक रुपये कमीशन पर मुहैया कराती हैं। सरकार उन्हें छह सैनेटरी पैड का पैकेट पांच रुपये में उपलब्ध कराती है, जिसे वह छह रुपये में बेचती हैं। यह योजना बीस से अधिक राज्यों के जिलों में चल रही है। इसमें मुजफ्फरपुर जिला भी शामिल हैं।
क्या कर सकती हैं पंचायतें

  • माहवारी से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए गांवों में जागरूकता अभियान चला सकती है।
  • जागरूकता अभियान में स्वयं सहायता समूह, महिला संगठन, महिला जनप्रतिनिधि अहम रोल अदा कर सकते हैं।
  • आशा कार्यकर्ता नैपकिन बेचने में रूचि दिखा रही हैं या नहीं, इसकी पड़ताल वार्ड सदस्य करें। पंचायतों को इसकी रिपोर्ट दें।
  • आशा कार्यकर्ताओं के जरिए महिलाओं को माहवारी रोकने वाली दवा के कुप्रभाव की जानकारी दी जाए।
  • ग्रामीण क्षेत्र के स्कूल की शिक्षिकाओं की मदद से किशोरियों को जागरूक करने की रणनीति बनाई जाए।
  • ग्रामीण क्षेत्र की छोटी-बड़ी दुकानों पर सेनेटरी नैपकिन सहज तरीके से उपलब्ध कराया जाए।
  • इस पूरे अभियान को पंचायत संचालित करे, क्योंकि इस समस्या से सर्वाधिक गांव की महिलाएं प्रभावित हैं।
रिपोर्ट - एम. अखलाक

दो कदम तो चले हैं, अभी सफर बाकी है

पंचायतीराज और महिलाएं - 2
 
वैश्वीकरण के साथ कदमताल करता बिहार, रफ्ता रफ्ता बदलता बिहार, अब पंचायतीराज व्यवस्था के चौथे चरण की ओर कदम बढ़ा चुका है। तीन साल बाद यानी वर्ष 2016 में चुनाव होंगे। पिछले तीन चुनावों के बाद ग्राम सरकारों की तस्वीरें हमारे सामने हैं। तस्वीरें कई सवाल खड़े कर रही हैं। कई सुझाव भी दे रही हैं। तस्वीरें आईना भी दिखा रही हैं। समीक्षा करने के लिए प्रेरित भी कर रही हैं। समीक्षा से ही हालात और बेहतर होगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार के सभी जिलों में पंचायतीराज व्यवस्था अपने तीन पंचवर्षीय सफर के दौरान ग्रामीण विकास योजनाओं में लूट-भ्रष्टाचार और अक्षम महिला नेतृत्वों के कारण सवालों के घेरे में रहा है। मुखिया, पंचायत समिति सदस्य, पंच, सरपंच और जिला परिषद सदस्यों पर तरह-तरह के रिश्वतखोरी के आरोप लगते रहे हैं। इंदिरा आवास हो, सोलर लाइट हो या शिक्षक नियोजन तमाम योजनाएं जनप्रतिनिधियों के लिए दुधारू गाय साबित होती रही हैं। यही नहीं महिला जनप्रतिनिधियों की आड़ में पुरूष सत्ता संभालते रहे हैं। बैठकों में महिला जनप्रतिनिधियों के पतियों का जाना आम बात है। गांवों में तो मुखिया के पति संक्षेप में एमपी कहलाने लगे हैं।
लेकिन, इन तमाम बुराइयों और खामियों के बावजूद एक सकारात्मक पक्ष भी है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। कई ऐसी महिला जनप्रतिनिधि भी हैं जो विषम परिस्थितियों में बेहतर काम कर रही हैं। सरकारी बैठकों में खुद फैसले ले रही हैं। योजनाओं को समझ रही हैं, उसे जमीन पर सही तरीके से उतार रही हैं। गांवों में अंधविश्वास और रूढ़ियों के खिलाफ जंग लड़ रही हैं। वह घर के पुरूषों की छायाप्रति नहीं हैं। समाज के सामने उदाहरण पेश कर प्रेरणास्रोत बन रही हैं। ऐसी महिलाएं बिहार के सभी जिलों में मिल जाएंगी। आए दिन अखबारों में खबर की शक्ल में दिखाई भी पड़ती हैं। मुजफ्फरपुर जिले के तीन उदाहरण गौर करने लायक हैं।
बंदरा प्रखंड की शिवराहां मझौलिया पंचायत की चंद्रकला देवी अनुसूचित जाति से आती हैं। नेतृत्व क्षमता और जमीनीस्तर पर काम करने के कारण तीन बार मुखिया चुनी जा चुकी हैं। हर कोई उनके नेतृत्व क्षमता का कायल है। सरकारी कामकाज में पति का कोई हस्तक्षेप नहीं है। योजनाओं की जानकारी जुबान पर रहती है। पूछिए तो फटाफट बता देंगी। मुखिया बनने से पहले गांव में गरीब बच्चियों को शिक्षा दान करती थीं। आज पंचायतीराज व्यवस्था की बागडोर संभालने के साथ-साथ कई जनसंगठनों से जुड़कर महिला हिंसा रोकने, सबको शिक्षित करने, स्वास्थ्य जागरूकता, आर्थिक स्वावलंबन आदि के लिए भी काम कर रही हैं। चंद्रकला एक कुशल नेतृत्व की जिंदा मिसाल हैं।
शिवराहां मझौलिया पंचायत की एक और रोचक घटना महिलाओं के जागरूक होने की कहानी बयां कर रही है। कृष्णा देवी और बेबी देवी में गहरी दोस्ती थी। कृष्णा पंचायत समिति सदस्य चुनी गईं। इसके बाद उनके बेटे ने दलाली शुरू कर दी। कृष्णा की नीयत भी बदलती गई। जब दोबारा चुनाव आया तो गांव की महिलाओं ने बैठकर कृष्णा देवी की आलोचना की। इतना ही नहीं बेबी देवी को अपना उम्मीदवार बना डाला। अंततः बेबी देवी चुनाव जीतकर पंचायत समिति सदस्य बन गईं। बेबी देवी के कामकाज से लोग संतुष्ट हैं। वह इलाके में बेहतर काम कर रही हैं। यह वाक्या ग्रामीण महिलाओं में आ रही जागरूकता की ओर इशारा है।
तीसरा उदाहरण और भी दिलचस्प है। मुशहरी प्रखंड की रजवाड़ा पंचायत की सावित्री देवी बेहद गरीब परिवार से आती हैं। वह कहती हैं कि पंचायत चुनाव लड़ने की बात सोच भी नहीं सकती थी, लेकिन गांव-समाज के दबाव में आकर चुनाव मैदान में उतर गई। निर्विरोध पंच चुनी गई। जब पुनः चुनाव आया तो विरोध में एक और महिला खड़ी हो गई। मेरे मन में सवाल उठने लगा कि जब खुद लड़ना नहीं चाहती थी तो गांव वालों ने न सिर्फ चुनाव लड़ाया बल्कि निर्विरोध जीत का सेहरा भी बांधा दिया। आखिर क्या चूक हुई कि जब स्वयं चुनाव लड़ना चाहती हूं तो अन्य प्रत्याशी भी मैदान में आकर डट गए ? सावित्री ने तय किया कि क्षेत्र में किए गए काम के आधार वोट मांगेगी और सिर्फ एक दिन घूमकर चुनाव प्रचार करेगी। उसने ऐसा ही किया। और सावित्री पचास मतों से दोबारा चुनाव जीत गईं। सावित्री कहती हैं कि ईमानदारी से अगर काम करो तो जनता इनाम जरूर देती हैं।
ये उदाहरण इशारा करते हैं कि पंचायतीराज व्यवस्था के भीतर तेजी से बदलाव की प्रक्रिया जारी है। हताश और निराश होने की जरूरत नहीं है। 50 फीसद महिला आरक्षण बेमानी साबित नहीं होगा। तेजी से समाज बदलने के कारण महिलाओं के प्रति नजरिया भी बदल रहा है। अब घर से हर समुदाय की महिलाएं निकलने लगी हैं। जनता के दबाव और आलोचनाओं के कारण कई जगह सरकारी बैठकों में एमपी (मुखिया पति) की दाल नहीं गल रही है। हां, यदि पंचायती राज व्यवस्था जनता को प्रत्यक्ष शासन की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण कदम है तो यह कदम तभी सार्थक होगा जब जनता अपने आसपास के विकास कार्यों में अपने ही गांव जवार के प्रतिनिधियों द्वारा की जा रही प्रत्यक्ष बेईमानी को देखेगी और तत्क्षण उसका संगठित विरोध करेगी। जनता में इस प्रकार की चेतना के विकास से ही पंचायती राज व्यवस्था की जड़ें मजबूत होंगी।
 
 
''पिछले तीन पंचायत चुनावों का असर अब गांव-समाज में दिखने लगा है। खासकर गांव की महिलाओं की दुनिया तेजी से बदल रही है। 50 फीसद महिला आरक्षण की भूमिका भी अहम रही है। हां, भ्रष्टाचार के मामलों में भी महिला जनप्रतिनिधियों के नाम बहुत कम सामने आए हैं। यह अच्छी बात है।'' - रानी कुमारी, सरपंच, सरहंचिया, औराई
 
- रिपोर्ट - एम. अखलाक

गुरुवार, 30 मई 2013

ग्राम स्‍वराज की 'बेनजीर'



पंचायतीराज और महिलाएं - 1

इसे बिहार में पचास फीसद महिला आरक्षण का कमाल कहें या धीरे-धीरे मजबूत होती पंचायतीराज व्‍यवस्‍था का असर। सच्‍चाई यह है कि राजधानी पटना से 80 किलोमीटर दूर मुजफ्फरपुर जिले के गांवों की तस्‍वीर तेजी से बदल रही है। महिलाएं हर स्‍तर पर सशक्‍त हो रही हैं। नई इबारत गढ़ रही हैं। दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बन रही हैं। कमजोर वर्ग की महिलाओं की तो पूछिए मत, 'बेनजीर' बनकर उभर रही है। इन महिलाओं ने अगर घर से बाहर कदम रखने का साहस जुटाया है तो इसके पीछे कहीं न कहीं पंचायतीराज व्‍यवस्‍था की अहम भूमिका है। अगर महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलता, वह चुनाव लड़कर गांव की सत्‍ता नहीं संभालतीं, तो शायद अन्‍य महिलाएं भी जागरुक नहीं हो पातीं। पेश है तीन ऐसी गरीब ग्रामीण महिलाओं की कहानी, जिनसे हर कोई प्रेरणा लेने के लिए मजबूर हो जाएगा। - रिपोट : एम. अखलाक
पहली महिला जादूगरनी कंचन प्रिया

महज 19 वर्षीय कंचन प्रिया बिहार की पहली महिला जादूगरनी हैं। मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड स्‍थित सुस्‍ता मोहम्‍मदपुर गांव की रहने वाली इस दलित समुदाय की लड़की ने रिश्‍ते के भाई और पेशे से शिक्षक संजय कुमार चंचल से जादू की शिक्षा हासिल की। इसके बाद गांव की हमउम्र लड़कियों की मंडली बनाकर एक विशाल जादू टीम का गठन किया। गांवों में सीमित संसाधनों के बीच जादू शो करने लगी। गांव वालों को एक बेहतर मनोरंजन का माध्‍यम मिल गया। लेकिन शहरों तक पहुंच नहीं बना पा रही थी। वर्ष 2011 में गांव जवार जनसंगठन के संपर्क में आई। पहली प्रस्‍तुति खादी भंडार परिसर में आयोजित लोक जमघट नामक सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में हुई। गांव जवार ने युद्धस्‍तर पर ब्रांडिंग की। उसके बाद शहर के सबसे बड़े आम्रपाली आडिटोरियम में एक महीने का जादू शो किया। गांव के लोगों से कर्ज लेकर। कंचन प्रिया वह तमाम जादू शो करती हैं जो बड़े बड़े जादूगर करते हैं। मसलन लड़की को हवा में उड़ा देना, आरी से दो हिस्‍सों में काट देना, लड़के को जानवर बना देना, तलवार को गले के आरपार कर देना, खाली हाथों से रुपये बरसाना, आंखों पर पट़्टी बांध कर शहर में बाइक चलाना आदि आदि। कंचन अपने दर्शकों से हर शो में कहती है कि यह कोई जादू टोना नहीं है, बल्‍िक हाथों की सफाई है। पहली बार शहर में शो करना था। घर वाले इजाजत नहीं दे रहे थे। परिजनों का कहना था कि अखबार में फोटो छपेगा, बदनामी होगी, शादी में दिक्‍कत आएगी। लेकिन गांव जवार ने परिजनों की काउंसलिंग की तो वे मान गए। गांवों में जहा संसाधनों की कमी के कारण बड़े जादूगर नहीं पहुंच पाते हैं, वहीं कंचन अपनी टीम के साथ लगातार गांवों में शो कर रही है।
राजकुमारी बन गई किसान चाची
खेती-किसानी सिर्फ मर्द ही नहीं औरतें भी कर सकती हैं, इस सच को साबित कर दिखाया है किसान चाची ने। जी हां, पूरा नाम है राजकुमारी देवी। मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड की माणिकपुर पंचायत के आनंदपुर गांव की रहने वाली किसान चाची की उम्र करीब 57 साल है। बचपन में अपने शिक्षक पिता के साथ खेत में जाती थीं तो बड़े भाई विरोध करते थे। फिर भी उन्हें पिता का साथ मिलता रहा और उस समय से ही कृषि में रुचि रखने लगीं। अब स्‍वयंसहायता समूह के माध्‍यम से महिलाओं को खेती-किसानी का प्रशिक्षण देती हैं। मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार सम्‍मानित कर चुके हैं। मीडिया के लिए सेलिब्रेटि बन चुकी हैं। 1974 में शादी हुई। 1989  में घर का बंटवारा हुआ। पति के हिस्से में तीन एकड़ जमीन आई। घर की हालत ठीक नहीं थी। राजकुमारी से  रहा नहीं गया। खेती में हाथ बंटाने लगीं। पति ने भी इसका विरोध किया। पति के घर से बाहर जाने के बाद खेतों में जाकर सब्जी उगाने लगीं। इसी बीच स्वयं सहायता समूह से भी जुड़ गईं। इतना ही नहीं साइकिल से गांव-गांव घूमकर महिलाओं को जोड़ने लगीं। गांव में साइकिल चलाती महिला को देखकर लोग तंज भी कसते, लेकिन राजकुमारी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा।  1996 में राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा के वैज्ञानिकों से संपर्क किया। उन्नत बीजों से पपीता, खीरा, कद्‌दू की खेती शुरू की। किसान चाची मैट्रिक पास हैं। एक दिन पता चला कि तंबाकू खाने से कैंसर होता है, उन्‍होंने पति को समझाया और हमेशा के लिए तंबाकू की खेती बंद करा दी। खुद जैविक खाद बनाती हैं और उपयोग भी करती हैं। आज उनकी माली हालत काफी अच्छी है। 2007 में कृषि विभाग की गेहूं की खेती पर किसान पाठशाला योजना में उन्हें माणिकपुर पंचायत के वीरपुर गांव में प्रशिक्षण देने का जिम्मा सौंपा गया था। इसी समय से लोग उन्हें किसान चाची कहकर संबोधित करने लगे।
ब्रांड बन गई हनी गर्ल
मुजफ्फरपुर जिले के बोचहा प्रखंड के पटियासी गांव में जन्मी अनीता बचपन में बकरी चराया करती थी। छोटे स्‍तर पर मधुमक्खी पालन का व्यवसाय शुरू कर इतिहास रच दिया। आज वह ब्रांड बन गई है। हर कोई उसे ‘हनी गर्ल’ के नाम से पुकारता है। उसकी सफलता की कहानी राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की चौथी कक्षा की पाठ्य पुस्तक में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। अपनी पढ़ाई का खर्च पूरा करने के लिए अनीता ने सबसे पहले बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। जब उच्च शिक्षा के लिए और अधिक पैसों की जरूरत पड़ी तो उसने मधुमक्खी पालन का व्यवसाय शुरू किया। अब पिता और भाई भी इस काम में हाथ बंटाते हैं। वर्ष 2002 में दो बक्से से मधुमक्खी पालन का कार्य शुरू किया था। आगे चलकर राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा से मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लिया। विश्वविद्यालय ने उन्‍हें सर्वश्रेष्ठ पालक का पुरस्कार भी दिया। वर्ष 2006 में उसे जोरदार शोहरत मिली। यूनिसेफ ने उसकी कहानी पर रिपोर्ट जारी की। अनीता की प्रेरणा से आज गांव की करीब सात सौ महिलाएं आधुनिक तरीके से मधुमक्‍खी पालन करने लगी हैं। खैर, खुशी की बात यह है कि इसी साल 29 मई को अनीता शादी के बंधन में भी बंध चुकी हैं।

रविवार, 15 मई 2011

पानी पर नीतीश का 'जजिया कर'

विपक्ष विहीन बिहार में मिस्‍टर सुशासन उर्फ मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार की जनविरोधी नीतियां अब एक-एक कर जनता के सामने आने लगी हैं। पहले बिजली के बाजारीकरण का खेल शुरू हुआ। खेल खत्‍म होने से पहले ही पानी के बाजारीकरण का खेल भी शुरू हो गया है। पक्‍की खबर है कि सूबे में अब लोगों को अपनी जमीन से पीने के लिए पानी निकालने पर नीतीश सरकार को 'जजिया कर' (टैक्‍स) देना होगा। यही नहीं जो जितना अधिक पानी यूज करेगा उसे उतना ही अधिक टैक्‍स देना होगा। यानी पानी अब पराया गया है। जल पर जन का अधिकार नहीं होगा। वैसे मिस्‍टर सुशासन का तर्क है कि इससे भू-जल की बर्बादी नियंत्रित होगी। सूबे के सभी नगर निगमों और पंचायती राज संस्‍थाओं के पास इस बाबत तुगलकी फरमान भेज दिए गए हैं। कई जगह अखबार वालों ने 'गुड न्‍यूज' 'खास खबर' और जल संरक्षण की दिशा में राज्‍य सरकार द्वारा उठाए गए एक महत्‍वपूर्ण कदम जैसे भाव के साथ इस खबर को परोसा है। सूबे के किसी भी अखबार ने इसे जनविरोधी बताने की जुर्रत नहीं की है।
पहले ही बन गई थी रणनीति

करीब दो साल पहले बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार की सरकार ने इस विधेयक को पास कराया था। तब किसी भी विपक्षी दल (राजद-लोजपा-वामदल) या विधायकों ने विरोध नहीं जताया था। अखबारों में भी छोटी-छोटी खबरें प्रकाशित हुई थीं। दरअसल, यह विधेयक कितना जनविरोधी है उस समय कोई ठीक से समझ ही नहीं पाया। और भला समझता भी कैसे ? उसके लिए दिमाग जो चाहिए। खैर, बिहार में अक्‍सर ऐसा होता आया है कि विधेयक पारित होते समय विधानमंडल में कोई प्रतिरोध नहीं होता। जब विधेयक लागू होने की बारी आती है तो जनता और पार्टियां सड़क पर उतरने लगती हैं। शायद इस बार भी ऐसा ही होता, लेकिन आसार नहीं दिख रहे हैं। क्‍योंकि इस बार तो विपक्ष सिरे से ही गायब है। आखिर मुंह खोलेगा कौन ? मीडिया से तो उम्‍मीद ही बेमानी है। वह तो मुख्‍यमंत्री के मुखपत्र की भूमिका निभा रहा है। मुझे अच्‍छी तरह याद है जब विधेयक पास हुआ था तो मैंने मुजफ्फरपुर में भाकपा माले के कुछ साथियों से विरोध जताने की अपील की थी, लेकिन उन्‍होंने भी गंभीरता से नहीं लिया।
किसने दिखाई नीतीश को राह

यों तो देश में पानी के बाजारीकरण का खेल वर्ष 1990-91 में नई अर्थव्‍यवस्‍था को अपनाने के साथ ही शुरू हो गई थी। लेकिन बिहार में यह नीतीश कुमार के शासनकाल से दिखाई दे रहा है। मुख्‍यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार कुमार वर्ल्‍ड बैंक के एजेंट की भूमिका निभाने लगे हैं। ठीक उसी तरह जैसे आंध्र प्रदेश में कभी चंद्रबाबू नायडू निभाया करते थे। उन्‍होंने भी अपने यहां भू-जल पर टैक्‍स लगा रखा है। ऐसे में भला नीतीश कुमार पीछे कैसे रह सकते थे। इन्‍होंने भी आंध्र प्रदेश का माडल बिहार में चुपके चुपके लांच कर दिया।
क्‍यों जरूरी है नीतीश का विरोध

नीतीश कुमार के विकास का माडल हर तरह से वर्ल्‍ड बैंक को मालदार बनाने वाला है। पूंजीपतियों व विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाला है। आम आदमी को इससे कोई फायदा नहीं होगा। करीब 20-25 वर्षों के बाद बिहार का हर आदमी अप्रत्‍यक्ष रूप से वर्ल्‍ड बैंक को कर्जा चुकाते नजर आएगा। इतना ही नहीं सूबे के गरीब और गरीब हो जायेंगे। बुनियादी संसाधनों पर से उनका हक धीरे-धीरे छिन जाएगा। जल, जंगल और जमीन जैसी जन-जायदाद पर वर्ल्‍ड बैंक गिद्ध की तरह नजर गड़ाए हुए है। अगर नीतीश जैसे एजेंटों का विरोध नहीं हुआ तो देश गुलाम हो जाएगा।
- एम. अखलाक

बुधवार, 11 मई 2011

नीतीश, बिजली, बवाल और सच

बिजली संकट को लेकर इन दिनों बिहार में घमासान छिड़ा है। चहुंओर। बस नजर घुमाइए दिख जाएगा। क्‍या यह घमासान प्रायोजित है ? आपने इस दिशा में सोचने की पहल की ? आइए, आपको कुछ बातें याद दिलाते हैं, शायद इससे तस्‍वीर साफ हो जाए।

बात नंबर एक - बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार हर दिन केन्‍द्र की मनमोहन सरकार को कोस रहे हैं। केन्‍द्र भी सफाई दे रहा है। यानी आरोप - प्रत्‍यारोप का दौर जारी है। जनता भी इसे चाव से पसंद कर रही है। अखबार इस बात के सुबूत हैं। हर दिन खबरें छपने का मतलब है, खबर बिक रही है। और बिकने का मतलब है खरीदने वाली जनता पसंद कर रही है। तो भइया, असल बात यह है कि राज्‍य और केन्‍द्र के बीच चल रहे इस घमासान की जमीन विधानसभा चुनाव के दौरान ही तैयार हो गई थी। चुनावी सभाओं में नीतीश कुमार चिल्‍ला-चिल्‍ला कर कह रहे थे- अब बिजली के क्षेत्र में काम करना है। चुनाव खत्‍म हुआ। जीत का सेहरा बंध गया। काम करने का समय आ गया है। सो, बिजली मुद्दे को लेकर उनकी सियासत शुरू हो गई है। यह कब तक चलती रहेगी, सही-सही जवाब मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ही दे पाएंगे।

बात नंबर दो - बिजली की किल्‍लत लालू-राबड़ी के राजपाठ में सबसे अधिक थी। क्‍योंकि तब सुशासन नहीं जंगल राज था, जैसा कि नीतीश कुमार कहते हैं। 'साधु' शेर बनकर जंगल में मंगल मनाया रहे थे। सूबे में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद सुशासन आ गया। यही नहीं पांच साल में ही हालत भी तेजी से सुधर गए। लगभग सबकुछ दुरुस्‍त होता दिख रहा है। लेकिन बिजली को लेकर सुशासन में अचनाक बवाल मच गया। जनता हर जिले में, हर गांव में, हर टोला-मुहल्‍ला में टायर जलाकर, लाठी-डंडा लेकर विरोध प्रदर्शन करने लगी। बिजली दो, बिजली दो... के नारे लगा रही है। अखबरों में फोटोयुक्‍त खबरें छप रही हैं। अब सवाल उठता है कि जनता क्‍या सचमुच जागरूक हो गई है ? यदि जवाब हां है तो तब जनता इस कदर विरोध क्‍यों नहीं कर रही थी ? अखबार वाले इस कदर खबरें क्‍यों नहीं छाप रहे थे ? अचानक सबकुछ जागरूक कैसे हो गया ? क्‍या जनता और मीडिया पर नीतीश का कोई मंत्र काम कर रहा है ?

हकीकत क्‍या है - दरअसल, मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार का विकास माडल वर्ल्‍ड बैंक पोशक है। राज्‍य सरकार सबकुछ निजी हाथों में सौंपने के लिए आतुर है। इसी क्रम में सूबे में बिजली के बाजारीकरण की तैयारी पूरी हो चुकी है। प्रथम चरण में पटना, मुजफ्फरपुर और भागलपुर में बिजली को निजी हाथों में देने की योजना है। संभव है कुछ ही महीनों में यह खबर सामने आ भी जाए। नीतीश कुमार को अच्‍छी तरह पता है कि बिजली के बाजारीकरण का विरोध होगा। उनके लोक कल्‍याणकारी राज्‍य की छवि प्रभावित हो सकती है। इससे बचने के लिए उन्‍होंने खास रणनीति बनाई है। जिसके तहत जदयू कार्यकर्ता जगह-जगह जनता को विरोध प्रदर्शन के लिए उकसा रहे हैं। अगर आप गौर फरमाएं तो इन विरोध प्रदर्शनों में कहीं भी मुख्‍यमंत्री का पुतला दहन नहीं हो रहा है। टारगेट कोई और होता है। इतना ही नहीं नीतीश कुमार के इशारे पर नाचने वाले सूबे के अखबारों ने भी ऐसी खबरों को प्रमुखता से स्‍थान देने की हिदायत अपने रिपोर्टरों को दे रखी है। दरअसल, मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार आने वाले दिनों में यह कहकर बिजली को निजी हाथों में सौंपना चाह रहे हैं कि जनता को इससे राहत मिलेगी। जनता लगातार बिजली की मांग कर रही थी, सो उन्‍होंने ऐसा कदम मजबूरी में उठाया। केन्‍द्र ने उनकी कोई मदद नहीं की। आदि आदि। यानी कुल मिलाकर बिजली के बाजारीकरण का खेल चल रहा है।

- एम. अखलाक

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

कैसे गाएं, धरती बनी है दुल्हन साथियो

पृथ्वी दिवस : उत्तर बिहार में छिन गये जल-जंगल-जानवर रूपी गहने

धरती खुदा की लाजवाब नेमत है। आईना वही रहता, चेहरे बदल जाते हैं। एक वक्त ऐसा था जब उत्तर बिहार की धरती जल, जंगल और जानवर से आबाद थी। धरती जब हरियाली की चादर ओढ़कर मचल उठती तो कृषक फसल उत्सव का गान अलापते झूमने लगते। पर रफ्ता-रफ्ता धरती को हमारी ही नजर लग गई।

धरती के दामन पर हमने धड़ल्ले से रासायनिक खाद छिड़ककर हरियाली को लूट लिया। अब जैविक खाद के बहाने हरियाली लौटाने की बात कर रहे हैं। निर्झर बहने वाली नदियों को कुछ यों छेड़ा कि अब कहीं पानी-पानी है तो कहीं सूखा। इसी तरह पहले हमने झोले को ताक पर रखकर पॉलीथिन से दोस्ती गांठ ली, अब बांझ होती धरती पर मर्सिया गा रहे हैं।

मधुबनी, दरभंगा और समस्तीपुर में धरती की प्यास बुझाने वाले हजारों तालाबों, कुओं पर पिछले आठ-दस सालों में धड़ाधड़ हमने मकान खड़े कर लिए। अब माछ और मखाना का उत्पादन गिर रहा है तो छाती पीट रहे हैं। सिर्फ मधुबनी जिले में दस हजार तालाब थे। अब 3-4 हजार पर सिमट गये हैं। आखिर कहां गए तालाब?

उधर, समस्तीपुर जिले में वाया नदी और पश्चिमी चंपारण में चंद्रावत सूख चुकी है। पूर्वी चंपारण में लालबकेया नदी और सीतामढ़ी में लखनदेई नदियों की तलहटी भी चमक रही है। नेपाल से निकलने वाली सरिसवा नदी अब नाला बन चुकी है। कल-कारखाने नदी में ही जहर उगल रहे हैं। शान-ए-मोतिहारी यानी मोतीझील भी इतिहास बनने की ओर अग्रसर है। पर, इस बारे में सोचने की किसी को फुर्सत कहां? समस्तीपुर के तो दर्जनों गांवों में पीने के लिए पानी नहीं मिल रहा है। जहां धरती सौ फुट पर ही पानी उगल देती थी, अब वहां का जलस्तर 300 फुट नीचे चला गया है।पश्चिमी चंपारण स्थित वाल्मीकिनगर टाइगर रिजर्व आज भी सूबे का गौरव है, लेकिन कहने भर के लिए। जंगल से न सिर्फ घास, पेड़-पौधे बल्कि जानवर भी गायब हो चले हैं। यहां अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और जानवरों का शिकार आम बात बन गई है। कभी यहां दर्जनों बाघ दहाड़ते थे। अब बमुश्किल एक दर्जन बचे हैं। इसी तरह मोतिहारी शहर में सड़कों के किनारे लगाए गए ऐतिहासिक महोगनी के पेड़ सबकी आंखों के सामने काट डाले गए। धरती का आंचल सपाट हो गया। पर किसी को तरस नहीं आया। ऐसे संकट के दौर में हम ताल ठोक कर कैसे गाएं - आज धरती बनी है दुल्हन साथियो।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

(पृथ्‍वी दिवस पर यह रपट दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर के पेज वन पर छप चुकी है।)

ऐसे थे आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री

आचार्य श्री से जुड़े संस्मरण शहर के साहित्यकारों की जुबानी

भाषा में अशुद्धि बर्दाश्त नहीं थी -
गुरुदेव आचार्य प्रवर के सान्निध्य में रहकर छात्र जीवन से ही कविताएं लिखने लगा था। इस कारण उनके यहां आना जाना लगा रहता था। एक दिन सुबह नौ बजे कालेज जाने से पहले ही उनके दर्शनार्थ निराला निकेतन पहुंचा तो किसी ग्रामीण क्षेत्र से आए एक शिक्षक-कवि उन्हें लगातार अपनी कविताएं सुनाए जा रहे थे, घोर अशुद्धियों से भरी हुई। मगर विवश भाव से बिना कोई टिप्पणी किए आचार्य श्री उन्हें सुने जा रहे थे। मैं उन्हें प्रणाम कर ज्यों ही वहां बैठा, उन्होंने राहत की सांस ली। उन कवि महोदय से उन्होंने मेरा परिचय कराया और उन्हें कहा ये भी कवि-साहित्यकार हैं। बची हुई कविताएं इन्हें सुनाइए, मैं जरा गायों को चारा-पानी दे आऊं, भूखी होंगी बेचारी। आपकी कविताओं से तो उनका पेट नहीं भरेगा। यह घटना इस बात की पुष्टि करती है कि महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री को भाषा में अशुद्धि जरा भी बर्दाश्त नहीं थी।

- डा. शेखर शंकर, साहित्यकार


सिर्फ वर्तमान मुझमें जीता है -
महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री हर स्थिति में वर्तमान के पल के साथ जीने के आदी थे। लगता ही नहीं था कि उनकी चेतना कभी अतीत में डूबकर वर्तमान का अनदेखी कर देगी। अभी-अभी की बात है, शास्त्री जी एसकेएमसीएच में अपनी धर्मसंगनी छाया देवी के साथ सघन चिकित्सा में चल रहे थे। परिवेश में हरकत थी। लोग सोचते थे, पता नहीं कब उनकी सांस की डोर ढीली पड़ जाए और उनकी चेतना चिरविस्मृति की चादर ओढ़कर शून्य में विलीन हो जाए। शायद ऐसा सोचकर ही कुछ लोग पारंपरिक संस्कार से वशीभूत हो चले थे। शास्त्री जी के अत्यंत निकट छाया की तरह निरंतर उनके पीछे डोलने वाले उनके साले जयमंगल मिश्र आइसीयू कक्ष में उनके साथ थे। इसी बीच मैं वहां पहुंचा। मुझे देखकर शास्त्री जी की बेचैनी स्निग्ध मुस्कान में परिणत हो गई। लेकिन होंठो पे शब्द आने से रहे। श्री मिश्र ने शास्त्री जी से पूछा, इन्हें पहचानते हैं आप? उत्तर मिला, इस तरह उटपटांग प्रश्न क्यों पूछते हो? ऐसा प्रश्न तो उनसे पूछा जाता है जो आखिरी सांस लेते हुए मृत्यु के आलिंगन के लिए विवश दिखाई देते हैं। मैं कोई विवश व्यक्ति नहीं हूं। पूरे रूप में वही हूं जिस रूप में दुनिया मुझे निरंतर देखती रही है। शायद तुम्हारे चले जाने के बाद उसी रूप में देखती रहेगी।

- डा.रामप्रवेश सिंह, हिन्दी विभागाध्यक्ष, बीआरए बीयू मुजफ्फरपुर


अपने वंश का अंतिम आदमी -
1990 के दशक की बात है। शास्त्री जी की बड़ी बहन मानवती मिश्रा बीमार थीं। उन दिनों मैं दलसिंह सराय कॉलेज का प्राचार्य था। शास्त्री जी के अत्यंत निकट होने तथा उन पर पहला शोध प्रबंध लिखने के कारण उनका मुझे स्नेह मिलता था। यही वजह थी कि बहन के बीमार होने पर उन्होंने मुझे सूचना देकर बुलाया। जब मैं निराला निकेतन आया तो संयोगवश बीमार मानवती मिश्रा कराहने लगीं। जोर-जोर से चिल्लाने लगीं। सहयोग के लिए वे दौड़कर वहां गए। मैं भी गया। बाद में उन्होंने सेवा के लिए दो आदमी भेजने को कहा। मैंने कॉलेज के दो चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों को निराला निकेतन में तैनात कर दिया। पर मानवती मिश्रा नहीं बच सकीं। उनका निधन हो गया। श्राद्ध में जब यहां आया तो बहुत साहित्यकार जुटे हुए थे। आंगन में पगड़ी बांधने का काम हुआ। तत्पश्चात वे एकाएक आंगन के बाहर पिताजी के मंदिर में आए और अपनी पगड़ी उतार उनके चरणों पर रख दिया- 'लीजिए पिताजी यह पगड़ी। मैं आपके वंश का अंतिम आदमी हूं।' और कुछ देर तक वहीं लेटे रहे। मौजूद लोग स्तब्ध!

- डा. आश नारायण शर्मा, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, मिथिला विवि, दरभंगा


पिता-पुत्र आमने सामने बैठते हों -
आचार्य श्री जहां बैठा करते थे उसके ठीक सामने उनके पिता की मूर्ति है। ऐसा लगता था मानों पिता और पुत्र आमने-सामने बैठे हों। मेरा घर बगल में है। सो, उनका सानिध्य मुझे बचपन से ही मिलता रहा। वे बिना पिता को भोग लगाए अन्न की थाली ग्रहण नहीं करते थे। कहते थे कि आज मैं जो भी हूं उन्हीं के कड़े अनुशासन का फल है। पिता ने मेरे कारण दूसरा विवाह नहीं किया। शास्त्री जी के ठीक पीछे नीम का एक पेड़ है। एक बार उस पर करैले की लतर चढ़ गई। वे आने-जाने वालो को दिखाकर कहा करते- 'देखो यह मेरा प्रतीक है। एक तो करैला, उस पर नीम चढ़ा।' गालिब की तरह अपना मजाक उड़ाने की क्षमता कम रचनाकारों में होती है। शास्त्री जी के व्यक्तित्व की यह एक खास पहलू थी। पांव की हड्डी टूटने पर वे कभी कभी खीज जाते। कहते, 'हे इश्वर, मैं अपने आसपास के इन कुछ मनुष्यों को बर्दाश्त नहीं कर पाता हूं। तुम सृष्टि के सारे मनुष्यों को कैसे बर्दाश्त करते होगे। सचमुच तुम महान हो।'

- डा. रश्मि रेखा, साहित्यकार


... इस तरह अपने हो गए शास्त्री जी -
1974 की बात है। आचार्य श्री भीखना पहाड़ी पटना में बेला पत्रिका छपवाया करते थे। हिन्दुस्तानी प्रेस के निकट ही एक मकान में आलोक धनवा रहते थे। मैं दिन के साढ़े दस बजे आलोक के साथ गपशप कर रहा था। इसी बीच नीचे से आवाज आई। आलोक जी हैं? मैंने कहा- ये तो शास्त्री जी की आवाज लगती है। आलोक नीचे गए और शास्त्री जी को लेकर ऊपर आए। मुझे देखकर शास्त्री जी ने अपनी सहज विनोदमयी मुद्रा में कहा- अरे, यह नास्तिक आपके यहां कैसे? आलोक ने कहा- नंदन जी हमारे सहज आत्मीय मित्रों में से एक हैं। उल्लेखनीय है कि गंगा में ऐसी बाढ़ आई थी कि पहलेजा होकर लौटना बंद हो गया था। हमलोगों ने मैटनी-शो में गुलजार निर्मित फिल्म मौसम देखने का प्रोग्राम बनाया। इसके बाद पटना से समस्तीपुर पैसेंजर से दोनों साथ लौटे। यात्रा के बाद हम दोनों न केवल रचनात्मक स्तर पर बल्कि मानवीय स्तर पर इतने गहरे आत्मीय हो गये कि हमारे सुख दुख और चिंताएं एक हो गई।

- नंद किशोर नंदन, साहित्यकार


हाय, तू भी मनुष्य हुआ चाहती हो -
एक बार की बात है। अपने कुत्ते और बिल्लयों से घिरे आचार्य श्री बैठे हुए थे। कई साहित्यकार और पत्रकार भी मौजूद थे। इसी बीच उनकी एक कुतिया बिल्ली पर झपट पड़ी। आचार्य श्री ने उसे डांटते हुए बड़े प्यार से कहा- हाय तू भी मनुष्य हुआ चाहती हो।

- डा. संजय पंकज, साहित्यकार


प्रस्तुति : एम. अखलाक

(ये संस्‍मरण दैनिक जागरण में प्रकाशित हो चुके हैं।)

'मेरे लिए पिता ही मां थे और बाप भी'

आर्चाय जानकी वल्लभ शास्त्री की कहानी उन्हीं की जुबानी

कुछ माह पहले महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने एक इंटरव्यू में अपने बारे में कुछ-कुछ बताया था। पेश है उनसे जुड़ी एक छोटी-सी कहानी उन्हीं की जुबानी -
शास्त्री जी कहने लगे- 'गया से भी 40 मील आगे एक गांव है मैगरा। फिर उसे समझाते हुए अंग्रेजी में स्पेलिंग भी बताते हैं, एम ए आई जी आर ए। शायद पुरातनकाल में यह मायाग्राम रहा हो, और समय के साथ मैगरा बन गया हो। गौतम बुद्ध वाली जगह से हूं।
मां को मैंने कभी नहीं जाना। मेरी मां बचपन में ही मुझे छोड़ कर चली गई। एक दिन घर में लकड़ी नहीं थी, उन दिनों लकड़ी पर भोजन पकता था। पिताजी कहीं जा रहे थे, मां ने उनसे कहा, किसी को बोल दो लकड़ी दे जाएगा। नहीं तो भोजन नहीं बन पाएगा। क्रोध से पिताजी ने कहा कि सामने जो लकड़ी है उसी को जला लो। वह लकड़ी पूजा में प्रयोग के लिए किसी चीज की थी। काफी कीमती। ... दूसरे दिन मां को सांप ने काटा। मां चली गई। 5 वर्ष का रहा होऊंगा मैं।
मेरे पिताजी महापुरुष थे। मेरे पिता इतने बहादुर निकले कि लोगों के लाख कहने और समझाने पर भी उन्होंने दूसरी शादी नहीं की। किसके लिए? मेरे लिए। लड़के के लिए। अखंड मंडलाकार रह गए। पूजनीय थे। चले गए पिताजी, मैंने पिता का मंदिर बनवा लिया। वो देखो सामने। ये मंदिर मैंने अपने पिता की याद में बनवाया है। मैं कभी मंदिर में नहीं गया और न ही किसी देवता को पूजा। मेरे भगवान मेरे पिता हैं। उन्होंने कभी मेरा नाम नहीं लिया। बस एक ही बार बोले, तब चलें न जानकी वल्लभ? और चल पड़े! दुनिया में ऐसा पिता कहां मिलता है! सबसे बड़ी बात है कि यों कहने के लिए पिता होते हैं, वो नहीं थे, बकायदा पिता थे! बहुत बड़े विद्वान थे। छोटी उम्र में मां चली गई। मेरा जीवन चौपट हो गया था। मातृविहीन बालक था मैं। किसी के कहने पर शादी के लिए तैयार नहीं थे। किसी काम के लिए तैयार नहीं थे। सब काम मेरा गड़बड़ा गया। उन्होंने मां की भूमिका भी निभाई। मेरे लिए मेरे पिता ही मां थे और बाप भी। जब मैं मुजफ्फरपुर आ गया तो उनको भी अपने पास ले आया।''

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

(यह खबर आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री के निधन पर दैनिक जागरण मुजफ्फरपुर में छप चुकी है)

अस्त हुआ उत्तर छायावाद का सूरज

अब फिजां में गूंजेंगे 'किसने बांसूरी बजाई'

सूबे की सांस्कृतिक राजधानी मुजफ्फरपुर को साहित्यिक ऊर्जा प्रदान करने वाला, साहित्य की नई पीढिय़ों को तराशकर पहचान दिलाने वाला और देश भर में उत्तर छायावाद के गढ़ के रूप में बहुचर्चित निराला निकेतन के हिस्से में अब केवल अफसाने ही शेष रहे गए हैं। क्योंकि महाकवि आर्चाय जानकी वल्लभ शास्त्री अपनी यादों के सहारे हमें छोड़कर बहुत दूर चले गए हैं। हवा जब-जब निराला निकेतन की माटी को छूकर खुशबू बिखेरती हुई इठलाएगी, तब-तब आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की कही बातें, चेहरे के भाव, गीत और कविताएं हमारे बीच उनके जिंदा होने का एहसास दिलाती रहेंगी।कोई भी शहर, राज्य या देश वहां रहने वाले लोगों के होने से होता है। लेकिन इस शहर में आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के होने का एक गंभीर मतलब था। सच-सच कहा जाए तो यह शहर उनसे था। उनके कारण जाना-पहचाना जाता रहा है। यहां की साहित्यिक लीची की मिठास अगर दूर देश के लोगों को भाती थी तो नि:संदेह आचार्य श्री के कारण। इस शहर ने भले ही उन्हें बहुत कुछ नहीं दिया हो, पर वे अपनी साहित्यिक पीढिय़ों के लिए बहुत कुछ छोड़ गए हैं। उनके संस्कारों में पल-बढ़ कर जवान हुआ यह शहर शायद ही कभी उन्हें भूल पाएगा।एक ऐसा भी दौर रहा है जब आचार्य श्री की साहित्यिक गतिविधियां न सिर्फ फलक पर थीं, बल्कि महाप्राण निराला, पृथ्वीराज कपूर, उदय शंकर भट्ट, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेद्वी, आचार्य त्रिलोचन शास्त्री, कलम के जादूगर रामवृक्ष बेनीपुरी, क्रांतिकारी कवि रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, आचार्य महाशंकर मिश्र, आचार्य जयकिशोर नारायण सिंह व नवगीत प्रवर्तक राजेन्द्र प्रसाद सिंह सरीखे दर्जनों कवि-साहित्यकार निराला निकेतन का आतिथ्य स्वीकार कर गर्व करते थे। इतना नहीं नहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, स्व। चंद्रशेखर, उप राष्ट्रपति रहे स्व। भैरो सिंह शेखावत और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर भी निराला निकेतन में दस्तक दे चुके हैं। ये नेता कितने दीवाने थे। इसकी बानगी आचार्य श्री सुनाया करते थे। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने स्व. कर्पूरी ठाकुर के बारे में बताया था- 'उन्होंने केवल एक, मेरी एक कविता सुनी, मोहित हो गए, भक्त हो गए वो। 'किसने बांसूरी बजाई' करके उस जमाने में एक गीत गाता था मैं। इस गीत को जब उन्होंने मेरे गले से सुना तो गला पसंद आ गया उनको। गला ही काट लिया मेरा। जिन्दगी भर के लिए उन्हीं का हो के रह गया मैं। उन्होंने ही मुझको प्रोफेसर बनाया पटना में। जो कुछ काम किया वहीं किया। बताइए कहां मैं ब्राह्मण और कहां वो ठाकुर। किसी के यहां खा-पी नहीं सकता था मैं। उसको निभाते हुए इतना माना। मैं कोई महापुरुष नहीं था। पर उनके साथ रहकर इतना जाना कि कवि की भी इज्जत होती है। कर्पूरी जी सारी जिन्दगी मुझे काफी मान-सम्मान देते रहे।' खैर, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री पर इस सांस्कृतिक राजधानी को हर समय नाज रहा है, अब भी नाज है और हमेशा रहेगा।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

(यह खबर दैनिक जागरण में पेज वन पर बाटम छप चुकी है।)

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

बदनाम बस्ती भी बन गई 'हस्ती'

स्मृति शेष : अब न होगा कोई दूजा जानकीवल्लभ सूरज एक है, चंदा एक है, जमीं व आसमां एक हैं। हम चाहें लाख इन जैसा कुछ और बना डालें, मगर इनका कोई और विकल्प नहीं हो सकता। आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री पर भी कुछ यही बातें अक्षरश: लागू होती हैं। उनके विराट व्यक्तित्व के आगे बहुत कुछ बौना दिखता है। महज गीत, कविता लेखन और पशु प्रेम तक ही वे नहीं सिमटे थे। कुछ और भी थे, जिसे महसूस करने की जरूरत है। आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री पहली ऐसी शख्सियत रहे हैं जिन्होंने अपना आशियाना देश की टॉप टेन बदनाम बस्तियों में शुमार मुजफ्फरपुर की तवायफ मंडी यानी चतुर्भुज स्थान में बसाया। काली कोठरी में सपरिवार रहते हुए भी उनका दामन हमेशा पाक रहा। महाकवि की यह इच्छाशक्ति यों ही नहीं थी। उसमें एक मैसेज था। समाज के लिए। लोगों के लिए। वंचितों, पीडि़तों को स्वीकार करने का आग्रह था। उन्हें समझने, महसूस करने और बदलने की अपील थी। तभी तो महाप्राण निराला से लेकर हरिवंश राय बच्चन तक बेझिझक उनके आशियाने में आया करते थे। लेकिन कभी किसी ने महाकवि से ठौर बदलने की गुजारिश नहीं की। हां, शहर के लोग भले ही तवायफ मंडी के नाम पर बिचकते रहे हों, आचार्यश्री के बहाने निराला निकेतन जाने में उन्हें कभी परेशानी महसूस नहीं हुई। आचार्य श्री ने वंचितों की बस्ती को अपना नाम दिया। आज भी उस बस्ती में रहने वाले चतुर्भुज स्थान या तवायफ मंडी की जगह आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री पथ लिखा करते हैं। स्कूल में बच्चों के दाखिले के दौरान भी यही पता होता है। मंडी आज भी कायम है। तवायफें अब भी मौजूद हैं। लेकिन इलाका आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के नाम से जाना-पहचाना जाता है। एक और घटना 2002 की है। तब यहां तवायफ मंडी की रानी बेगम पहली बार वार्ड पार्षद चुनी गई थीं। मंडी के लोगों में उत्साह देखते ही बनता था। मीडिया मंडी की ओर भाग रहा था। आचार्य श्री ने फिर एक अनूठी पहल की, जिसमें वंचितों को गले लगाने का संदेश था। उन्होंने उसी निराला निकेतन में रानी बेगम को चांदी का मुकुट पहनाकर सम्मानित किया, जहां किसी जमाने में पृथ्वीराज कपूर, रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे दर्जनों हस्तियां आचार्यश्री का आतिथ्य स्वीकार किया करते थे। क्या सचमुच कोई और ऐसा कर सकता है? किया किसी ने कभी ऐसा किया है? क्या हममें वो जज्बा है? जवाब ढूढ़ेंगे तो सिर्फ आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ही नजर आएंगे। बेशक कहने में कोई गुरेज नहीं कि अब न होगा दूजा जानकीवल्लभ। - एम. अखलाक (यह रपट दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर में बाटम छप चुकी है।)

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

बबुआ अइसे ना बदली बिहार हो

सांस्‍कृतिक विकास के बिना 'समुचित विकास' नहीं

बिहार में इन दिनों विकास की बात हो रही है। अच्‍छी बात है। लेकिन मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी एजेंडे से 'सांस्‍कृतिक विकास' की बात सिरे से गायब है। राज्‍य सरकार के करीब साढ़े पांच साल बीत चुके हैं। मुख्‍यमंत्री और विभागीय मंत्री की ओर से कला, संस्‍कृति और कलाकारों के बुनियादी विकास के लिए अबतक कोई घोषणा नहीं हुई है। सरकारी योजनाओं का स्‍वाद चखने वाले सूबे के नामचीन कलाकार भी खामोश हैं। जबकि गांवों में कलाकारों का एक बड़ा तबका हाशिए पर जी रहा है। उसके समक्ष रोटी, रोजगार और सम्‍मान का संकट है। कलाकारों की इस जमात में 90 फीसदी दलित, महादलित, पिछड़ा, अतिपिछड़ा जैसे वर्ग से ही आते हैं। महज दस फीसदी ही कलाकार ऐसे होंगे जो सवर्ण होंगे। इनमें कोई सुखी नहीं है। लोक गायन कर, भजन-कीर्तन गाकर, नाच दिखाकर, बैंड बजाकर, तमाशा दिखाकर, नाटक करके, चित्रकारी करके, बैनर-पोस्‍टर लिखकर समाज को सांस्‍कृतिक रूप से समृद्ध करने वाले इन कलाकारों के बच्‍चों, घर-बार, खान-पान, पहनावा आदि देखकर कोई भी उनकी स्‍थिति का अंदाजा लगा सकता है। हैरत करने वाली बात यह भी है कि सूबे की कोई भी पंचायत अपने स्‍थानीय कला-संस्‍कृति और कलाकारों के विकास के लिए काम नहीं कर रही है। जबकि पंचायती राज अधिनियम में साफ-साफ कहा गया है कि पंचायतें बिजली, पानी, सड़क की तरह ही सांस्‍कृतिक विकास के लिए भी योजनाएं बनाकर सरकार के पास भेजेंगी। इससे जाहिर होता है कि बिहार में राज्‍य सरकार से लेकर पंचायतीराज तक कलाकारों के बारे में सोंचने की पहल नहीं हो रही है। ऐसे में दो अहम सवाल उठते हैं। पहला- क्‍या इन कलाकारों के विकास के बिना बिहार में सांस्‍कृतिक विकास संभव है ? दूसरा- सांस्‍कृतिक विकास के बिना सूबे का समुचित विकास हो पाएगा ? यदि नहीं तो सरकार इस दिशा में क्‍यों नहीं सोच रही है।

मेरा मानना है कि बिहार में कलाकारों के लिए एक मुकम्‍मल नीति का निर्माण होना चाहिए। अबतक किसी भी पूर्ववर्ती सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की है। जबकि पश्‍िचम बंगाल की सरकार इस दिशा में आगे निकल चुकी है। बिहार सरकार को चाहिए कि एक टीम गठित कर ऐसी नीति बनाए जिससे कलाकारों को पेंशन, बीमा, रोजगार, संरक्षण, सामाजिक सम्‍मान, प्रशिक्षण जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल सके। यही नहीं इस दायरे में तमाम ऐसे कलाकारों को शामिल किया जाए जिनकी रोजी रोटी कला के सहारे ही चलती है। उदाहरण के तौर पर एक बैंड बजाने वाला तीन-चार माह बैड बजाता है, बाकी दिनों में बेरोजगारी झेलता है, उसे सामाजिक सम्‍मान भी नहीं मिलता। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों के लोक कलाकारों के लिए कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। नाच पार्टी और आर्केस्‍ट्रा में काम करने वाली महिलाओं और पुरुषों के लिए भी कोई मजदूरी तय नहीं है। उनका शोषण होता है। कई जगह तो उनकी हत्‍या भी हो जाती है। चंपारण में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। सामाजिक उपेक्षा की तो पूछिए मत। अगर सरकार कलाकारों के लिए नीति बना लेती है तो एक बड़ी उपलब्‍िध होगी।

इसी तरह कला के विकास के लिए वर्ष 2004 में बनाई गई 'सूबे की सांस्‍कृतिक नीति 2004' को जमीन पर उतारने की पहल होनी चाहिए। यह नीति राज्‍य सरकार ने खुद बना रखी है। लेकिन ठंडे बस्‍ते में है। इसमें कला के विकास के लिए कई प्रस्‍ताव शामिल हैं। लेकिन एक भी काम अबतक नहीं हुआ है। मीडिया ने भी कभी इसकी पड़ताल नहीं की। अगर प्राथमिकता के तौर पर सभी जिला मुख्‍यालयों में कला भवन आदि बना दिए जाएं तो सूबे में सांस्‍कृतिक गतिविधियां स्‍वत: बढ जाएंगी। इससे स्‍थानीय कला को प्रोत्‍साहन भी मिलेगा। आज बिहार के किसी भी जिले में कला प्रस्‍तुति के लिए एक अदद कला भवन नहीं है। जहां आडिटोरियम व नगर भवन आदि हैं उसका किराया पांच हजार से उपर है। चाहकर भी कोई आयोजन करने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाता है।

ठीक इसी तरह सूबे में लोक कलाओं व लोक कलाकारों के संरक्षण के लिए अलग से आयोग का गठन होना चाहिए। सबको पता है कि बिहार के हर जिले की अपनी सांस्‍कृतिक पहचान रही है। लेकिन, अब लोक कलाएं मरती जा रही हैं। कई कलाएं लुप्‍त हो चुकी हैं। इन कलाओं से जुड़े लोक कलाकार उजड़ते जा रहे हैं। मिथिलांचल में दसौत, सामा-चकेवा, झिझिया, जटा-जटिन, झुमरि, रमखेलिया, डोमकछ, लोरिक-सलहेस, गोपीचन्द, विदापत, हरिलता एवं विहुला प्रचलित लोक नाटक रहे हैं। इसके अलावा बिहार में अन्‍य प्रचलित लोक-नाटकों में चौपहरा, नारदी, नयना-योगिन, भाव, झड़नी, पमरिया भी प्रमुख रहा है। इस पर शोध नहीं हो रहा है। सो, इन्‍हें सहेजने के लिए सूबे में एक अलग आयोग का गठन होना ही चाहिए। इससे बिहार की सांस्‍कृति एक बार फिर झूम उठेगी। यही नहीं सूबे में सकारात्‍मक माहौल भी बनेगा। हां, इसमें ध्‍यान रखने की बात यह होगी कि आयोग में लोक कलाकार ही प्रमुखता से शामिल रहें।

- एम. अखलाक
(लेखक लोक कलाकारों के जनसंगठन 'गांव जवार' के सदस्‍य हैं)

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

नक्सलियों पर भारी पड़े वोटर

तिरहुत के नक्सल प्रभावित इलाकों में खूब पड़े वोट

मुजफ्फरपुर : दूसरे चरण के मतदान से दो दिन पहले शिवहर में बारूदी विस्फोट कर छह पुलिस कर्मियों को शहीद करने वाले नक्सलियों पर मतदान के दिन मतदाता भारी पड़ गए। नक्सलियों के गढ़ कहे जाने वाले अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में वोटरों ने बढ़-चढ़कर मताधिकार का प्रयोग किया। यह न सिर्फ लोकतंत्र के प्रति कायम विश्वास का संकेत है, बल्कि नक्सल आंदोलन की समीक्षा की ओर लोगों का इशारा भी है। अगर पिछले तीन विधानसभा चुनावों के वोट प्रतिशत पर गौर करें तो इस बार वोटरों का उत्साह 'बम-बमÓ बोल रहा है।सबसे पहले नजर डालते हैं शिवहर विधानसभा क्षेत्र पर। यहां फरवरी 2005 के चुनाव में 46।04 फीसदी वोटरों ने वोट डाला था। इसी साल जब अक्टूबर में जब दोबारा चुनाव हुआ तो ग्राफ गिरकर 45।47 पर आ गया। लेकिन, इस बार नक्सली घटना के बावजूद 50 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर सूबे को चौंका डाला है। नक्सली घटना के बाद सियासी गणितज्ञों को इस तरह के परिणाम की उम्मीद नहीं थी। इसी तरह सीतामढ़ी जिले के बेलसंड विधानसभा क्षेत्र में फरवरी 2005 में 47।04 और अक्टूबर में 46।55 फीसदी मतदान हुआ था। इस बार यह ग्राफ चढ़कर 48 फीसदी पर पहुंच गया है।उधर, मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर, पारू और साहेबगंज विधानसभा क्षेत्रों पर नजर डालें तो यहां भी नक्सलियों को मतदाता चुनौती देते ही नजर आए। पारू विधानसभा क्षेत्र में फरवरी और अक्टूबर 2005 में हुए दो चुनावों में क्रमश: 49।95 और 50.43 फीसदी मतदान हुआ था। इसबार यह आंकड़ा 52.2 प्रतिशत पहुंच गया है। कुछ यही हाल मीनापुर विधानसभा क्षेत्र का भी रहा। पिछले दोनों चुनावों में यहां क्रमश: 47.26 और 49.60 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसबार उत्साहित वोटरों ने 53.72 फीसदी तक इस आंकड़े को पहुंचा दिया है। हां, साहेबगंज एक मात्र ऐसा क्षेत्र रहा है जहां इस बार थोड़ा ग्राफ गिरा है। गत दो चुनावों में यहां मतदान प्रतिशत 50.83 और 52.84 था। इस बार यह 52 फीसदी पर ही सिमट कर रह गया है। ये सभी विधानसभा क्षेत्र चुनाव आयोग की संचिकाओं में नक्सल प्रभावित माने गए थे। सो, यहां तीन बजे ही मतदान हो सका। यदि यहां पांच बजे तक मतदान होता तो कई और रिकार्ड टूट सकते थे।खैर, कई ऐसे विधानसभा क्षेत्रों ने भी इस बार रिकार्ड तोड़ा है जो नक्सल प्रभावित होने के बावजूद चुनाव आयोग के खाते में नहीं थे। इन्हीं में एक है बरूराज, जहां पिछले दो चुनावों में क्रमश: 48.3 व 48.45 फीसदी वोट डाले गए थे। इस बार यहां 53 फीसदी मतदान हुआ है। इसी तरह पूर्वी चंपारण जिले के पिपरा में इस बार दो 57 फीसदी वोट पड़े हैं। जबकि दो चुनावों में यहां क्रमश: 46.38 और 47.64 फीसदी ही वोट डाले गए थे। यही हाल मधुबन का भी रहा। यहां गत दो चुनावों में क्रमश: 44.42 और 47.98 प्रतिशत वोट डाले गए थे। इस बार 58 फीसदी लोगों ने वोट डाला है। वहीं ढाका में रिकार्ड तोड़ 61 फीसदी वोटिंग हुई है। जबकि दो चुनावों में यहां क्रमश: 42.43 और 44.38 फीसदी लोगों ने ही मतदान किया था। यही नहीं नवसृजित चिरैया में 61 और नरकटिया में 59 प्रतिशत मतदान की सूचना है। चौंकाने वाली बात यह है कि नक्सल प्रभावित होने के बावजूद यहां शाम पांच बजे तक न सिर्फ मतदान हुआ बल्कि शानदार वोटिंग भी हुई।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

कल्याणी के आंगन में नहीं 'नाचे' प्रत्याशी

मुजफ्फरपुर : बस दो पल के लिए जिंदगी के दुख-दर्द से बाहर निकलकर कल्पना लोक में चले आइए। फर्ज कीजिए, आप एक चौराहे पर खड़े हैं। यह शहर की ह्रदय स्थली के रूप में मशहूर है। यहां से निकलने वाले रास्ते चार दिशाओं में जाने का संकेत देते हैं। मौसम चुनावी है और दीवाली भी दस्तक दे रही है। इसलिए चौराहे के आसपास बाजार भी चहक रहे हैं। इसी बीच चुनाव प्रचार का अंतिम दिन भी आ टपका। सभा के लिए शाम पांच बजे का वक्त अंतिम डेडलाइन है। करीब तीन बजे से चौराहे पर दलों के प्रत्याशी अपने झंडा-बैनर के साथ टपकने लगते हैं। बारी-बारी शुरू हो जाता है चुनावी भाषण मुकाबला। ना कोई मारपीट, ना कोई हंगामा। लेकिन, सब छोड़ते हैं एक दूसरे पर जहर बुझे तीर। इतना ही नहीं खुलकर रखते हैं अपनी बात। भाषण के वजन के हिसाब से बटोरते हैं तालियां भी। और पांच बजते ही अपने-अपने चुनावी आशियानों की ओर कर जाते हैं प्रस्थान। अब आंख खोलिए और खुद से सवाल कीजिए- क्या ऐसी आदर्श व्यवस्था कहीं संभव है? बहुतेरों का जवाब होगा- नहीं। पर, इस शहर में कई-कई चुनावों को देख चुके लोग तुरंत बोल पड़ेंगे- यह तो कल्याणी चौक का नजारा है।

मुजफ्फरपुर सूबे का इकलौता ऐसा अनूठा शहर रहा है जहां चुनाव प्रचार के अंतिम दिन एक ही चौराहे पर सभी प्रत्याशी जनता से अपनी बात कहने के लिए खुद जुटते हैं। कोई आयोजक या प्रायोजक नहीं होता है। प्रत्याशी प्रचार गाडिय़ों पर बने मंच पर खड़ा होकर ही पब्लिक से मुखातिब होते हैं। गत लोकसभा चुनाव हो या फरवरी और अक्टूबर 2005 का विधानसभा चुनाव या फिर उससे पहले के चुनाव, सभी उस अनूठे नजारे को देख चुके हैं। पर, इस बार शहरवासी वैसे नजारे नहीं देख पाए। हालांकि शुक्रवार को चुनाव प्रचार का अंतिम दिन होने के कारण परंपरा के मुताबिक सैकड़ों लोग तीन बजे तक कल्याणी चौक पहुंच गए थे। सबकी आंखें प्रत्याशियों की बाट जोह रही थीं। आंखें उनसे कुछ सवाल करना चाहती थीं। बदरंग होती शहर की सूरत के बारे में। बेरोजगार घूमते हाथों के बारे में। गंदी बस्तियों में पानी के बारे में। बिजली के बारे में...। पर, पहुंचने के बाद ज्योंही पता चला कि इस बार चुनाव आयोग ने सिर्फ एक ही प्रत्याशी को यहां सभा करने की इजाजत दी है। आंखों में सवाल तैरते रह गए। चेहरे उतर गए। घर लौटते वक्त बस एक ही बात जेहन में उमड़ -घुमड़ रही थी- एक परंपरा टूट गई, जो लंबे काल से चली आ रही थी।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

एक गीत तुम्‍हारे नाम


भाड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम तो हिन्‍द के रखवाले हैं
रोटी दे दो, पानी दे दो
छत दे दो, कपड़े दे दो
हम कहां इबादत करने वाले हैं।


भांड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम बच्‍चन को पढ़ने वाले हैं
रुपये दे दो, पैसे दे दो
दवा दे दो, दारू दे दो
हम कहां अयोध्‍या जाने वाले हैं।


भांड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम मजदूर कहलाने वाले हैं
जंगल दे दो, जमीन दे दो
बीज दे दो, खाद दे दो
हम कहां धाम धांगने वाले हैं।


भांड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम इंकलाब कहने वाले हैं
गद्दी छोड़ों गद्दार कहीं के
हम सत्‍ता में आने वाले हैं।
हम सत्‍ता में आने वाले हैं।


(रामजन्‍मभूमि- बाबरी मस्‍िजद विवाद पर हाईकोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले पर प्रतिक्रिया)
- एम. अखलाक

शनिवार, 25 सितंबर 2010

बिहार में कांग्रेस के दो अध्यक्ष!

कांग्रेस और राजद की वेबसाइट अपडेट नहीं

इन दिनों बिहार कांग्रेस कमेटी में दो प्रदेश अध्यक्ष कार्यरत हैं! चौंकिए मत, यकीन नहीं आता तो देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी कांग्रेस की वेबसाइट पर आपका स्वागत है। पार्टी की केन्द्रीय वेबसाइट के अनुसार अनिल शर्मा अब भी अपने पद पर बने हुए हैं। वहीं प्रदेश कमेटी की वेबसाइट कहती है कि चौधरी महबूब अली कैसर ने मोर्चा संभाल रखा है।

बदलते जमाने को ध्यान में रखकर एक तरफ कांग्रेस पार्टी जहां अपने हर काम को हाईटेक और प्रोफेशनल अंदाज में अंजाम देना चाहती है। कार्यकर्ता बनाने से लेकर चुनाव प्रचारों के लिए लेटेस्ट तकनीक का सहारा ले रही है। इंटरनेट के माध्यम से समर्थक बना रही है। वहीं अपनी वेबसाइट तक अपडेट नहीं कर पा रही है। इसी का परिणाम है कि केन्द्रीय वेबसाइट पर जिन प्रदेश अध्यक्षों की सूची जारी की गई है उनमें अनिल शर्मा का ही नाम, पता और फोन नंबर शो किया गया है। जबकि श्री शर्मा इस वर्ष के जून में ही प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिए गए हैं। सूबे में फिलहाल उनकी कुर्सी पर चौधरी महबूब अली कैसर अध्यक्ष की भूमिका में हैं।

मालूम हो कि केन्द्रीय वेबसाइट पर कुल 36 प्रदेश अध्यक्षों के नाम, पते व फोन नंबर दिए गए हैं। इसके साथ ही प्रदेश कमेटी के वेबसाइट लिंक भी उपलब्ध कराए गए हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पार्टी अब तक छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, राजस्थान, पंजाब, उडि़सा, तमिलनाडु, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, दमन एंड द्वीव और लक्षद्वीप कमेटी के लिए वेबसाइट विकसित नहीं कर पाई है।

कायम है राजद का कांग्रेस प्रेम

इस चुनावी फिजां में राजद और कांग्रेस भले ही एक दूसरे को पानी पीकर कोसते रहे हों, लेकिन सच्चाई कुछ और है! जी हां, यह राजद की वेबसाइट बोलती है। पार्टी ने जिस वेबपेज पर अपने तमाम विधायकों की सूची जारी कर रखी है उसके माथे पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री डा। मनमोहन सिंह की तस्वीरें भी मौजूद हैं। इन तस्वीरों में राजद सुप्रीमो जहां कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी से बातचीत कर रहे हैं, वहीं डा। मनमोहन सिंह चुपचाप' तमाशा देख रहे हैं।

रिपोर्ट - एम. अखलाक

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

उत्तर बिहार में डटे हैं जन संगठन भी

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है और रफ्ता-रफ्ता सियासी सरगर्मियां परवान चढ़ रही हैं। इसी के साथ उत्तर बिहार की फिजां में तैरने लगी है जन संगठनों की आवाज, जो चुनावी मुद्दा बनने को बेकरार है और जो वर्षों से सियासी झांसा झेल रही है। अपनी मांगों के लिए जब-जब इन संगठनों ने नारे बुलंद किए, आंदोलन को आगे बढ़े, तब-तब इन्हें सहलाया गया, बहलाया गया। अब जबकि चुनाव सामने है और सियासी पार्टियां उनके मुद्दे-मांगों से मुंह मोड़े हुए है, ऐसे में संगठनों ने भी अपनी कमर कस ली है। इस बार वे अपने मुद्दे को गरम करने की फिराक में अभी से जुट गए हैं। आइए जानें किस संगठन का क्या है मुद्दा?

आरटीई कानून लागू हो : बिहार में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू करने की मांग को लेकर 'भूमिका विहार' आंदोलन चला रहा है। पिछले दिनों पटना और मुजफ्फरपुर में यह संगठन राजनीतिक दलों और प्रबुद्धजनों के साथ सम्मेलन आयोजित कर अपनी मांगों को उनके समक्ष रख चुका है। संगठन की मांग है कि सियासी दल इस मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा पत्रों में शामिल करें। संगठन के अरुण कुमार सिंह कहते हैं कि सामाजिक मुद्दों से सियासी दलों का कोई नाता नहीं रह गया है। इस बार उनकी कोशिश होगी कि संगठन की मांग की ओर सियासी पार्टियां ध्यान दे और उसे अमल में लाने की भरपूर कोशिश करे।

सांस्कृतिक नीति जमीन पर उतरे : सूबे की सांस्कृतिक नीति 2004 को जमीन पर उतारने, लोक कलाओं व कलाकारों के संरक्षण के लिए अलग कला और कलाकार आयोग गठित करने, कलाकार नीति बनाने और सभी जिलों में कला प्रदर्शन के लिए नगर भवन व ऑडिटोरियम नि:शुल्क करने के लिए 'गांव जवार' पिछले एक साल से आंदोलन चला रहा है। यह संगठन भी पटना व मुजफ्फरपुर में सम्मेलन कर सियासी दलों से इन्हें चुनावी घोषणा पत्रों में शामिल करने की मांग कर चुका है। संगठन के डा. कौशल किशोर चौधरी कहते हैं कि पक्ष-विपक्ष की सियासत करने वाले नेताओं को इस बार संगठन के मुद्दों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया जाएगा। मुजफ्फरपुर थियेटर एसोसिएशन भी पिछले दिनों चुनावी घोषणा पत्रों में सांस्कृतिक सवालों को स्थान देने की मांग को लेकर विचार गोष्ठी आयोजित कर चुका है। 'इप्टा' भी इन्हीं सवालों को लेकर शहर में धरना-प्रदर्शन कर चुका है। उधर, 'बेटी बचाओ आंदोलन' ट्रैफिकिंग की रोकथाम के लिए ठोस पहल करने व नाच पार्टियों में काम करने वाले कलाकारों को मजदूर का दर्जा देने की कई वर्षों से वकालत कर रहा है।

मैथिली की आवाज भी सुनिए : मिथिलांचल में 'विद्यापति सेवा संस्थान' प्रबुद्धजनों की बैठक में प्रस्ताव पारित कर सियासी दलों से मैथिली भाषा में ही बैनर-पोस्टर व चुनावी घोषणा पत्र जारी करने की मांग कर चुका है। संस्था के सदस्यों को कहना है कि इस बार यदि ऐसा नहीं हुआ तो सियासी दलों को संगठन का विरोध झेलना होगा।

मिथिला राज्य की भी है मांग : अखिल भारतीय मिथिला पार्टी पिछले कई वर्षों से अलग मिथिला राज्य बनाने की मांग कर रही है। नेतागण भरोसा देते हैं, बैक से समर्थन की बात करते हैं, पर जब चुनाव आता है तो मुद्दा गौण हो जाता है। संगठन के पदाधिकारी इस साफ आश्वासन के बाद भी नेताओं को वोट देने का मन बना रहे हैं। इसके लिए वे जागरुकता अभियान भी चलाने की सोच रहे हैं।

बज्जिकांचल भी है आवाज : बज्जिकांचल विकास पार्टी भी वर्षों से अलग बज्जिकांचल राज्य बनाने की मांग को लेकर संषर्घरत है। इस संगठन के कार्यकर्ता तो अब चुनावी मैदान में उतरकर जन समर्थन बटोरने लगे हैं। इस बार भी वे अपनी आवाज जनता और सियासत तक पहुंचाने की जुगत में हैं।

रिपोर्ट - एम. अखलाक

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

'नफरत हो गई है मां शब्द से'


ट्रैफिकिंग की शिकार कोलकाता की रिम्पा ने सुनाई आपबीती


मां शब्द से अब मुझे नफरत हो गई है। जो सगी थी उसने दो हजार में बेच डाला। फिर प्यार से जिसको अम्मा कहा उसने भी कहीं का नहीं छोड़ा। अब तो किसी पर यकीन ही नहीं आता। इतना कहते कहते रिम्पा की आंखे नम हो जाती हैं। बकौल रिम्पा, कोलकाता के आमरा थाना स्थित बारासाथ की रहने वाली हूं। मां अनारा बीबी, पिता गणेश कर्मकार, पांच बहनों और चार भाइयों के संग रहती थी। तारीख और ट्रेन का नाम याद नहीं पर दो माह पहले मेरी मां ने पड़ोस की एक महिला की बेटी के साथ मुझे आर्केस्ट्रा में काम करने के लिए छपरा भेज दिया। यहां आई तो पता चला कि दो हजार में बेच दी गई हूं। मुझे नाचने और साथ में सोने के लिए कहा जाता था। ऐसा नहीं करने पर आर्केस्ट्रा मालिक मेरे साथ मारपीट करते थे। कहते थे- तुम्हारी मां को रुपये देकर तुम्हे खरीदा है। मेरी मर्जी तुम्हारे साथ मैं जो करूं। तंग आकर 15 दिन पहले भाग गई। ट्रेन पकड़कर मुजफ्फरपुर पहुंच गई। काफी देर तक जंक्शन पर बैठी रही। यहां मुझे दो महिलाएं मिलीं। मैंने आपबीती सुनाई। उन्होंने कहा- चलो, मेरे साथ रहो। तुम्हे कोई दिक्कत नहीं होगी। तीन दिनों तक उन्होंने मुझे साथ रखा। मैं उन्हें अम्मा कहकर बुलाने लगी। फिर मुझे दिल्ली ले गई। उन्होंने वहां मुझे बेचने की कोशिश की। पुलिस ने हम सभी को पकड़ लिया। फिर उन्होंने पुलिस को पैसे दिए। हम सभी छूट गए। फिर हमको लेकर नेपाल चली गई। वहां दो दिनों तक प्लेटफार्म पर रही। एक महिला हमेशा मेरे पास रहती। मंगलवार की देर रात मुजफ्फरपुर जंक्शन पहुंची, और मुझे रिक्शा से लेकर कहीं चले गए। बुधवार की सुबह ट्रेन पकड़ने के लिए मुझे लेकर फिर जंक्शन पहुंची। इसी बीच मैंने एक यात्री से बचाने की गुहार लगाई। फिर उसने मुझे पुलिस के पास पहुंचा दिया।


बहरहाल, ट्रैफिकिंग की शिकार 16 वर्षीय रिम्पा को जीआरपी ने मुजफ्फरपुर की स्वयंसेवी संस्‍था निर्देश के हवाले कर दिया है। थानाध्यक्ष शशि भूषण सिंह के अनुसार पुलिस मामले की छानबीन कर रही है। उधर, निर्देश से जुड़ी शांति देवी ने कहा कि रिम्पा यदि घर जाना चाहेगी तो उसे वहां भेज दिया जाएगा। नहीं तो यहीं प्रशिक्षण देकर उसे रोजगार मुहैया कराई जाएगी।