सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना

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रविवार, 24 अक्टूबर 2010

नक्सलियों पर भारी पड़े वोटर

तिरहुत के नक्सल प्रभावित इलाकों में खूब पड़े वोट

मुजफ्फरपुर : दूसरे चरण के मतदान से दो दिन पहले शिवहर में बारूदी विस्फोट कर छह पुलिस कर्मियों को शहीद करने वाले नक्सलियों पर मतदान के दिन मतदाता भारी पड़ गए। नक्सलियों के गढ़ कहे जाने वाले अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में वोटरों ने बढ़-चढ़कर मताधिकार का प्रयोग किया। यह न सिर्फ लोकतंत्र के प्रति कायम विश्वास का संकेत है, बल्कि नक्सल आंदोलन की समीक्षा की ओर लोगों का इशारा भी है। अगर पिछले तीन विधानसभा चुनावों के वोट प्रतिशत पर गौर करें तो इस बार वोटरों का उत्साह 'बम-बमÓ बोल रहा है।सबसे पहले नजर डालते हैं शिवहर विधानसभा क्षेत्र पर। यहां फरवरी 2005 के चुनाव में 46।04 फीसदी वोटरों ने वोट डाला था। इसी साल जब अक्टूबर में जब दोबारा चुनाव हुआ तो ग्राफ गिरकर 45।47 पर आ गया। लेकिन, इस बार नक्सली घटना के बावजूद 50 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर सूबे को चौंका डाला है। नक्सली घटना के बाद सियासी गणितज्ञों को इस तरह के परिणाम की उम्मीद नहीं थी। इसी तरह सीतामढ़ी जिले के बेलसंड विधानसभा क्षेत्र में फरवरी 2005 में 47।04 और अक्टूबर में 46।55 फीसदी मतदान हुआ था। इस बार यह ग्राफ चढ़कर 48 फीसदी पर पहुंच गया है।उधर, मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर, पारू और साहेबगंज विधानसभा क्षेत्रों पर नजर डालें तो यहां भी नक्सलियों को मतदाता चुनौती देते ही नजर आए। पारू विधानसभा क्षेत्र में फरवरी और अक्टूबर 2005 में हुए दो चुनावों में क्रमश: 49।95 और 50.43 फीसदी मतदान हुआ था। इसबार यह आंकड़ा 52.2 प्रतिशत पहुंच गया है। कुछ यही हाल मीनापुर विधानसभा क्षेत्र का भी रहा। पिछले दोनों चुनावों में यहां क्रमश: 47.26 और 49.60 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसबार उत्साहित वोटरों ने 53.72 फीसदी तक इस आंकड़े को पहुंचा दिया है। हां, साहेबगंज एक मात्र ऐसा क्षेत्र रहा है जहां इस बार थोड़ा ग्राफ गिरा है। गत दो चुनावों में यहां मतदान प्रतिशत 50.83 और 52.84 था। इस बार यह 52 फीसदी पर ही सिमट कर रह गया है। ये सभी विधानसभा क्षेत्र चुनाव आयोग की संचिकाओं में नक्सल प्रभावित माने गए थे। सो, यहां तीन बजे ही मतदान हो सका। यदि यहां पांच बजे तक मतदान होता तो कई और रिकार्ड टूट सकते थे।खैर, कई ऐसे विधानसभा क्षेत्रों ने भी इस बार रिकार्ड तोड़ा है जो नक्सल प्रभावित होने के बावजूद चुनाव आयोग के खाते में नहीं थे। इन्हीं में एक है बरूराज, जहां पिछले दो चुनावों में क्रमश: 48.3 व 48.45 फीसदी वोट डाले गए थे। इस बार यहां 53 फीसदी मतदान हुआ है। इसी तरह पूर्वी चंपारण जिले के पिपरा में इस बार दो 57 फीसदी वोट पड़े हैं। जबकि दो चुनावों में यहां क्रमश: 46.38 और 47.64 फीसदी ही वोट डाले गए थे। यही हाल मधुबन का भी रहा। यहां गत दो चुनावों में क्रमश: 44.42 और 47.98 प्रतिशत वोट डाले गए थे। इस बार 58 फीसदी लोगों ने वोट डाला है। वहीं ढाका में रिकार्ड तोड़ 61 फीसदी वोटिंग हुई है। जबकि दो चुनावों में यहां क्रमश: 42.43 और 44.38 फीसदी लोगों ने ही मतदान किया था। यही नहीं नवसृजित चिरैया में 61 और नरकटिया में 59 प्रतिशत मतदान की सूचना है। चौंकाने वाली बात यह है कि नक्सल प्रभावित होने के बावजूद यहां शाम पांच बजे तक न सिर्फ मतदान हुआ बल्कि शानदार वोटिंग भी हुई।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

कल्याणी के आंगन में नहीं 'नाचे' प्रत्याशी

मुजफ्फरपुर : बस दो पल के लिए जिंदगी के दुख-दर्द से बाहर निकलकर कल्पना लोक में चले आइए। फर्ज कीजिए, आप एक चौराहे पर खड़े हैं। यह शहर की ह्रदय स्थली के रूप में मशहूर है। यहां से निकलने वाले रास्ते चार दिशाओं में जाने का संकेत देते हैं। मौसम चुनावी है और दीवाली भी दस्तक दे रही है। इसलिए चौराहे के आसपास बाजार भी चहक रहे हैं। इसी बीच चुनाव प्रचार का अंतिम दिन भी आ टपका। सभा के लिए शाम पांच बजे का वक्त अंतिम डेडलाइन है। करीब तीन बजे से चौराहे पर दलों के प्रत्याशी अपने झंडा-बैनर के साथ टपकने लगते हैं। बारी-बारी शुरू हो जाता है चुनावी भाषण मुकाबला। ना कोई मारपीट, ना कोई हंगामा। लेकिन, सब छोड़ते हैं एक दूसरे पर जहर बुझे तीर। इतना ही नहीं खुलकर रखते हैं अपनी बात। भाषण के वजन के हिसाब से बटोरते हैं तालियां भी। और पांच बजते ही अपने-अपने चुनावी आशियानों की ओर कर जाते हैं प्रस्थान। अब आंख खोलिए और खुद से सवाल कीजिए- क्या ऐसी आदर्श व्यवस्था कहीं संभव है? बहुतेरों का जवाब होगा- नहीं। पर, इस शहर में कई-कई चुनावों को देख चुके लोग तुरंत बोल पड़ेंगे- यह तो कल्याणी चौक का नजारा है।

मुजफ्फरपुर सूबे का इकलौता ऐसा अनूठा शहर रहा है जहां चुनाव प्रचार के अंतिम दिन एक ही चौराहे पर सभी प्रत्याशी जनता से अपनी बात कहने के लिए खुद जुटते हैं। कोई आयोजक या प्रायोजक नहीं होता है। प्रत्याशी प्रचार गाडिय़ों पर बने मंच पर खड़ा होकर ही पब्लिक से मुखातिब होते हैं। गत लोकसभा चुनाव हो या फरवरी और अक्टूबर 2005 का विधानसभा चुनाव या फिर उससे पहले के चुनाव, सभी उस अनूठे नजारे को देख चुके हैं। पर, इस बार शहरवासी वैसे नजारे नहीं देख पाए। हालांकि शुक्रवार को चुनाव प्रचार का अंतिम दिन होने के कारण परंपरा के मुताबिक सैकड़ों लोग तीन बजे तक कल्याणी चौक पहुंच गए थे। सबकी आंखें प्रत्याशियों की बाट जोह रही थीं। आंखें उनसे कुछ सवाल करना चाहती थीं। बदरंग होती शहर की सूरत के बारे में। बेरोजगार घूमते हाथों के बारे में। गंदी बस्तियों में पानी के बारे में। बिजली के बारे में...। पर, पहुंचने के बाद ज्योंही पता चला कि इस बार चुनाव आयोग ने सिर्फ एक ही प्रत्याशी को यहां सभा करने की इजाजत दी है। आंखों में सवाल तैरते रह गए। चेहरे उतर गए। घर लौटते वक्त बस एक ही बात जेहन में उमड़ -घुमड़ रही थी- एक परंपरा टूट गई, जो लंबे काल से चली आ रही थी।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

एक गीत तुम्‍हारे नाम


भाड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम तो हिन्‍द के रखवाले हैं
रोटी दे दो, पानी दे दो
छत दे दो, कपड़े दे दो
हम कहां इबादत करने वाले हैं।


भांड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम बच्‍चन को पढ़ने वाले हैं
रुपये दे दो, पैसे दे दो
दवा दे दो, दारू दे दो
हम कहां अयोध्‍या जाने वाले हैं।


भांड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम मजदूर कहलाने वाले हैं
जंगल दे दो, जमीन दे दो
बीज दे दो, खाद दे दो
हम कहां धाम धांगने वाले हैं।


भांड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम इंकलाब कहने वाले हैं
गद्दी छोड़ों गद्दार कहीं के
हम सत्‍ता में आने वाले हैं।
हम सत्‍ता में आने वाले हैं।


(रामजन्‍मभूमि- बाबरी मस्‍िजद विवाद पर हाईकोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले पर प्रतिक्रिया)
- एम. अखलाक

शनिवार, 25 सितंबर 2010

बिहार में कांग्रेस के दो अध्यक्ष!

कांग्रेस और राजद की वेबसाइट अपडेट नहीं

इन दिनों बिहार कांग्रेस कमेटी में दो प्रदेश अध्यक्ष कार्यरत हैं! चौंकिए मत, यकीन नहीं आता तो देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी कांग्रेस की वेबसाइट पर आपका स्वागत है। पार्टी की केन्द्रीय वेबसाइट के अनुसार अनिल शर्मा अब भी अपने पद पर बने हुए हैं। वहीं प्रदेश कमेटी की वेबसाइट कहती है कि चौधरी महबूब अली कैसर ने मोर्चा संभाल रखा है।

बदलते जमाने को ध्यान में रखकर एक तरफ कांग्रेस पार्टी जहां अपने हर काम को हाईटेक और प्रोफेशनल अंदाज में अंजाम देना चाहती है। कार्यकर्ता बनाने से लेकर चुनाव प्रचारों के लिए लेटेस्ट तकनीक का सहारा ले रही है। इंटरनेट के माध्यम से समर्थक बना रही है। वहीं अपनी वेबसाइट तक अपडेट नहीं कर पा रही है। इसी का परिणाम है कि केन्द्रीय वेबसाइट पर जिन प्रदेश अध्यक्षों की सूची जारी की गई है उनमें अनिल शर्मा का ही नाम, पता और फोन नंबर शो किया गया है। जबकि श्री शर्मा इस वर्ष के जून में ही प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिए गए हैं। सूबे में फिलहाल उनकी कुर्सी पर चौधरी महबूब अली कैसर अध्यक्ष की भूमिका में हैं।

मालूम हो कि केन्द्रीय वेबसाइट पर कुल 36 प्रदेश अध्यक्षों के नाम, पते व फोन नंबर दिए गए हैं। इसके साथ ही प्रदेश कमेटी के वेबसाइट लिंक भी उपलब्ध कराए गए हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पार्टी अब तक छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, राजस्थान, पंजाब, उडि़सा, तमिलनाडु, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, दमन एंड द्वीव और लक्षद्वीप कमेटी के लिए वेबसाइट विकसित नहीं कर पाई है।

कायम है राजद का कांग्रेस प्रेम

इस चुनावी फिजां में राजद और कांग्रेस भले ही एक दूसरे को पानी पीकर कोसते रहे हों, लेकिन सच्चाई कुछ और है! जी हां, यह राजद की वेबसाइट बोलती है। पार्टी ने जिस वेबपेज पर अपने तमाम विधायकों की सूची जारी कर रखी है उसके माथे पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री डा। मनमोहन सिंह की तस्वीरें भी मौजूद हैं। इन तस्वीरों में राजद सुप्रीमो जहां कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी से बातचीत कर रहे हैं, वहीं डा। मनमोहन सिंह चुपचाप' तमाशा देख रहे हैं।

रिपोर्ट - एम. अखलाक

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

उत्तर बिहार में डटे हैं जन संगठन भी

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है और रफ्ता-रफ्ता सियासी सरगर्मियां परवान चढ़ रही हैं। इसी के साथ उत्तर बिहार की फिजां में तैरने लगी है जन संगठनों की आवाज, जो चुनावी मुद्दा बनने को बेकरार है और जो वर्षों से सियासी झांसा झेल रही है। अपनी मांगों के लिए जब-जब इन संगठनों ने नारे बुलंद किए, आंदोलन को आगे बढ़े, तब-तब इन्हें सहलाया गया, बहलाया गया। अब जबकि चुनाव सामने है और सियासी पार्टियां उनके मुद्दे-मांगों से मुंह मोड़े हुए है, ऐसे में संगठनों ने भी अपनी कमर कस ली है। इस बार वे अपने मुद्दे को गरम करने की फिराक में अभी से जुट गए हैं। आइए जानें किस संगठन का क्या है मुद्दा?

आरटीई कानून लागू हो : बिहार में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू करने की मांग को लेकर 'भूमिका विहार' आंदोलन चला रहा है। पिछले दिनों पटना और मुजफ्फरपुर में यह संगठन राजनीतिक दलों और प्रबुद्धजनों के साथ सम्मेलन आयोजित कर अपनी मांगों को उनके समक्ष रख चुका है। संगठन की मांग है कि सियासी दल इस मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा पत्रों में शामिल करें। संगठन के अरुण कुमार सिंह कहते हैं कि सामाजिक मुद्दों से सियासी दलों का कोई नाता नहीं रह गया है। इस बार उनकी कोशिश होगी कि संगठन की मांग की ओर सियासी पार्टियां ध्यान दे और उसे अमल में लाने की भरपूर कोशिश करे।

सांस्कृतिक नीति जमीन पर उतरे : सूबे की सांस्कृतिक नीति 2004 को जमीन पर उतारने, लोक कलाओं व कलाकारों के संरक्षण के लिए अलग कला और कलाकार आयोग गठित करने, कलाकार नीति बनाने और सभी जिलों में कला प्रदर्शन के लिए नगर भवन व ऑडिटोरियम नि:शुल्क करने के लिए 'गांव जवार' पिछले एक साल से आंदोलन चला रहा है। यह संगठन भी पटना व मुजफ्फरपुर में सम्मेलन कर सियासी दलों से इन्हें चुनावी घोषणा पत्रों में शामिल करने की मांग कर चुका है। संगठन के डा. कौशल किशोर चौधरी कहते हैं कि पक्ष-विपक्ष की सियासत करने वाले नेताओं को इस बार संगठन के मुद्दों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया जाएगा। मुजफ्फरपुर थियेटर एसोसिएशन भी पिछले दिनों चुनावी घोषणा पत्रों में सांस्कृतिक सवालों को स्थान देने की मांग को लेकर विचार गोष्ठी आयोजित कर चुका है। 'इप्टा' भी इन्हीं सवालों को लेकर शहर में धरना-प्रदर्शन कर चुका है। उधर, 'बेटी बचाओ आंदोलन' ट्रैफिकिंग की रोकथाम के लिए ठोस पहल करने व नाच पार्टियों में काम करने वाले कलाकारों को मजदूर का दर्जा देने की कई वर्षों से वकालत कर रहा है।

मैथिली की आवाज भी सुनिए : मिथिलांचल में 'विद्यापति सेवा संस्थान' प्रबुद्धजनों की बैठक में प्रस्ताव पारित कर सियासी दलों से मैथिली भाषा में ही बैनर-पोस्टर व चुनावी घोषणा पत्र जारी करने की मांग कर चुका है। संस्था के सदस्यों को कहना है कि इस बार यदि ऐसा नहीं हुआ तो सियासी दलों को संगठन का विरोध झेलना होगा।

मिथिला राज्य की भी है मांग : अखिल भारतीय मिथिला पार्टी पिछले कई वर्षों से अलग मिथिला राज्य बनाने की मांग कर रही है। नेतागण भरोसा देते हैं, बैक से समर्थन की बात करते हैं, पर जब चुनाव आता है तो मुद्दा गौण हो जाता है। संगठन के पदाधिकारी इस साफ आश्वासन के बाद भी नेताओं को वोट देने का मन बना रहे हैं। इसके लिए वे जागरुकता अभियान भी चलाने की सोच रहे हैं।

बज्जिकांचल भी है आवाज : बज्जिकांचल विकास पार्टी भी वर्षों से अलग बज्जिकांचल राज्य बनाने की मांग को लेकर संषर्घरत है। इस संगठन के कार्यकर्ता तो अब चुनावी मैदान में उतरकर जन समर्थन बटोरने लगे हैं। इस बार भी वे अपनी आवाज जनता और सियासत तक पहुंचाने की जुगत में हैं।

रिपोर्ट - एम. अखलाक

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

'नफरत हो गई है मां शब्द से'


ट्रैफिकिंग की शिकार कोलकाता की रिम्पा ने सुनाई आपबीती


मां शब्द से अब मुझे नफरत हो गई है। जो सगी थी उसने दो हजार में बेच डाला। फिर प्यार से जिसको अम्मा कहा उसने भी कहीं का नहीं छोड़ा। अब तो किसी पर यकीन ही नहीं आता। इतना कहते कहते रिम्पा की आंखे नम हो जाती हैं। बकौल रिम्पा, कोलकाता के आमरा थाना स्थित बारासाथ की रहने वाली हूं। मां अनारा बीबी, पिता गणेश कर्मकार, पांच बहनों और चार भाइयों के संग रहती थी। तारीख और ट्रेन का नाम याद नहीं पर दो माह पहले मेरी मां ने पड़ोस की एक महिला की बेटी के साथ मुझे आर्केस्ट्रा में काम करने के लिए छपरा भेज दिया। यहां आई तो पता चला कि दो हजार में बेच दी गई हूं। मुझे नाचने और साथ में सोने के लिए कहा जाता था। ऐसा नहीं करने पर आर्केस्ट्रा मालिक मेरे साथ मारपीट करते थे। कहते थे- तुम्हारी मां को रुपये देकर तुम्हे खरीदा है। मेरी मर्जी तुम्हारे साथ मैं जो करूं। तंग आकर 15 दिन पहले भाग गई। ट्रेन पकड़कर मुजफ्फरपुर पहुंच गई। काफी देर तक जंक्शन पर बैठी रही। यहां मुझे दो महिलाएं मिलीं। मैंने आपबीती सुनाई। उन्होंने कहा- चलो, मेरे साथ रहो। तुम्हे कोई दिक्कत नहीं होगी। तीन दिनों तक उन्होंने मुझे साथ रखा। मैं उन्हें अम्मा कहकर बुलाने लगी। फिर मुझे दिल्ली ले गई। उन्होंने वहां मुझे बेचने की कोशिश की। पुलिस ने हम सभी को पकड़ लिया। फिर उन्होंने पुलिस को पैसे दिए। हम सभी छूट गए। फिर हमको लेकर नेपाल चली गई। वहां दो दिनों तक प्लेटफार्म पर रही। एक महिला हमेशा मेरे पास रहती। मंगलवार की देर रात मुजफ्फरपुर जंक्शन पहुंची, और मुझे रिक्शा से लेकर कहीं चले गए। बुधवार की सुबह ट्रेन पकड़ने के लिए मुझे लेकर फिर जंक्शन पहुंची। इसी बीच मैंने एक यात्री से बचाने की गुहार लगाई। फिर उसने मुझे पुलिस के पास पहुंचा दिया।


बहरहाल, ट्रैफिकिंग की शिकार 16 वर्षीय रिम्पा को जीआरपी ने मुजफ्फरपुर की स्वयंसेवी संस्‍था निर्देश के हवाले कर दिया है। थानाध्यक्ष शशि भूषण सिंह के अनुसार पुलिस मामले की छानबीन कर रही है। उधर, निर्देश से जुड़ी शांति देवी ने कहा कि रिम्पा यदि घर जाना चाहेगी तो उसे वहां भेज दिया जाएगा। नहीं तो यहीं प्रशिक्षण देकर उसे रोजगार मुहैया कराई जाएगी।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

सेहत से 'खेल' रहे प्राइवेट कर्मचारी

घटना एक - 17 अप्रैल 2010 को राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापिका डा. अरुणिमा कुमारी के 48 वर्षीय पति ललन चौधरी ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली। चौधरी एक निजी मोबाइल कंपनी में जोनल आपरेशनल मैनेजर के पद पर दरभंगा में कार्यरत थे। प्रो. अरुणिमा के मुताबिक उनके पति इन दिनों कंपनी के काम से मानसिक तनाव में रहते थे। पुलिस मामले की छानबीन में जुटी है।

घटना दो - 16 अप्रैल 2010 को समस्तीपुर के शेखोपुर गांव में पेड़ से लटका दरभंगा निवासी गिरेन्द्र साह का शव बरामद हुआ था। मृतक ने अपने सुसाइट नोट में कह रखा है कि वह लोक शिक्षक था। उसे कुछ साल पहले हटा दिया गया। इस कारण वह आत्महत्या कर रहा है। पुलिस मामले की छानबीन में जुटी है।यह दोनों ताजा घटनाएं अस्थाई जॉब करने वाले कर्मचारियों से जुड़ी हैं। एक प्राइवेट कंपनी का कर्मचारी रहा है, तो दूसरा सरकारी स्कूल का संविदा शिक्षक। यानी दोनों के जॉब की कोई गारंटी नहीं। एक की आत्महत्या का कारण बना काम का दबाव तो दूसरे की वजह बनी बेरोजगारी। दरअसल, प्राइवेट जॉब करने वालों की जिंदगी में तनाव दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह है प्रतिस्पद्र्धा व लक्ष्य पूरा करने की होड़ में खुद पर ध्यान नहीं दे पाना, हमेशा तनावग्रस्त रहना और भरपूर नींद नहीं ले पाना। पहले ऐसी घटनाएं सिर्फ बड़े शहरों में ही होती थीं, लेकिन अब उत्तर बिहार भी जद में है। मुजफ्फरपुर समेत सभी छोटे शहरों में प्राइवेट कंपनियां पधार चुकी हैं। इन्होंने हजारों हाथों को काम भी दे रखा है, पर जॉब में टिके रहने के लिए जिस तरह टारगेट मिल रहा है उससे कर्मचारियों की जिंदगी ही बदरंग होती जा रही है।

सर्वे भी बयां कर रहा सच्‍चाई
चेम्बर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री आफ इंडिया द्वारा जारी एक हेल्थ केयर स्टेट्स रिपोर्ट में कहा गया है कि 24 फीसदी कारपोरेट कर्मचारियों में लक्ष्य और काम के दबाव के कारण हाईपरटेंशन, शुगर और अन्य बीमारियां हो रही हैं। मुजफ्फरपुर शहर के भी कई वरीय डाक्टर इस बात को स्वीकार कर रहे हैं। इनकी मानें तो काम के साथ शरीर का ख्याल नहीं रखने के कारण समस्याएं बढ़ रही हैं। तनाव की अधिकता से आत्महत्या की प्रवृति चिंताजनक है।

'' लंबे समय तक आफिस में काम करने के बाद सिर्फ 5-6 घंटे की नींद से हम फ्रेश महसूस नहीं करते। इससे थकान व सिर दर्द की समस्या होती है। यदि हालात ऐसे ही रहे तो 50 वर्ष में ही शरीर रिटायर हो जाएगा। '' - ओम प्रकाश, कारपोरेट कर्मी

'' लक्ष्य निर्धारण वाले काम में दिन और रात का फर्क नहीं रहता। सारा ध्यान लक्ष्य पर टिका रहता है। जिसके कारण नींद पूरी नहीं होती। इससे हमेशा तनाव एवं सुस्ती बनी रहती है। '' - संतोष कुमार राज, एलआईसी अभिकर्ता

'' काम की अधिकता के कारण सिर बोझिल हो जाता है। दर्द की दवा भी लेनी पड़ती है। 5 से 6 घंटे की नींद ही रोज की दिनचर्या बन गई है। इसके कारण कभी-कभी आत्मविश्वास भी डिगने लगता है। '' - सविता सिंह, कारपोरेट कर्मी

'' काम के दबाव में शहर के लोग पूरी नींद नहीं ले रहे है। इसके कारण थकान, सिर दर्द, सुस्ती, चिड़चिड़ाहट आदि समस्याएं सामने आ रही है। अत्यधिक आत्मविश्वास कमजोर होने के कारण व्यक्ति में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति भी आ रही है। तनाव से बचने के लिए लोगों को 6 से 7 घंटे की नींद के साथ योग की भी आदत डालनी चाहिए। ''
- डा. गणेश प्रसाद सिंह, वरीय मनोचिकित्सक, एसकेमेडिकल कालेज