सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना

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शनिवार, 25 सितंबर 2010

बिहार में कांग्रेस के दो अध्यक्ष!

कांग्रेस और राजद की वेबसाइट अपडेट नहीं

इन दिनों बिहार कांग्रेस कमेटी में दो प्रदेश अध्यक्ष कार्यरत हैं! चौंकिए मत, यकीन नहीं आता तो देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी कांग्रेस की वेबसाइट पर आपका स्वागत है। पार्टी की केन्द्रीय वेबसाइट के अनुसार अनिल शर्मा अब भी अपने पद पर बने हुए हैं। वहीं प्रदेश कमेटी की वेबसाइट कहती है कि चौधरी महबूब अली कैसर ने मोर्चा संभाल रखा है।

बदलते जमाने को ध्यान में रखकर एक तरफ कांग्रेस पार्टी जहां अपने हर काम को हाईटेक और प्रोफेशनल अंदाज में अंजाम देना चाहती है। कार्यकर्ता बनाने से लेकर चुनाव प्रचारों के लिए लेटेस्ट तकनीक का सहारा ले रही है। इंटरनेट के माध्यम से समर्थक बना रही है। वहीं अपनी वेबसाइट तक अपडेट नहीं कर पा रही है। इसी का परिणाम है कि केन्द्रीय वेबसाइट पर जिन प्रदेश अध्यक्षों की सूची जारी की गई है उनमें अनिल शर्मा का ही नाम, पता और फोन नंबर शो किया गया है। जबकि श्री शर्मा इस वर्ष के जून में ही प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिए गए हैं। सूबे में फिलहाल उनकी कुर्सी पर चौधरी महबूब अली कैसर अध्यक्ष की भूमिका में हैं।

मालूम हो कि केन्द्रीय वेबसाइट पर कुल 36 प्रदेश अध्यक्षों के नाम, पते व फोन नंबर दिए गए हैं। इसके साथ ही प्रदेश कमेटी के वेबसाइट लिंक भी उपलब्ध कराए गए हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पार्टी अब तक छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, राजस्थान, पंजाब, उडि़सा, तमिलनाडु, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, दमन एंड द्वीव और लक्षद्वीप कमेटी के लिए वेबसाइट विकसित नहीं कर पाई है।

कायम है राजद का कांग्रेस प्रेम

इस चुनावी फिजां में राजद और कांग्रेस भले ही एक दूसरे को पानी पीकर कोसते रहे हों, लेकिन सच्चाई कुछ और है! जी हां, यह राजद की वेबसाइट बोलती है। पार्टी ने जिस वेबपेज पर अपने तमाम विधायकों की सूची जारी कर रखी है उसके माथे पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री डा। मनमोहन सिंह की तस्वीरें भी मौजूद हैं। इन तस्वीरों में राजद सुप्रीमो जहां कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी से बातचीत कर रहे हैं, वहीं डा। मनमोहन सिंह चुपचाप' तमाशा देख रहे हैं।

रिपोर्ट - एम. अखलाक

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

उत्तर बिहार में डटे हैं जन संगठन भी

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है और रफ्ता-रफ्ता सियासी सरगर्मियां परवान चढ़ रही हैं। इसी के साथ उत्तर बिहार की फिजां में तैरने लगी है जन संगठनों की आवाज, जो चुनावी मुद्दा बनने को बेकरार है और जो वर्षों से सियासी झांसा झेल रही है। अपनी मांगों के लिए जब-जब इन संगठनों ने नारे बुलंद किए, आंदोलन को आगे बढ़े, तब-तब इन्हें सहलाया गया, बहलाया गया। अब जबकि चुनाव सामने है और सियासी पार्टियां उनके मुद्दे-मांगों से मुंह मोड़े हुए है, ऐसे में संगठनों ने भी अपनी कमर कस ली है। इस बार वे अपने मुद्दे को गरम करने की फिराक में अभी से जुट गए हैं। आइए जानें किस संगठन का क्या है मुद्दा?

आरटीई कानून लागू हो : बिहार में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू करने की मांग को लेकर 'भूमिका विहार' आंदोलन चला रहा है। पिछले दिनों पटना और मुजफ्फरपुर में यह संगठन राजनीतिक दलों और प्रबुद्धजनों के साथ सम्मेलन आयोजित कर अपनी मांगों को उनके समक्ष रख चुका है। संगठन की मांग है कि सियासी दल इस मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा पत्रों में शामिल करें। संगठन के अरुण कुमार सिंह कहते हैं कि सामाजिक मुद्दों से सियासी दलों का कोई नाता नहीं रह गया है। इस बार उनकी कोशिश होगी कि संगठन की मांग की ओर सियासी पार्टियां ध्यान दे और उसे अमल में लाने की भरपूर कोशिश करे।

सांस्कृतिक नीति जमीन पर उतरे : सूबे की सांस्कृतिक नीति 2004 को जमीन पर उतारने, लोक कलाओं व कलाकारों के संरक्षण के लिए अलग कला और कलाकार आयोग गठित करने, कलाकार नीति बनाने और सभी जिलों में कला प्रदर्शन के लिए नगर भवन व ऑडिटोरियम नि:शुल्क करने के लिए 'गांव जवार' पिछले एक साल से आंदोलन चला रहा है। यह संगठन भी पटना व मुजफ्फरपुर में सम्मेलन कर सियासी दलों से इन्हें चुनावी घोषणा पत्रों में शामिल करने की मांग कर चुका है। संगठन के डा. कौशल किशोर चौधरी कहते हैं कि पक्ष-विपक्ष की सियासत करने वाले नेताओं को इस बार संगठन के मुद्दों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया जाएगा। मुजफ्फरपुर थियेटर एसोसिएशन भी पिछले दिनों चुनावी घोषणा पत्रों में सांस्कृतिक सवालों को स्थान देने की मांग को लेकर विचार गोष्ठी आयोजित कर चुका है। 'इप्टा' भी इन्हीं सवालों को लेकर शहर में धरना-प्रदर्शन कर चुका है। उधर, 'बेटी बचाओ आंदोलन' ट्रैफिकिंग की रोकथाम के लिए ठोस पहल करने व नाच पार्टियों में काम करने वाले कलाकारों को मजदूर का दर्जा देने की कई वर्षों से वकालत कर रहा है।

मैथिली की आवाज भी सुनिए : मिथिलांचल में 'विद्यापति सेवा संस्थान' प्रबुद्धजनों की बैठक में प्रस्ताव पारित कर सियासी दलों से मैथिली भाषा में ही बैनर-पोस्टर व चुनावी घोषणा पत्र जारी करने की मांग कर चुका है। संस्था के सदस्यों को कहना है कि इस बार यदि ऐसा नहीं हुआ तो सियासी दलों को संगठन का विरोध झेलना होगा।

मिथिला राज्य की भी है मांग : अखिल भारतीय मिथिला पार्टी पिछले कई वर्षों से अलग मिथिला राज्य बनाने की मांग कर रही है। नेतागण भरोसा देते हैं, बैक से समर्थन की बात करते हैं, पर जब चुनाव आता है तो मुद्दा गौण हो जाता है। संगठन के पदाधिकारी इस साफ आश्वासन के बाद भी नेताओं को वोट देने का मन बना रहे हैं। इसके लिए वे जागरुकता अभियान भी चलाने की सोच रहे हैं।

बज्जिकांचल भी है आवाज : बज्जिकांचल विकास पार्टी भी वर्षों से अलग बज्जिकांचल राज्य बनाने की मांग को लेकर संषर्घरत है। इस संगठन के कार्यकर्ता तो अब चुनावी मैदान में उतरकर जन समर्थन बटोरने लगे हैं। इस बार भी वे अपनी आवाज जनता और सियासत तक पहुंचाने की जुगत में हैं।

रिपोर्ट - एम. अखलाक

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

'नफरत हो गई है मां शब्द से'


ट्रैफिकिंग की शिकार कोलकाता की रिम्पा ने सुनाई आपबीती


मां शब्द से अब मुझे नफरत हो गई है। जो सगी थी उसने दो हजार में बेच डाला। फिर प्यार से जिसको अम्मा कहा उसने भी कहीं का नहीं छोड़ा। अब तो किसी पर यकीन ही नहीं आता। इतना कहते कहते रिम्पा की आंखे नम हो जाती हैं। बकौल रिम्पा, कोलकाता के आमरा थाना स्थित बारासाथ की रहने वाली हूं। मां अनारा बीबी, पिता गणेश कर्मकार, पांच बहनों और चार भाइयों के संग रहती थी। तारीख और ट्रेन का नाम याद नहीं पर दो माह पहले मेरी मां ने पड़ोस की एक महिला की बेटी के साथ मुझे आर्केस्ट्रा में काम करने के लिए छपरा भेज दिया। यहां आई तो पता चला कि दो हजार में बेच दी गई हूं। मुझे नाचने और साथ में सोने के लिए कहा जाता था। ऐसा नहीं करने पर आर्केस्ट्रा मालिक मेरे साथ मारपीट करते थे। कहते थे- तुम्हारी मां को रुपये देकर तुम्हे खरीदा है। मेरी मर्जी तुम्हारे साथ मैं जो करूं। तंग आकर 15 दिन पहले भाग गई। ट्रेन पकड़कर मुजफ्फरपुर पहुंच गई। काफी देर तक जंक्शन पर बैठी रही। यहां मुझे दो महिलाएं मिलीं। मैंने आपबीती सुनाई। उन्होंने कहा- चलो, मेरे साथ रहो। तुम्हे कोई दिक्कत नहीं होगी। तीन दिनों तक उन्होंने मुझे साथ रखा। मैं उन्हें अम्मा कहकर बुलाने लगी। फिर मुझे दिल्ली ले गई। उन्होंने वहां मुझे बेचने की कोशिश की। पुलिस ने हम सभी को पकड़ लिया। फिर उन्होंने पुलिस को पैसे दिए। हम सभी छूट गए। फिर हमको लेकर नेपाल चली गई। वहां दो दिनों तक प्लेटफार्म पर रही। एक महिला हमेशा मेरे पास रहती। मंगलवार की देर रात मुजफ्फरपुर जंक्शन पहुंची, और मुझे रिक्शा से लेकर कहीं चले गए। बुधवार की सुबह ट्रेन पकड़ने के लिए मुझे लेकर फिर जंक्शन पहुंची। इसी बीच मैंने एक यात्री से बचाने की गुहार लगाई। फिर उसने मुझे पुलिस के पास पहुंचा दिया।


बहरहाल, ट्रैफिकिंग की शिकार 16 वर्षीय रिम्पा को जीआरपी ने मुजफ्फरपुर की स्वयंसेवी संस्‍था निर्देश के हवाले कर दिया है। थानाध्यक्ष शशि भूषण सिंह के अनुसार पुलिस मामले की छानबीन कर रही है। उधर, निर्देश से जुड़ी शांति देवी ने कहा कि रिम्पा यदि घर जाना चाहेगी तो उसे वहां भेज दिया जाएगा। नहीं तो यहीं प्रशिक्षण देकर उसे रोजगार मुहैया कराई जाएगी।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

सेहत से 'खेल' रहे प्राइवेट कर्मचारी

घटना एक - 17 अप्रैल 2010 को राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापिका डा. अरुणिमा कुमारी के 48 वर्षीय पति ललन चौधरी ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली। चौधरी एक निजी मोबाइल कंपनी में जोनल आपरेशनल मैनेजर के पद पर दरभंगा में कार्यरत थे। प्रो. अरुणिमा के मुताबिक उनके पति इन दिनों कंपनी के काम से मानसिक तनाव में रहते थे। पुलिस मामले की छानबीन में जुटी है।

घटना दो - 16 अप्रैल 2010 को समस्तीपुर के शेखोपुर गांव में पेड़ से लटका दरभंगा निवासी गिरेन्द्र साह का शव बरामद हुआ था। मृतक ने अपने सुसाइट नोट में कह रखा है कि वह लोक शिक्षक था। उसे कुछ साल पहले हटा दिया गया। इस कारण वह आत्महत्या कर रहा है। पुलिस मामले की छानबीन में जुटी है।यह दोनों ताजा घटनाएं अस्थाई जॉब करने वाले कर्मचारियों से जुड़ी हैं। एक प्राइवेट कंपनी का कर्मचारी रहा है, तो दूसरा सरकारी स्कूल का संविदा शिक्षक। यानी दोनों के जॉब की कोई गारंटी नहीं। एक की आत्महत्या का कारण बना काम का दबाव तो दूसरे की वजह बनी बेरोजगारी। दरअसल, प्राइवेट जॉब करने वालों की जिंदगी में तनाव दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह है प्रतिस्पद्र्धा व लक्ष्य पूरा करने की होड़ में खुद पर ध्यान नहीं दे पाना, हमेशा तनावग्रस्त रहना और भरपूर नींद नहीं ले पाना। पहले ऐसी घटनाएं सिर्फ बड़े शहरों में ही होती थीं, लेकिन अब उत्तर बिहार भी जद में है। मुजफ्फरपुर समेत सभी छोटे शहरों में प्राइवेट कंपनियां पधार चुकी हैं। इन्होंने हजारों हाथों को काम भी दे रखा है, पर जॉब में टिके रहने के लिए जिस तरह टारगेट मिल रहा है उससे कर्मचारियों की जिंदगी ही बदरंग होती जा रही है।

सर्वे भी बयां कर रहा सच्‍चाई
चेम्बर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री आफ इंडिया द्वारा जारी एक हेल्थ केयर स्टेट्स रिपोर्ट में कहा गया है कि 24 फीसदी कारपोरेट कर्मचारियों में लक्ष्य और काम के दबाव के कारण हाईपरटेंशन, शुगर और अन्य बीमारियां हो रही हैं। मुजफ्फरपुर शहर के भी कई वरीय डाक्टर इस बात को स्वीकार कर रहे हैं। इनकी मानें तो काम के साथ शरीर का ख्याल नहीं रखने के कारण समस्याएं बढ़ रही हैं। तनाव की अधिकता से आत्महत्या की प्रवृति चिंताजनक है।

'' लंबे समय तक आफिस में काम करने के बाद सिर्फ 5-6 घंटे की नींद से हम फ्रेश महसूस नहीं करते। इससे थकान व सिर दर्द की समस्या होती है। यदि हालात ऐसे ही रहे तो 50 वर्ष में ही शरीर रिटायर हो जाएगा। '' - ओम प्रकाश, कारपोरेट कर्मी

'' लक्ष्य निर्धारण वाले काम में दिन और रात का फर्क नहीं रहता। सारा ध्यान लक्ष्य पर टिका रहता है। जिसके कारण नींद पूरी नहीं होती। इससे हमेशा तनाव एवं सुस्ती बनी रहती है। '' - संतोष कुमार राज, एलआईसी अभिकर्ता

'' काम की अधिकता के कारण सिर बोझिल हो जाता है। दर्द की दवा भी लेनी पड़ती है। 5 से 6 घंटे की नींद ही रोज की दिनचर्या बन गई है। इसके कारण कभी-कभी आत्मविश्वास भी डिगने लगता है। '' - सविता सिंह, कारपोरेट कर्मी

'' काम के दबाव में शहर के लोग पूरी नींद नहीं ले रहे है। इसके कारण थकान, सिर दर्द, सुस्ती, चिड़चिड़ाहट आदि समस्याएं सामने आ रही है। अत्यधिक आत्मविश्वास कमजोर होने के कारण व्यक्ति में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति भी आ रही है। तनाव से बचने के लिए लोगों को 6 से 7 घंटे की नींद के साथ योग की भी आदत डालनी चाहिए। ''
- डा. गणेश प्रसाद सिंह, वरीय मनोचिकित्सक, एसकेमेडिकल कालेज

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

यह ठीक नहीं हो रहा नर्मदा माई

नर्मदा माई,

प्रणाम।

12 मार्च को तुमसे मिलने घाट पर पहली बार आया था। तुमको लहराते देखकर बचपन याद आ गया। तब गांव की छठी मइया के पोखर में दादी के संग नहाने जाया करता था। दादी कहती थी- पहले इसमें कोई साबुन से नहीं नहाता था। इसी पानी से हमलोग दाल पकाते थे। खूब पीला॥ जल्दी गल जाता था, लेकिन दादी के मरने से पहले ही साला सब सत्यानाश हो गया। राजा-रजवाड़ों के साथ रिवाज भी॥। नर्मदा माई, तुम भी तो अब हमारी छठी माई के पोखर की तरह ही हो गई हो। अब इसी को देखो न! किस तरह रगड़-रगड़ कर साबुन से तुम्हें नाश रहा है। कहता है- आया हूं नर्मदा माई से मिलने, पूजा करने, आशीर्वाद लेने, लेकिन आंख वाले अंधे को सरकारी हिदायत भी दिखाई नहीं देती। देखकर भी अनजान बन जाता है। माई, तुम्हीं इन्हें समझाओ न, आखिर ये तुम्हारे ही तो बेटे हैं? या तुम चुपचाप यों ही खत्म हो जाना चाहती हो?

खैर, मैं तुम्हारी गोद में उतर आया। तैरने नहीं आता। सो, छाती भर पानी में खूब डुबकी लगाई। मन नहीं माना तो तुम्हारी छाती पर नाव के सहारे तैरते हुए प्राचीन शिव मंदिर तक चला गया। हां वही मंदिर, जो अब भी अपने वजूद को बचाये हुए है तुम्हारी तरह। हर आने-जाने वाले को महेश्वर शहर की गौरव गाथा सुनाना नहीं भूलता।

माई! मन भला कैसे मानता? दूसरे दिन फिर सुबह-सबेरे ही तुम्हारे चरणों में आ पहुंचा। नील गगन में लाली बिखेर रहा सूरज तुम्हारे माथे की बिंदिया लग रहा था। तुममें लीन साधु बाबा एकतारा की धुन पर कबीर के दोहे सुना रहे थे। पता है, तुमसे मिलने के लिए दूर-दूर से आई औरतें तो उनको बीच में ही रोक कर तुम्हारी वंदना गीत गाने लगतीं। उनकी आस्था देखकर मेरा मन भी तुम्हारे लिए पसीज गया। सो, मैं भी साधु बाबा और उन औरतों के गीत चाव से सुनता रहा, जो कुछ-कुछ समझ में आए। वह तुमसे कुछ कहना चाहती थीं। अपनी पीड़ा बांटना चाहती थीं।

जानती हो माई, दोपहर में मेधा ताई भी मिली थीं। कह रही थीं- कुछ लोग तुम्हारी छाती चीर कर बांध बना रहे हैं। जिससे बिजली बनायेंगे। बड़े-बड़ों का घर, कारखाना गुलजार होगा। फिर तुम्हारे अपने बेटे तुमसे बहुत दूर चले जाएंगे। उनके गांव भी उजड़ जायेंगे। कुछ नहीं बचेगा। तभी तो तुम्हारे बेटे तुम्हें बचाने के लिए लड़ भी रहे हैं। जेल जाते हैं, छूटकर आते हैं, फिर लड़ते हैं, बार-बार लड़ते हैं और समवेत स्वर में कहते हैं- लड़ेंगे, जीतेंगे। माई, उनका क्या होगा पता नहीं, पर बेटे लड़ रहे हैं। और लड़े भी क्यों नहीं? तुम्हीं से तो उनकी जिंदगी है। तुम्हारे पानी से ही तो उनके खेत साल में तीन-तीन बार सोना उगलते हैं।

लेकिन माई, एक बात तुम्हारे तट पर अच्छी नहीं लगी। तीसरे दिन जो कुछ मैंने अपनी आंखों देखा, कलेजा मुंह को आ गया! मेरी जगह कोई भी होता उसका भी यही हाल होता। रोली तो रो ही पड़ी। और रोए भी क्यों नहीं? आखिर कोई कैसे देख-सह सकता है किसी बेबस औरत पर अत्याचार? माई, यह सबकुछ हो रहा था सिर्फ आस्था के नाम पर। तुम्हारी दुहाई दे-देकर ही तो वे महिलाएं उस बेजान-सी औरत का भूत भगा रही थीं। तुम्हारा ही तो हवाला देकर उसके कष्टों को तुम्हारे आंचल में बहाने का नाटक कर रही थीं। माई, उस बेजान-सी औरत को जंजीरों से पीटने की इजाजत क्या सचमुच तुमने दे रखी थी? भला तुम ऐसा कैसे कर सकती हो? तुम इतना क्रूर कैसे हो सकती है? माई, तुम तो जीवनदायिनी हो। तुम तो हरेक की पीड़ा हर कर निर्झर बहते रहने का न्यौता देती हो। तुम्हें ही तो देखने-पूजने के लिए देवी अहिल्या बाई ने तुम्हारे तट पर अपना राज-पाट बसा लिया था। तुम तो उनके लिए भी प्रेरणादायिनी रही हो। फिर ऐसा क्यों है? तुम्हारे सामने कोई अबला क्यों प्रताडि़त होती है? कोई कुछ क्यों नहीं बोलता? ऐसे समय में तुम भी खामोश क्यों हो? माई, काश! तुम्हारी लहरें इस बदनुमा दाग को धो पातीं। तुम्हारी लहरें इस कलंक को बहा ले जातीं। काश! कोई स्त्री तुम्हारे तट पर आकर जंजीरों से नहीं पिटती। यहां आने वाली हर स्त्री तुम्हारा ही गुणगान करती। कितना अच्छा होता जो तुम उन्हें देवी अहिल्या बाई बनने के लिए प्रेरित करती।

माई, माफ करना, जो देखा सो लिख डाला। आखिर तुम्हारा ही तो बेटा हूं। तुमसे नहीं कहूंगा तो किससे कहने जाऊंगा? बहुत जल्द आ रहा हूं तुम्हारे पास। हां, मेधा ताई और तुम्हारे लड़वैए बेटों के साथ मुझे कदम से कदम भी तो मिलाना है, माई! उम्मीद करता हूं अबकी आऊंगा तो शायद कोई साबुन लगाते या कोई तुम्हारी छाती पर बांध बनाते या तुम्हारे तट पर कोई अबला स्त्री प्रताडि़त होती नहीं दिखेगी। हां, सुनाई देंगे तो सिर्फ कबीर के दोहे, तुम्हारे लिए मंगलाचरण गाती हुई औरतें और देवी अहिल्या बाई के त्याग के किस्से।

रिपोर्ट - एम. अखलाक

सोमवार, 25 जनवरी 2010

इतने साल बाद आयी याद


ये हैं महाकवि आचार्य जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री। मुजफ्फरपुर स्थित अपने निराला निकेतन में अपने कुत्‍तों के साथ जीवन बिता रहे हैं। इन्‍हें सरकार ने पदमश्री देने की घोषणा की है। लेकिन आचार्य खुश नहीं है। कहते हैं- इतने साल बाद आई याद।

...और कुत्तों से इस तरह हो गया इश्क

लगा कि उससे मेरा पूर्व जनम का कोई रिश्ता है : आचार्य जानकी वल्लभ शास्‍त्री

मुजफ्फरपुर : यूं तो आपने महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री को गोद में कुत्तों को खेलते-खिलाते कई बार देखा होगा। लेकिन, बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि उन्हें कुत्तों से प्रेम हुआ कैसे? आइए जानते हैं महाकवि के ही शब्दों में, 'बहुत पहले की बात है। निराला निकेतन के लिए जमीन खरीद चुका था। मकान बनाने की तैयारी चल रही थी। मेरी जमीन के सामने प्रतिदिन एक कुत्ता आकर खड़ा हो जाता। शुरू में मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया। फिर वह मेरी निगाहों में चढ़ गया। उसे फटकार कर बहुत बार भगाने की कोशिश की, लेकिन विफल रहा। वह घूम फिर कर आ धमकता। मुझे निहारते रहता। मैं उसे देखकर दंग रह जाता। पता नहीं मुझे कैसे उससे लगाव हो गया। फिर तो वह मेरे साथ ही रहने लगा। मैंने ईश्वर का उपहार समझ कर उसे स्वीकार कर लिया। मुझे लगा कि पूर्व जन्म में उससे मेरा कोई रिश्ता रहा होगा, तभी भगाने का नाम नहीं ले रहा। तभी से कुत्ते भी मेरे वफादार साथी बन गये। देखिए ना, किस तरह मेरी गोद में उछल-कूद रहे हैं। अब इस कुतिए को ही देखिए, इसने चंद रोज पहले ही इन बच्चों को जन्म दिया है, बच्चे मेरी गोद में खेल रहे हैं और यह मेरे बगल में आराम से बैठी है। इसे पता है कि बच्चे सुरक्षित हैं।' यह रोचक संस्मरण आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने नवंबर 2009 में सुनाई थी। मौका था 'कौआ' नामक साहित्यिक पुस्तक के लोकार्पण का। तब सेहत ठीक नहीं होने के कारण वह निराला निकेतन के मंच तक नहीं पहुंच पाये थे। जिस बरामदे में रोजाना बैठते हैं, वहीं पुस्तक का लोकार्पण किया था। शहर के दर्जनों साहित्यकार, प्रकाशक और मीडियाकर्मी इसके गवाह बने थे। इस मौके पर आचार्य ने कोई औपचारिक भाषण तो नहीं दिया, लेकिन बज्जिका रामायण के रचयिता अवधेश्वर अरुण से करीब एक घंटे बातचीत की थी। इसी दरम्यान उन्होंने अपने पशु प्रेम का यह वाक्या भी सुनाया था।बहरहाल, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के संरक्षण में प्रकाशित होने वाली 'बेला' पत्रिका के संपादक विजय शंकर मिश्र के अनुसार निराला निकेतन का निर्माण 1950 में हुआ था। वर्तमान में यहां विनायक और भालचंद्र नामक दो कुत्तों और 40 गायों की समाधि है। ये दोनों महाकवि को बहुत प्यारे थे। 1997 में भालचंद्र और 1998 में विनायक ने इनका साथ छोड़ दिया। आचार्य कहते हैं कि व्यक्ति से धोखे की गुजांइश रहती है, लेकिन पशु जिससे प्रेम करता है, तन-मन से उसी का हो जाता है। फिलहाल, आचार्य के पास तीन कुत्ते और छह गायें हैं जिन्हें दिलो-जां से प्यार करते हैं। उनकी पहली गाय का नाम कृष्णा था।
रपट - एम अखलाक