सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना

LATEST:


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

बदनाम बस्ती भी बन गई 'हस्ती'

स्मृति शेष : अब न होगा कोई दूजा जानकीवल्लभ सूरज एक है, चंदा एक है, जमीं व आसमां एक हैं। हम चाहें लाख इन जैसा कुछ और बना डालें, मगर इनका कोई और विकल्प नहीं हो सकता। आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री पर भी कुछ यही बातें अक्षरश: लागू होती हैं। उनके विराट व्यक्तित्व के आगे बहुत कुछ बौना दिखता है। महज गीत, कविता लेखन और पशु प्रेम तक ही वे नहीं सिमटे थे। कुछ और भी थे, जिसे महसूस करने की जरूरत है। आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री पहली ऐसी शख्सियत रहे हैं जिन्होंने अपना आशियाना देश की टॉप टेन बदनाम बस्तियों में शुमार मुजफ्फरपुर की तवायफ मंडी यानी चतुर्भुज स्थान में बसाया। काली कोठरी में सपरिवार रहते हुए भी उनका दामन हमेशा पाक रहा। महाकवि की यह इच्छाशक्ति यों ही नहीं थी। उसमें एक मैसेज था। समाज के लिए। लोगों के लिए। वंचितों, पीडि़तों को स्वीकार करने का आग्रह था। उन्हें समझने, महसूस करने और बदलने की अपील थी। तभी तो महाप्राण निराला से लेकर हरिवंश राय बच्चन तक बेझिझक उनके आशियाने में आया करते थे। लेकिन कभी किसी ने महाकवि से ठौर बदलने की गुजारिश नहीं की। हां, शहर के लोग भले ही तवायफ मंडी के नाम पर बिचकते रहे हों, आचार्यश्री के बहाने निराला निकेतन जाने में उन्हें कभी परेशानी महसूस नहीं हुई। आचार्य श्री ने वंचितों की बस्ती को अपना नाम दिया। आज भी उस बस्ती में रहने वाले चतुर्भुज स्थान या तवायफ मंडी की जगह आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री पथ लिखा करते हैं। स्कूल में बच्चों के दाखिले के दौरान भी यही पता होता है। मंडी आज भी कायम है। तवायफें अब भी मौजूद हैं। लेकिन इलाका आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के नाम से जाना-पहचाना जाता है। एक और घटना 2002 की है। तब यहां तवायफ मंडी की रानी बेगम पहली बार वार्ड पार्षद चुनी गई थीं। मंडी के लोगों में उत्साह देखते ही बनता था। मीडिया मंडी की ओर भाग रहा था। आचार्य श्री ने फिर एक अनूठी पहल की, जिसमें वंचितों को गले लगाने का संदेश था। उन्होंने उसी निराला निकेतन में रानी बेगम को चांदी का मुकुट पहनाकर सम्मानित किया, जहां किसी जमाने में पृथ्वीराज कपूर, रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे दर्जनों हस्तियां आचार्यश्री का आतिथ्य स्वीकार किया करते थे। क्या सचमुच कोई और ऐसा कर सकता है? किया किसी ने कभी ऐसा किया है? क्या हममें वो जज्बा है? जवाब ढूढ़ेंगे तो सिर्फ आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ही नजर आएंगे। बेशक कहने में कोई गुरेज नहीं कि अब न होगा दूजा जानकीवल्लभ। - एम. अखलाक (यह रपट दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर में बाटम छप चुकी है।)

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

बबुआ अइसे ना बदली बिहार हो

सांस्‍कृतिक विकास के बिना 'समुचित विकास' नहीं

बिहार में इन दिनों विकास की बात हो रही है। अच्‍छी बात है। लेकिन मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी एजेंडे से 'सांस्‍कृतिक विकास' की बात सिरे से गायब है। राज्‍य सरकार के करीब साढ़े पांच साल बीत चुके हैं। मुख्‍यमंत्री और विभागीय मंत्री की ओर से कला, संस्‍कृति और कलाकारों के बुनियादी विकास के लिए अबतक कोई घोषणा नहीं हुई है। सरकारी योजनाओं का स्‍वाद चखने वाले सूबे के नामचीन कलाकार भी खामोश हैं। जबकि गांवों में कलाकारों का एक बड़ा तबका हाशिए पर जी रहा है। उसके समक्ष रोटी, रोजगार और सम्‍मान का संकट है। कलाकारों की इस जमात में 90 फीसदी दलित, महादलित, पिछड़ा, अतिपिछड़ा जैसे वर्ग से ही आते हैं। महज दस फीसदी ही कलाकार ऐसे होंगे जो सवर्ण होंगे। इनमें कोई सुखी नहीं है। लोक गायन कर, भजन-कीर्तन गाकर, नाच दिखाकर, बैंड बजाकर, तमाशा दिखाकर, नाटक करके, चित्रकारी करके, बैनर-पोस्‍टर लिखकर समाज को सांस्‍कृतिक रूप से समृद्ध करने वाले इन कलाकारों के बच्‍चों, घर-बार, खान-पान, पहनावा आदि देखकर कोई भी उनकी स्‍थिति का अंदाजा लगा सकता है। हैरत करने वाली बात यह भी है कि सूबे की कोई भी पंचायत अपने स्‍थानीय कला-संस्‍कृति और कलाकारों के विकास के लिए काम नहीं कर रही है। जबकि पंचायती राज अधिनियम में साफ-साफ कहा गया है कि पंचायतें बिजली, पानी, सड़क की तरह ही सांस्‍कृतिक विकास के लिए भी योजनाएं बनाकर सरकार के पास भेजेंगी। इससे जाहिर होता है कि बिहार में राज्‍य सरकार से लेकर पंचायतीराज तक कलाकारों के बारे में सोंचने की पहल नहीं हो रही है। ऐसे में दो अहम सवाल उठते हैं। पहला- क्‍या इन कलाकारों के विकास के बिना बिहार में सांस्‍कृतिक विकास संभव है ? दूसरा- सांस्‍कृतिक विकास के बिना सूबे का समुचित विकास हो पाएगा ? यदि नहीं तो सरकार इस दिशा में क्‍यों नहीं सोच रही है।

मेरा मानना है कि बिहार में कलाकारों के लिए एक मुकम्‍मल नीति का निर्माण होना चाहिए। अबतक किसी भी पूर्ववर्ती सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की है। जबकि पश्‍िचम बंगाल की सरकार इस दिशा में आगे निकल चुकी है। बिहार सरकार को चाहिए कि एक टीम गठित कर ऐसी नीति बनाए जिससे कलाकारों को पेंशन, बीमा, रोजगार, संरक्षण, सामाजिक सम्‍मान, प्रशिक्षण जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल सके। यही नहीं इस दायरे में तमाम ऐसे कलाकारों को शामिल किया जाए जिनकी रोजी रोटी कला के सहारे ही चलती है। उदाहरण के तौर पर एक बैंड बजाने वाला तीन-चार माह बैड बजाता है, बाकी दिनों में बेरोजगारी झेलता है, उसे सामाजिक सम्‍मान भी नहीं मिलता। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों के लोक कलाकारों के लिए कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। नाच पार्टी और आर्केस्‍ट्रा में काम करने वाली महिलाओं और पुरुषों के लिए भी कोई मजदूरी तय नहीं है। उनका शोषण होता है। कई जगह तो उनकी हत्‍या भी हो जाती है। चंपारण में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। सामाजिक उपेक्षा की तो पूछिए मत। अगर सरकार कलाकारों के लिए नीति बना लेती है तो एक बड़ी उपलब्‍िध होगी।

इसी तरह कला के विकास के लिए वर्ष 2004 में बनाई गई 'सूबे की सांस्‍कृतिक नीति 2004' को जमीन पर उतारने की पहल होनी चाहिए। यह नीति राज्‍य सरकार ने खुद बना रखी है। लेकिन ठंडे बस्‍ते में है। इसमें कला के विकास के लिए कई प्रस्‍ताव शामिल हैं। लेकिन एक भी काम अबतक नहीं हुआ है। मीडिया ने भी कभी इसकी पड़ताल नहीं की। अगर प्राथमिकता के तौर पर सभी जिला मुख्‍यालयों में कला भवन आदि बना दिए जाएं तो सूबे में सांस्‍कृतिक गतिविधियां स्‍वत: बढ जाएंगी। इससे स्‍थानीय कला को प्रोत्‍साहन भी मिलेगा। आज बिहार के किसी भी जिले में कला प्रस्‍तुति के लिए एक अदद कला भवन नहीं है। जहां आडिटोरियम व नगर भवन आदि हैं उसका किराया पांच हजार से उपर है। चाहकर भी कोई आयोजन करने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाता है।

ठीक इसी तरह सूबे में लोक कलाओं व लोक कलाकारों के संरक्षण के लिए अलग से आयोग का गठन होना चाहिए। सबको पता है कि बिहार के हर जिले की अपनी सांस्‍कृतिक पहचान रही है। लेकिन, अब लोक कलाएं मरती जा रही हैं। कई कलाएं लुप्‍त हो चुकी हैं। इन कलाओं से जुड़े लोक कलाकार उजड़ते जा रहे हैं। मिथिलांचल में दसौत, सामा-चकेवा, झिझिया, जटा-जटिन, झुमरि, रमखेलिया, डोमकछ, लोरिक-सलहेस, गोपीचन्द, विदापत, हरिलता एवं विहुला प्रचलित लोक नाटक रहे हैं। इसके अलावा बिहार में अन्‍य प्रचलित लोक-नाटकों में चौपहरा, नारदी, नयना-योगिन, भाव, झड़नी, पमरिया भी प्रमुख रहा है। इस पर शोध नहीं हो रहा है। सो, इन्‍हें सहेजने के लिए सूबे में एक अलग आयोग का गठन होना ही चाहिए। इससे बिहार की सांस्‍कृति एक बार फिर झूम उठेगी। यही नहीं सूबे में सकारात्‍मक माहौल भी बनेगा। हां, इसमें ध्‍यान रखने की बात यह होगी कि आयोग में लोक कलाकार ही प्रमुखता से शामिल रहें।

- एम. अखलाक
(लेखक लोक कलाकारों के जनसंगठन 'गांव जवार' के सदस्‍य हैं)

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

नक्सलियों पर भारी पड़े वोटर

तिरहुत के नक्सल प्रभावित इलाकों में खूब पड़े वोट

मुजफ्फरपुर : दूसरे चरण के मतदान से दो दिन पहले शिवहर में बारूदी विस्फोट कर छह पुलिस कर्मियों को शहीद करने वाले नक्सलियों पर मतदान के दिन मतदाता भारी पड़ गए। नक्सलियों के गढ़ कहे जाने वाले अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में वोटरों ने बढ़-चढ़कर मताधिकार का प्रयोग किया। यह न सिर्फ लोकतंत्र के प्रति कायम विश्वास का संकेत है, बल्कि नक्सल आंदोलन की समीक्षा की ओर लोगों का इशारा भी है। अगर पिछले तीन विधानसभा चुनावों के वोट प्रतिशत पर गौर करें तो इस बार वोटरों का उत्साह 'बम-बमÓ बोल रहा है।सबसे पहले नजर डालते हैं शिवहर विधानसभा क्षेत्र पर। यहां फरवरी 2005 के चुनाव में 46।04 फीसदी वोटरों ने वोट डाला था। इसी साल जब अक्टूबर में जब दोबारा चुनाव हुआ तो ग्राफ गिरकर 45।47 पर आ गया। लेकिन, इस बार नक्सली घटना के बावजूद 50 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर सूबे को चौंका डाला है। नक्सली घटना के बाद सियासी गणितज्ञों को इस तरह के परिणाम की उम्मीद नहीं थी। इसी तरह सीतामढ़ी जिले के बेलसंड विधानसभा क्षेत्र में फरवरी 2005 में 47।04 और अक्टूबर में 46।55 फीसदी मतदान हुआ था। इस बार यह ग्राफ चढ़कर 48 फीसदी पर पहुंच गया है।उधर, मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर, पारू और साहेबगंज विधानसभा क्षेत्रों पर नजर डालें तो यहां भी नक्सलियों को मतदाता चुनौती देते ही नजर आए। पारू विधानसभा क्षेत्र में फरवरी और अक्टूबर 2005 में हुए दो चुनावों में क्रमश: 49।95 और 50.43 फीसदी मतदान हुआ था। इसबार यह आंकड़ा 52.2 प्रतिशत पहुंच गया है। कुछ यही हाल मीनापुर विधानसभा क्षेत्र का भी रहा। पिछले दोनों चुनावों में यहां क्रमश: 47.26 और 49.60 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसबार उत्साहित वोटरों ने 53.72 फीसदी तक इस आंकड़े को पहुंचा दिया है। हां, साहेबगंज एक मात्र ऐसा क्षेत्र रहा है जहां इस बार थोड़ा ग्राफ गिरा है। गत दो चुनावों में यहां मतदान प्रतिशत 50.83 और 52.84 था। इस बार यह 52 फीसदी पर ही सिमट कर रह गया है। ये सभी विधानसभा क्षेत्र चुनाव आयोग की संचिकाओं में नक्सल प्रभावित माने गए थे। सो, यहां तीन बजे ही मतदान हो सका। यदि यहां पांच बजे तक मतदान होता तो कई और रिकार्ड टूट सकते थे।खैर, कई ऐसे विधानसभा क्षेत्रों ने भी इस बार रिकार्ड तोड़ा है जो नक्सल प्रभावित होने के बावजूद चुनाव आयोग के खाते में नहीं थे। इन्हीं में एक है बरूराज, जहां पिछले दो चुनावों में क्रमश: 48.3 व 48.45 फीसदी वोट डाले गए थे। इस बार यहां 53 फीसदी मतदान हुआ है। इसी तरह पूर्वी चंपारण जिले के पिपरा में इस बार दो 57 फीसदी वोट पड़े हैं। जबकि दो चुनावों में यहां क्रमश: 46.38 और 47.64 फीसदी ही वोट डाले गए थे। यही हाल मधुबन का भी रहा। यहां गत दो चुनावों में क्रमश: 44.42 और 47.98 प्रतिशत वोट डाले गए थे। इस बार 58 फीसदी लोगों ने वोट डाला है। वहीं ढाका में रिकार्ड तोड़ 61 फीसदी वोटिंग हुई है। जबकि दो चुनावों में यहां क्रमश: 42.43 और 44.38 फीसदी लोगों ने ही मतदान किया था। यही नहीं नवसृजित चिरैया में 61 और नरकटिया में 59 प्रतिशत मतदान की सूचना है। चौंकाने वाली बात यह है कि नक्सल प्रभावित होने के बावजूद यहां शाम पांच बजे तक न सिर्फ मतदान हुआ बल्कि शानदार वोटिंग भी हुई।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

कल्याणी के आंगन में नहीं 'नाचे' प्रत्याशी

मुजफ्फरपुर : बस दो पल के लिए जिंदगी के दुख-दर्द से बाहर निकलकर कल्पना लोक में चले आइए। फर्ज कीजिए, आप एक चौराहे पर खड़े हैं। यह शहर की ह्रदय स्थली के रूप में मशहूर है। यहां से निकलने वाले रास्ते चार दिशाओं में जाने का संकेत देते हैं। मौसम चुनावी है और दीवाली भी दस्तक दे रही है। इसलिए चौराहे के आसपास बाजार भी चहक रहे हैं। इसी बीच चुनाव प्रचार का अंतिम दिन भी आ टपका। सभा के लिए शाम पांच बजे का वक्त अंतिम डेडलाइन है। करीब तीन बजे से चौराहे पर दलों के प्रत्याशी अपने झंडा-बैनर के साथ टपकने लगते हैं। बारी-बारी शुरू हो जाता है चुनावी भाषण मुकाबला। ना कोई मारपीट, ना कोई हंगामा। लेकिन, सब छोड़ते हैं एक दूसरे पर जहर बुझे तीर। इतना ही नहीं खुलकर रखते हैं अपनी बात। भाषण के वजन के हिसाब से बटोरते हैं तालियां भी। और पांच बजते ही अपने-अपने चुनावी आशियानों की ओर कर जाते हैं प्रस्थान। अब आंख खोलिए और खुद से सवाल कीजिए- क्या ऐसी आदर्श व्यवस्था कहीं संभव है? बहुतेरों का जवाब होगा- नहीं। पर, इस शहर में कई-कई चुनावों को देख चुके लोग तुरंत बोल पड़ेंगे- यह तो कल्याणी चौक का नजारा है।

मुजफ्फरपुर सूबे का इकलौता ऐसा अनूठा शहर रहा है जहां चुनाव प्रचार के अंतिम दिन एक ही चौराहे पर सभी प्रत्याशी जनता से अपनी बात कहने के लिए खुद जुटते हैं। कोई आयोजक या प्रायोजक नहीं होता है। प्रत्याशी प्रचार गाडिय़ों पर बने मंच पर खड़ा होकर ही पब्लिक से मुखातिब होते हैं। गत लोकसभा चुनाव हो या फरवरी और अक्टूबर 2005 का विधानसभा चुनाव या फिर उससे पहले के चुनाव, सभी उस अनूठे नजारे को देख चुके हैं। पर, इस बार शहरवासी वैसे नजारे नहीं देख पाए। हालांकि शुक्रवार को चुनाव प्रचार का अंतिम दिन होने के कारण परंपरा के मुताबिक सैकड़ों लोग तीन बजे तक कल्याणी चौक पहुंच गए थे। सबकी आंखें प्रत्याशियों की बाट जोह रही थीं। आंखें उनसे कुछ सवाल करना चाहती थीं। बदरंग होती शहर की सूरत के बारे में। बेरोजगार घूमते हाथों के बारे में। गंदी बस्तियों में पानी के बारे में। बिजली के बारे में...। पर, पहुंचने के बाद ज्योंही पता चला कि इस बार चुनाव आयोग ने सिर्फ एक ही प्रत्याशी को यहां सभा करने की इजाजत दी है। आंखों में सवाल तैरते रह गए। चेहरे उतर गए। घर लौटते वक्त बस एक ही बात जेहन में उमड़ -घुमड़ रही थी- एक परंपरा टूट गई, जो लंबे काल से चली आ रही थी।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

एक गीत तुम्‍हारे नाम


भाड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम तो हिन्‍द के रखवाले हैं
रोटी दे दो, पानी दे दो
छत दे दो, कपड़े दे दो
हम कहां इबादत करने वाले हैं।


भांड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम बच्‍चन को पढ़ने वाले हैं
रुपये दे दो, पैसे दे दो
दवा दे दो, दारू दे दो
हम कहां अयोध्‍या जाने वाले हैं।


भांड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम मजदूर कहलाने वाले हैं
जंगल दे दो, जमीन दे दो
बीज दे दो, खाद दे दो
हम कहां धाम धांगने वाले हैं।


भांड़ में जाए मंदिर-मस्‍िजद
हम इंकलाब कहने वाले हैं
गद्दी छोड़ों गद्दार कहीं के
हम सत्‍ता में आने वाले हैं।
हम सत्‍ता में आने वाले हैं।


(रामजन्‍मभूमि- बाबरी मस्‍िजद विवाद पर हाईकोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले पर प्रतिक्रिया)
- एम. अखलाक

शनिवार, 25 सितंबर 2010

बिहार में कांग्रेस के दो अध्यक्ष!

कांग्रेस और राजद की वेबसाइट अपडेट नहीं

इन दिनों बिहार कांग्रेस कमेटी में दो प्रदेश अध्यक्ष कार्यरत हैं! चौंकिए मत, यकीन नहीं आता तो देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी कांग्रेस की वेबसाइट पर आपका स्वागत है। पार्टी की केन्द्रीय वेबसाइट के अनुसार अनिल शर्मा अब भी अपने पद पर बने हुए हैं। वहीं प्रदेश कमेटी की वेबसाइट कहती है कि चौधरी महबूब अली कैसर ने मोर्चा संभाल रखा है।

बदलते जमाने को ध्यान में रखकर एक तरफ कांग्रेस पार्टी जहां अपने हर काम को हाईटेक और प्रोफेशनल अंदाज में अंजाम देना चाहती है। कार्यकर्ता बनाने से लेकर चुनाव प्रचारों के लिए लेटेस्ट तकनीक का सहारा ले रही है। इंटरनेट के माध्यम से समर्थक बना रही है। वहीं अपनी वेबसाइट तक अपडेट नहीं कर पा रही है। इसी का परिणाम है कि केन्द्रीय वेबसाइट पर जिन प्रदेश अध्यक्षों की सूची जारी की गई है उनमें अनिल शर्मा का ही नाम, पता और फोन नंबर शो किया गया है। जबकि श्री शर्मा इस वर्ष के जून में ही प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिए गए हैं। सूबे में फिलहाल उनकी कुर्सी पर चौधरी महबूब अली कैसर अध्यक्ष की भूमिका में हैं।

मालूम हो कि केन्द्रीय वेबसाइट पर कुल 36 प्रदेश अध्यक्षों के नाम, पते व फोन नंबर दिए गए हैं। इसके साथ ही प्रदेश कमेटी के वेबसाइट लिंक भी उपलब्ध कराए गए हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पार्टी अब तक छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, राजस्थान, पंजाब, उडि़सा, तमिलनाडु, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, दमन एंड द्वीव और लक्षद्वीप कमेटी के लिए वेबसाइट विकसित नहीं कर पाई है।

कायम है राजद का कांग्रेस प्रेम

इस चुनावी फिजां में राजद और कांग्रेस भले ही एक दूसरे को पानी पीकर कोसते रहे हों, लेकिन सच्चाई कुछ और है! जी हां, यह राजद की वेबसाइट बोलती है। पार्टी ने जिस वेबपेज पर अपने तमाम विधायकों की सूची जारी कर रखी है उसके माथे पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री डा। मनमोहन सिंह की तस्वीरें भी मौजूद हैं। इन तस्वीरों में राजद सुप्रीमो जहां कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी से बातचीत कर रहे हैं, वहीं डा। मनमोहन सिंह चुपचाप' तमाशा देख रहे हैं।

रिपोर्ट - एम. अखलाक

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

उत्तर बिहार में डटे हैं जन संगठन भी

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है और रफ्ता-रफ्ता सियासी सरगर्मियां परवान चढ़ रही हैं। इसी के साथ उत्तर बिहार की फिजां में तैरने लगी है जन संगठनों की आवाज, जो चुनावी मुद्दा बनने को बेकरार है और जो वर्षों से सियासी झांसा झेल रही है। अपनी मांगों के लिए जब-जब इन संगठनों ने नारे बुलंद किए, आंदोलन को आगे बढ़े, तब-तब इन्हें सहलाया गया, बहलाया गया। अब जबकि चुनाव सामने है और सियासी पार्टियां उनके मुद्दे-मांगों से मुंह मोड़े हुए है, ऐसे में संगठनों ने भी अपनी कमर कस ली है। इस बार वे अपने मुद्दे को गरम करने की फिराक में अभी से जुट गए हैं। आइए जानें किस संगठन का क्या है मुद्दा?

आरटीई कानून लागू हो : बिहार में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू करने की मांग को लेकर 'भूमिका विहार' आंदोलन चला रहा है। पिछले दिनों पटना और मुजफ्फरपुर में यह संगठन राजनीतिक दलों और प्रबुद्धजनों के साथ सम्मेलन आयोजित कर अपनी मांगों को उनके समक्ष रख चुका है। संगठन की मांग है कि सियासी दल इस मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा पत्रों में शामिल करें। संगठन के अरुण कुमार सिंह कहते हैं कि सामाजिक मुद्दों से सियासी दलों का कोई नाता नहीं रह गया है। इस बार उनकी कोशिश होगी कि संगठन की मांग की ओर सियासी पार्टियां ध्यान दे और उसे अमल में लाने की भरपूर कोशिश करे।

सांस्कृतिक नीति जमीन पर उतरे : सूबे की सांस्कृतिक नीति 2004 को जमीन पर उतारने, लोक कलाओं व कलाकारों के संरक्षण के लिए अलग कला और कलाकार आयोग गठित करने, कलाकार नीति बनाने और सभी जिलों में कला प्रदर्शन के लिए नगर भवन व ऑडिटोरियम नि:शुल्क करने के लिए 'गांव जवार' पिछले एक साल से आंदोलन चला रहा है। यह संगठन भी पटना व मुजफ्फरपुर में सम्मेलन कर सियासी दलों से इन्हें चुनावी घोषणा पत्रों में शामिल करने की मांग कर चुका है। संगठन के डा. कौशल किशोर चौधरी कहते हैं कि पक्ष-विपक्ष की सियासत करने वाले नेताओं को इस बार संगठन के मुद्दों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया जाएगा। मुजफ्फरपुर थियेटर एसोसिएशन भी पिछले दिनों चुनावी घोषणा पत्रों में सांस्कृतिक सवालों को स्थान देने की मांग को लेकर विचार गोष्ठी आयोजित कर चुका है। 'इप्टा' भी इन्हीं सवालों को लेकर शहर में धरना-प्रदर्शन कर चुका है। उधर, 'बेटी बचाओ आंदोलन' ट्रैफिकिंग की रोकथाम के लिए ठोस पहल करने व नाच पार्टियों में काम करने वाले कलाकारों को मजदूर का दर्जा देने की कई वर्षों से वकालत कर रहा है।

मैथिली की आवाज भी सुनिए : मिथिलांचल में 'विद्यापति सेवा संस्थान' प्रबुद्धजनों की बैठक में प्रस्ताव पारित कर सियासी दलों से मैथिली भाषा में ही बैनर-पोस्टर व चुनावी घोषणा पत्र जारी करने की मांग कर चुका है। संस्था के सदस्यों को कहना है कि इस बार यदि ऐसा नहीं हुआ तो सियासी दलों को संगठन का विरोध झेलना होगा।

मिथिला राज्य की भी है मांग : अखिल भारतीय मिथिला पार्टी पिछले कई वर्षों से अलग मिथिला राज्य बनाने की मांग कर रही है। नेतागण भरोसा देते हैं, बैक से समर्थन की बात करते हैं, पर जब चुनाव आता है तो मुद्दा गौण हो जाता है। संगठन के पदाधिकारी इस साफ आश्वासन के बाद भी नेताओं को वोट देने का मन बना रहे हैं। इसके लिए वे जागरुकता अभियान भी चलाने की सोच रहे हैं।

बज्जिकांचल भी है आवाज : बज्जिकांचल विकास पार्टी भी वर्षों से अलग बज्जिकांचल राज्य बनाने की मांग को लेकर संषर्घरत है। इस संगठन के कार्यकर्ता तो अब चुनावी मैदान में उतरकर जन समर्थन बटोरने लगे हैं। इस बार भी वे अपनी आवाज जनता और सियासत तक पहुंचाने की जुगत में हैं।

रिपोर्ट - एम. अखलाक