सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना

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मंगलवार, 3 नवंबर 2009

आरएसएस प्रमुख भागवत के नाम पत्र

जिन दिनों भाजपा सरकार के नेतृत्व वाले गुजरात में मजहब के नाम पर इंसानियत का कत्लेआम हो रहा था। लोगों को घरों में जिंदा इसलिए जलाया जा रहा था, क्योंकि वे मुसलमान थे। भाई-भाई को लहू का प्यासा बनाया जा रहा था। जिन दिनों बाबरी मस्जिद ढाहने का जश्न मनाया जा रहा था। देश को दंगे की आग में झोंका गया था..., उस दिन आरएसएस वाले मोहन भागवत आप कहां थे? क्या कर रहे थे? यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि इन दिनों आप बहुत बोलने लगे हैं - देश की सम्प्रभुता खतरे में है।
हिटलर के वंशज समझे जाने वाले आपकी बिरादरी से जनता जानना चाहती है कि क्या उन दिनों देश खतरे में नहीं था? संप्रभुता व अखंडता को खतरा नहीं था?आप कहते हैं कि बंग्लादेश से घुसपैठ हो रहा है। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि बंग्लादेशी घुसपैठियों से ज्यादा खतरनाक आरएसएस के गुंडे हैं जो देश में सांप्रदायिक उत्पात मचा रहे हैं? घुसपैठियों से तो भारतीय फौज निबट लेगी, लेकिन इन आस्तीन के सांपों से निबटने के लिए क्या किया जाये? आपके शब्दों में अगर बंग्लादेश से आतंकवादी भारत में घुस रहे हैं! तो क्या यह सच नहीं कि नेपाल के रास्ते सदियों से आतंकी देश घुसते आये हैं। जब वह हिन्दू राष्ट्र था, उस समय आपने नेपाल बार्डर सील करने की बात क्यों नहीं की?दूसरा मुद्दा आपने उठाया है नक्सलियों का। आप मानते हैं इन्हें गोलियों से भून दिया जाये। आपको अपनी इस सोच पर शर्म करना चाहिए। जिन्हें आप गोलियों से भून डालने के लिए सरकार को उकसा रहे हैं, वह गांव के गरीब हैं जिन्हें वर्षों से रोटी व रोजगार नसीब नहीं हुआ है। इन्हें आपके स्वयंसेवकों की तरह हथियार प्रदर्शन का शौक नहीं है। जरा सोचिए- आप पूजा के बहाने हथियार लहरा कर शक्ति प्रदर्शन करते हैं, कुर्सी हथियाने की सियासत करते हैं। और ये गरीब रोटी के लिए हथियार उठाते हैं, पकड़े जाने पर जेल भी जाते हैं। श्रीमान, कोई मां के पेट से बंदूक लेकर पैदा नहीं होता, और ना ही कोई बंदूक उठाना चाहता है। यह तो आप जैसे अद्र्ध सामंतों की देन है कि गरीब बंदूक उठा रहे हैं। आप व्यवस्था की खामियों को दूर करने की सियासत करते तो शायद इनके हित में होता। लेकिन आपको मंदिर, मस्जिद से फुर्सत कहां? आपको तो लोगों की लाश पर राजनीति करने में मजा आता है।

(पिछले दिनों बिहार के समस्तीपुर व मध्यप्रदेश के जबलपुर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिये गये भाषण पर एक प्रतिक्रिया)

सोमवार, 2 नवंबर 2009

ठाकरे तुम्हारे बाप की है मुंबई?

देश तोडऩे और सांप्रदायिक फसादों के लिए कुख्यात बर्बरता की ढाल ठाकरे उर्फ बाल ठाकरे के भतीजा राज ठाकरे ने एक बार फिर अपने चुतियापे का परिचय दिया है। उसने कहा है कि महाराष्ट्र में जो नये विधायक चुनकर आये हैं उन्हें मराठी में ही शपथ लेना होगा। यह धमकी उसने इस अंदाज में दी है जैसे महाराष्ट्र उसके बाप का है! इस हरामखोर ने यह भी धमकी दी है कि 'सिर्फ मराठी में' शपथ नहीं लेने पर नये विधायकों को मनसे विधायकों के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। लगता है शपथ-ग्रहण समारोह विधानसभा के बजाये उसकी मां के .... में होने जा रहा है।ठाकरे इस तरह का चुतियापा क्यों कर रहा है? मुझे लगता है इस सवाल का जवाब उन तमाम लोगों को मालूम है जो हर दिन गुनगुनाते हैं- सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा। हिन्दी हमारी हिन्दोस्तान में रहने वाले लोगों की जुबान है। मराठी और अन्य भाषाएं उसकी बहन स्वरूप हैं। किसी को मराठी बोलने के लिए बाध्य करना न सिर्फ फांसीवादी मानसिकता का परिचायक है, बल्कि देश को तोडऩे और तबाह करने की विदेशी साजिश है। इस हरामखोर की औलाद ठाकरे बंधुओं को कोई यह समझाये कि यदि हिन्दी फिल्मों का कारोबार मुंबई में नहीं होता तो क्या मुंबई सुर्खियों में होती? उसे आज जो सम्मान है, क्या मिल पाता? कोई इन ठाकरे बंधुओं से पूछे - मुंबई को दिया क्या है? जवाब मैं बता रहा हूं- इन्होंने दिया है दाउद इब्राहिम, आतंकवाद, मुंबई ब्लास्ट, दंगा-फसाद आदि? यानी यहां जो कुछ अमानवीय है, ठाकरे बंधुओं की देन है।
और अंत में, आईए ठाकरे बंधुओं को उन्ही की भाषा में जवाब देकर देश की अखंडता की हिफाजत करें।

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

बिहार पुलिस की करतूतें

यह वाक्या है एक जुलाई 2009 की। करीब दोपहर के वक्त बिहार के बेतिया जिले में एक कुख्यात अपराधी पुलिस के हत्थे चढ़ गया। शिनाख्त हुई राजेश यादव उर्फ मुलायम के रूप में। पता-ठिकाना निकला कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का मांझीविशुनपुरा गांव। पुलिस के मुताबिक यह अपराधी बेतिया नगर में किसी घटना को अंजाम देने की नीयत से पहुंचा था, तभी खुफिया सूचना मिली और पुलिस बलों के साथ छापेमारी कर पुलिस निरीक्षक सह नगर थानाध्यक्ष संजय कुमार झा ने इसे बैंक आफ बड़ौदा के पास से गिरफ्तार कर लिया।गिरफ्तार अपराधी के कुख्यात होने के कारण मीडिया वाले भी सक्रिय हो गये। शाम करीब चार-पांच बजे जिले के पुलिस कप्तान ने गिरफ्तार राजेश यादव उर्फ मुलायम का आपराधिक इतिहास जारी किया। फैक्स से भेजे गये इस आपराधिक इतिहास के सातवें बिन्दु पर मीडिया वालों की नजर ज्यों ही पड़ी, सभी चौंक गये, सन्नाटे में आ गये। पुलिस महकमे ने लिखा था-''तहलका डॉट कॉम, नोएडा के संपादक तरूण तेजपाल की हत्या में अवधेश त्यागी के साथ (राजेश यादव उर्फ मुलायम) संलिप्त था। मीडिया वाले थोड़ी देर ऊहापोह की स्थिति में रहे। क्या यह खबर बनती है? क्या इस एंगल से खबर लिखी जाये? जितनी मुंह उतनी बातें। अंतत: किसी छोटे-बड़े अखबार ने इस खबर को प्रकाशित करना मुनासिब नहीं समझा, क्योंकि इससे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुशासनिक पुलिस की कार्यशैली की पोल खुल जाती। और पोल खुलने का मतलब 'धंधा' (विज्ञापन कारोबार, पुलिस के साथ पत्रकारों की दलाली) चौपट होना।मीडिया वालों ने थोड़ी देर बाद एसपी को फोन मिलाकर बताया कि तरूण तेजपाल देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह अभी जिंदा हैं। उनकी कोई हत्या नहीं हुई है। उन्हें बच्चा-बच्चा नाम से जरूर जानता है। फिर क्या था एसपी के कान खड़े हो गये। उन्होंने मीडिया वालों से कहा- कृपया खबर में इसका जिक्र न करें। और मीडिया वालों ने जिक्र नहीं किया।इस वाक्या से अब असल सवाल यह उठता है कि एसपी ने आपराधिक रिकार्ड बनाने वाले कर्मचारी को दंडित क्यों नहीं किया? आखिर किसके आदेश से यह रिकार्ड तैयार कराया गया? आखिर पुलिस लापरवाही क्यों करती है? क्या कुख्यात अपराधी राजेश यादव उर्फ मुलायम से जुड़े जो रिकार्ड में 33 आरोप लगाये गये हैं, वह सभी सही हैं या उनमें भी फर्जीवाड़ा है? आदि आदि।बहरहाल, इस खबर को रिपोर्ताज डाट ब्लागस्पाट डाट कॉम पर जब पोस्ट किया गया तो करीब एक सौ से ज्यादा नेटयूजरों ने ब्लागवाणी पर न सिर्फ पढ़ा, बल्कि अपनी प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त की। पेशे से वकील और राजस्थान कोटा के रहने वाले दिनेश द्विवेदी ने कहा- जय हो बिहार पुलिस की!!!। इसी तरह दिल्ली के रहने वाले इरफान ने कहा- हम नहीं सुधरेंगे, चाहें जितने जनता दरबार लगा लें नीतीश बाबू। कनाडा में रह रहे जबलपुर के समीर लाल ने कहा- अफसोसजनक। कानपुर उत्तर प्रदेश के अनूप शुक्ल ने अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस तरह व्यक्त की- बिहार पुलिस जिन्दाबाद! तो अविनाश वाचस्पति ने कहा- बिहार पुलिस से बचकर रहने में भलाई है, वैसे यहां के नेता ही कौन से कम हैं। यानी सबने पुलिस की कार्यशैली को जमकर कोसा।बिहार में पुलिसिया कार्यशैली का दूसरा नमूना मुजफ्फरपुर जिले में देखने को मिला। हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान देवरिया थाना के धरफरी गांव में वोटिंग कर लौट रहे मां, बेटा और चाचा को पुलिस ने पकड़ लिया। पकड़े गये लोगों पर आरोप क्या थे किसी को मालूम नहीं। चुनाव खत्म होने के बाद शाम को पैट्रोलिंग पार्टी लौट रही थी। इसी बीच नक्सलियों ने एक पुल के पास बम विस्फोट कर चुनावकर्मियों को मार डाला। तीन लोगों की जानें गयी और पुलिस बौखला गयी। पुलिस ने आव देखा न ताव पहले से पकड़े गये मां, बेटा और चाचा को नक्सली घोषित कर जेल भेज दिया। मीडिया वालों ने जब एसपी सुधांशु कुमार से पूछा- यह लोग तो पहले से गिरफ्तार थे? इन्हें आप नक्सली कैसे घोषित कर रहे हैं? एसपी ने कहा- यार छोड़ो इन बातों को, बस लिख दो यही नक्सली थे। मीडिया में यह बात आयी लेकिन दबी जुबान से। किसी भी अखबार ने खुलकर इस पर नहीं लिखा। सवाल उठता है कि जब नक्सलियों ने चुनाव का बहिष्कार कर रखा था, और यदि पकड़े गये मां, बेटा और चाचा नक्सली थे! तो मतदान करने क्यों गये? दूसरी बात, नक्सली बम धमाके से पहले ही जब नक्सली मानकर तीनों पकड़ लिये गये थे तो पुलिस बम विस्फोट को नाकाम क्यों नहीं कर पायी? आपको जानकर हैरत होगा कि पुलिस ने इस मामले में 25 पिछड़ी जाति के लोगों को नक्सली घोषित कर जेल भेजने का संकल्प लिया है। इनमें करीब एक दर्जन जेल भेजे जा चुके हैं। यूं तो पुलिस यह सब अपनी वर्दी की लाज बचाने के लिए कर रही है। लेकिन हकीकत यही है कि वह जिले में दलितों, पिछड़ों, महादलितों को नक्सली बना रही है!एक और कहानी है माता सीता की जननी भूमि सीतामढ़ी जिले की। यहां पिछले दिनों पथ निर्माण विभाग के कार्यपालक अभियंता की मौत हो गयी। कुछ लोग कहते हैं उन्होंने समाहरणालय की छत से कूदकर आत्महत्या कर ली! लेकिन हकीकत कुछ और है। सूबे के अभियंता संगठनों का आरोप है कि योगेन्द्र की हत्या की गयी और इसमें यहां के एसपी छत्रनील सिंह भी संलिप्त हैं! यह कितना सच है, यह खुलासा तो सीबीआई जांच पूरी होने के बाद ही होगा, लेकिन इतना सच जरूर है कि पुलिस यहां भी संदेह के घेरे में है।
रिपोर्ट :- एम. अखलाक

बुधवार, 2 सितंबर 2009

....जहां मां के साथ बाजारों में बिकती हैं बेटियां

जहां एक ओर महिलाएं अंतरिक्ष में जा रहीं हैं, शासन सत्ता में साझीदार बन रहीं हैं, सबला बनने के हर जतन और जुगत में लगी हैं, वहीं बेरोजगारी, गरीबी, बेबसी और मुफलिसी की शिकार न जानें कितनी महिलाएं रोज मर कर जीने को अभिशप्त हैं। चंद सिक्कों के लिए ऐसी महिलाएं, पुरुषों के हाथ की कठपुतली बन गयी हैं। भागलपुर और इसके आसपास के इलाके मसलन-बिहपुर, नारायणपुर, नवगछिया, खरीक, तेतरी, गोपालपुर आज कल देह व्यापार के बड़े बाजार हो गये है। जहां पेट की खातिर मां के साथ बेटियां भी अपने तन का सौदा करती हैं। पिछले महीने की 4-5 तारीख को नाको (नेशनल एड्स कन्ट्रोल सोसाइटी) एवं बिसेक्स (बिहार एड्स कन्ट्रोल सोसाइटी) की चार सदस्यीय टीम ने यहां का दौरा करके देह के धंधे में लिप्त महिलाओं एवं युवतियों से बातचीत की। टीम के मुताबिक लगभग 600 महिलाएं एवं युवतियां इस धंधे को अंजाम दे रहीं हैं। सड़कों एवं रेलवे लाइन के किनारे बनी झुग्गी-झोपडिय़ों एवं गंदी बस्तियों में रहने वाली महिलाएं और युवतियां इस व्यापार को बढ़ावा दे रही हैं। इसे सिंचित करने में क्षेत्र की भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक संरचना का भी अहम रोल है। लगभग 24 लाख 23 हजार 172 की आबादी वाले इस क्षेत्र में लगभग 2 लाख 54 हजार 864 लोग कमजोर वर्गों के हैं। कुल आबादी की 70।19 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे हैं। दलित समुदाय के खेतिहर मजदूरों की संख्या 68।2 प्रतिशत से भी अधिक है। और तो और कोसी और गंगा की गोद में स्थित यह इलाका वर्ष में छह महीने बाढ़ और शेष सुखाड़ की चपेट में रहता है। लिहाजा कमजोर तबकों की औरतों और बेटियों को पेट की खातिर अपने ईमान और इज्जत को दांव पर लगाना पड़ रहा है। उद्योग-धंधे व रोजी रोजगार की कमी के कारण यहां के बहुसंख्यक मजदूर रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों या प्रदेशों में पलायन कर गये हैं अथवा यहीं बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। ऐसी स्थिति में अधिकांश की औरतें और बेटियां वह सब करने को मजबूर हैं, जिसका रास्ता अंधी गलियों से होकर गुजरता है और जिस्म फरोसी के बाजार में दम तोड़ देता है। धंधे में शामिल मनबसिया देवी (काल्पनिक नाम) के चार लड़कियां और दो लड़के हैं। बीमार व बेरोजगार पति का बोझ भी उसी के कंधे पर है। घरों में चूल्हा-चौकी का काम करती है। इससे उनकी परिवार की जरूरतें पूरी नहीं होती। लिहाजा शरीर का सौदा करना पड़ता है। नासिरा मछलियां बेचती हैं। उसके आठ लड़कियां और तीन लड़के हैं। पति की मौत टीबी की बीमारी से हो चुकी है। घर का खर्च चलाने के लिए उसे अपने बेटियों की इज्जत का सौदा करना पड़ता है। कमोवेश इसी तरह की दास्तां फूलमतिया, मैना, चंदा, हमीदा, (काल्पनिक नाम) की भी है। कहने को तो ये छोटे-मोटे सामान लेकर गली- मुहल्ले में फेरी देती हैं, परंतु देह व्यापार के सहारे ही इनकी रोजमर्रे की जरूरतें पूरी होती हैं। रोटी के कुछ टुकड़े और चावल के चंद दानों के लिए मां अपनी बेटियों को जिस्म के सौदागरों को सौंप रही है, जिससे उनके बचपन और सपने तार-तार होकर स्याह कोठरी के किसी कोने में सिसकियों के बीच दम तोड़ रही दे रही हैं। यही इनकी नियति और दिनचर्या है।
रिपोर्ट - कौशलेन्द्र, भागलपुर से, दैनिक जागरण से साभार

शनिवार, 18 जुलाई 2009

दीवान का बड़का गांव

कुमार नयन
कभी रहा होगा बड़ा गांव किसी दीवान का
आज तो यहां का बनिहार तक
लुटाता है इस पर अपनी जान
जुडऩा चाहता है इससे सारा जिला जवार
कोई न कोई रिश्ता जोड़
दूर-दराज के इलाकों में गूंजती है आज भी
इस गांव के कोतवाल सिंह यादव की लंठई की श्रुतियां
लेकिन बात यहीं तक हो तो क्या बात थी
शलभ श्रीराम सिंह को महीनों दारू और मुर्गा परोसकर
हाथ जोड़े उनकी डांट और गालियां खाने वाला यह बड़का गांव
नहीं करता कभी दावा बड़का होने का
क्योंकि नहीं है इसके पास कोई रेलवे स्टेशन, बस मार्ग
या कोई जीप, टैक्सी जैसी सवारी गाड़ी
यहां तक कि कोई अस्पताल, स्कूल, बारात टिकाने का हाल और हाट भी नहीं
कि हांक सके बड़का होने का डींग
बस अपनी धमनियों में सुकरात, अब्राहम लिंकन, कार्ल माक्र्स के
रक्त प्रवाहित करता चौकड़ी भरता रहता है
हिरण की तरह यह दिन रात
दिनेश मुखिया के राजनैतिक दालान से
शशिनारायण के साहित्यिक मंच तक
फिर भी असुविधाओं से भरे इस गांव के पास जरूर कुछ है
वरना पसेरीभर धूल फांक कर
सुरेश कांटक, मधुकर सिंह, राणा प्रताप, विजयन सरीखे साहित्यकार
यहां फिर-फिर आने को क्यों ललचते
और इतना तो यहां हर आने वाला जान जाता है
कि हरगिज नहीं है यह गांव
विश्वग्राम में गुम होने वाला कभी
शायद शहीद ज्योति प्रकाश के खून के
रंग लाने का जिन्दा प्रमाण है यह बड़का गांव
कि चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की कौन कहे
बोगस मतदान करने की भी नहीं की जुर्रत कभी किसी ने
संसदीय इतिहास में
चमारों, दुसाधों, पासियों, धोबियों, नाइयों के लिए तो
यह गांव बड़का नहीं, बहुत बड़का है
जो खोलता है कई-कई परतें
देश की नहीं, गांव की आजादी की
कभी अठानबे बरस के पट़ठे शिवनारायण सिंह के चौपाल पर
तो कभी मास्टर तेजनारायण सिंह पहलवान के अखाड़े में
कभी नव सृजन के कलाकारों की परिचर्चा में
तो कभी नहर किनारे रमाशंकर हलुवाई की दुकान पर छिड़ी गरमागरम बहस में
यूं तो कन्हैया ठाकुर की खामोशी खाकसारी भी
किसी बड़का संस्कार की परत खोलती
पूरे गांव की बेचैन आत्मा से कम नहीं लगती
अब आप इसे इसकी खासियत कहें या नुक्स
कि इसने हमेशा देश से आंखें चुरायीं
और दुनिया की तरफ टकटकी बांध कर देखी
कहीं इसीलिए तो नहीं सारी सुविधाओं से वंचित
छोटका से भी छोटका रह गया यह बड़का गांव
समझ सकते हैं ऐसा कुछ लोग
पर यह गांव इनसब बातों से निरपेक्ष
मस्त है अपने आप में
कदम-दर-कदम समाता हुआ सोच और विचार के घने जंगल में
कितना अद्भुत है कि और गांवों की तरह
नहीं बिछाता यह शतरंजी बिसातें
चालें कब की खत्म कर चुका है अपनी
और अब हर छोटा-से छोटा प्यादा भी
बड़का गांव का दीवना बन गया है।

बिहार के बक्सर जिले के रहने वाले कुमार नयन ने यह कविता करीब छह साल पहले लिखी थी। कहने को यह कविता है लेकिन यह गांव पर उम्दा किस्म का रिपोर्ताज भी है। इसकी इसी खासियत की वजह से हम आपतक इसे परोस रहे हैं। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। - एम. अखलाक

सोमवार, 6 जुलाई 2009

मेरे गांव की मुर्गियों का फैसला

दो जुलाई सन् 2009 भारत के लिए ऐतिहासिक दिन है। ऐसा हमें टेलीविजन के एंकरों और अगले दिन के अखबारों के शीर्षक से पता चला है। इस दिन भाइयों को भाइयों से और बहनों को बहनों से वह सब करने का अधिकार मिल गया बताया गया है जो कानूनन मर्दों और औरतों के बीच ही जायज माना जाता था। टेलीविजन वाले भाइयों और बहनों ने दिल्ली हाईकोर्ट के हवाले से यह बताते हुए कि समलैंगिक यौन संबंध गैरकानूनी नहीं जो अपार प्रसन्नता दिखायी, उसे देखकर मेरी हालत उस घसगढऩी की तरह हो गयी जिसे यह बताया जाये कि भारत ने एटम बम फोड़ दिया है और वह बेचारी टुकुर-टुकुर ताकने के अलावा कुछ नहीं कर सके। मैं तो आत्मग्लानि से भर गया कि आखिर मेरी बिरादरी (गे नहीं, पत्रकार) के लोग इतने खुश हैं तो मैं यह खुशी क्यों महसूस नहीं कर पा रहा। मैंने बहुत कोशिश की कि कम से कम अल्पसंख्यक होने के नाते ही इस खुशी को आत्मसात कर संकू क्योंकि भाई और बहन लोग तो यही बता रहे थे कि यह एक अल्पसंख्यक वर्ग की बहुत बड़ी कामयाबी है। बड़ी मेहनत कर खुश होने की कोशिश की तो फिर यह ध्यान आया कि हमलोगों से कितना अन्याय हुआ है कि अबतक इस जन-जनानी वर्ग को असामाजिक मानते रहे। पता नहीं कि इस गुनाह की माफी भी है या नहीं। टेलीविजन पर चमकते भाइयों और बहनों से जब मुझे यह जानकारी हुई कि जो लोग यह कहते हैं कि जन-जन के बीच संबंध का भारतीय संस्कृति से रिश्ता नहीं, वे कितने अज्ञानी हैं तो मैं हीनभावना से भर गया क्योंकि यह तो भारत में कब से होता आ रहा है और इस प्रगतिशीलता और उन्मुक्तता के द्योतक की जानकारी मुझे भी नहीं थी। हम तो यह सोच रहे कि देवर-भाभी, भगिना-मामी और जीजा-साली जैसी चीजें तो भी कब से होती आ रहीं, उसे कब कानून की बेड़ी से मुक्ति मिलेगी। वैसे भी भारतीय संस्कृति के बारे में जो जानकार भाई और बहन लोग दें वही सही है। बाकी रहे गांव गिराम के लोग और मंदिर-मस्जिद जाने वाले पुरातनपंथी तो उनकी तो हमेशा यही आदत रहती है कि नयी चीजों (हालांकि भाईयों और बहनों ने बताया है कि यह नयी चीज नहीं) को देखकर वो नाक भौं सिकोड़ देते हैं। इस देश को क्या पसंद करना चाहिए और क्या नापसंद यह फैसला कम अक्ल (इत्तेफाक से ऐसे ही लोग बहुसंख्यक हैं) लोग थोड़े ही कर सकते हैं। हम कैसे कपड़े पहनें, कितने ना पहनें (कान फिल्म समारोह में अभिषेक और ऐश्वर्या के कपड़े से सीख ले सकते हैं) और मियां-बीबी की तरह का सीन पार्कों में दें या तालाब में ऐसी चीजें हमें या तो फिल्म के हीरो-हीरोइनों से सीखनी चाहिए या जैसा हमारे लखटकिया पत्रकार भाई-बहन बताएं वैसा करना चाहिए। इसी तरह हम जैसे सरकारी स्कूलों से पास छात्रों के दिमाग में पता नहीं क्यों यह बात आती है कि दुनिया में कई चीजें जमाने से होते आ रही हैं। वैसा करने से रोकने वाला कोई और कानून तो नहीं इस देश में। कहीं कोई अल्पसंख्यक वर्ग अपने प्यारे जानवरों (माफ कीजिएगा पेट) से वैसा ही रिश्ता कायम करना चाहे तो...। या जिसे अंग्रेजी में इंसेस्ट कहा जाता है, कोई अल्पसंख्यक वर्ग तो ऐसा जरुर होगा कि जो यह अधिकार चाहता होगा। आखिर दो दिल कैसे प्यार करें इसका फैसला तो उन्हें ही करने देना चाहिए या हर जगह हम टांग अड़ाएंगे? कल होके कोई भाई या बहन ऐसा कुछ अपने प्रोग्राम में करने की टे्रनिंग दें तो हम जरुर खुश होने की कोशिश करेंगे। जिसे न देखना हो उसपर कोई जबर्दस्ती तो नहीं। अबकी इस खुशी में हम भी झंडा लेकर फहराएंगे। इस बार बेवकूफ बन गये, और बन सकते नहीं। हम यह भी सोच रहे कि अखबारों में छपने वाले अप्राकृतिक यौनाचार की खबरों का क्या होगा? जिन गुरुजी पर यह आरोप लगता है वह हाईकोर्ट का फैसला पढऩे लगे तो। फिर बालक की उम्र और उसकी सहमति पर फैसला करना कितना मुश्किल होगा? इसी तरह हमारे विज्ञापन वाले बंधु जन-जन या जनानी-जनानी वाली शादी का विज्ञापन किस तरह छापेंगे? किसे वर और किसे वधु वाले सेक्शन में रखा जाएगा? और आखिरी सवाल। एक एंकर बहन ने एक कार्यक्रम के दौरान यह बताया कि लगभग सत्तर प्रतिशत लोगों ने उन्हें संदेश भेजा है कि वे ऐसे संबंध के पक्ष में नहीं जबकि बाकी को कोई आपत्ति नहीं। मैं यह सोच रहा था कि कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले भाई और बहन लोगों का प्रतिशत क्या है? फिलहाल मैं अपनी मुर्गियों को लेकर चिंतित हूं क्योंकि सबों ने यह फैसला किया है कि वह अब मेरे गांव में नहीं रहेंगी। उनका कहना है कि हमें मुर्गों का साथ लिये बहुत दिन हो गये अब मुर्गियों का ही साथ चाहिए और वह तो दिल्ली या बम्बई जैसे शहरों में ही मिलेगा। यहां तो खुल्लम खुल्ला यह नहीं कर सकते ना!

मो. समी अहमद
(लेखक हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर संस्करण में उप समाचार संपादक हैं।)

बुधवार, 1 जुलाई 2009

बिहार में तरूण तेजपाल की हत्या हो गयी

बिहार के बेतिया जिला स्थित एसपी कार्यालय द्वारा जारी एक प्रेस बयान के मुताबिक तहलका डाट काम, नोएडा वाले तरूण तेजपाल की हत्या कर दी गयी है और हत्या को अंजाम देने वाले को पुलिस ने दबोच लिया है।
बयान के अनुसार बुधवार को खुफिया सूचना मिली की कुख्यात राजेश यादव उर्फ मुलायम, पिता बिगन यादव मांझीविशुनपुरा थाना कोतवाली पडरौना जिला कुशीनगर, (यूपी) बिहार के बेतिया शहर में घटना को अंजाम देने के लिए आया है। पुलिस ने छापेमारी कर इसे गिरफ्तार भी कर लिया है।
जारी प्रेस बयान में पकड़े गये आरोपी का जो आपराधिक रिकार्ड बताया गया है उसमें सातवें नंबर पर कुछ यूं लिखा गया है- तहलका डाट काम, नोएडा के संपादक तरूण तेजपाल की हत्या में अवधेश त्यागी के साथ संलिप्त था।
बहरहाल, जब पुलिस का यह प्रेस बयान मिला तो सभी अचंभित हो गये। कुछ मीडिया वालों ने एसपी कार्यालय को फोन कर इस बाबत पूछताछ की। मीडिया वालों ने बताया कि तरूण तेजपाल जिंदा हैं। वह देश के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं। इसके बाद एसपी कार्यालय ने मीडिया वालों से कहा कि गलती हो गयी है। कृपया इस बात का उल्लेख खबरों में नहीं करें।
खैर, इस प्रेस बयान ने बिहार की पुलिस की कार्यशैली को उजागर तो कर ही दिया है।