सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना

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गुरुवार, 30 मई 2013

ग्राम स्‍वराज की 'बेनजीर'



पंचायतीराज और महिलाएं - 1

इसे बिहार में पचास फीसद महिला आरक्षण का कमाल कहें या धीरे-धीरे मजबूत होती पंचायतीराज व्‍यवस्‍था का असर। सच्‍चाई यह है कि राजधानी पटना से 80 किलोमीटर दूर मुजफ्फरपुर जिले के गांवों की तस्‍वीर तेजी से बदल रही है। महिलाएं हर स्‍तर पर सशक्‍त हो रही हैं। नई इबारत गढ़ रही हैं। दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बन रही हैं। कमजोर वर्ग की महिलाओं की तो पूछिए मत, 'बेनजीर' बनकर उभर रही है। इन महिलाओं ने अगर घर से बाहर कदम रखने का साहस जुटाया है तो इसके पीछे कहीं न कहीं पंचायतीराज व्‍यवस्‍था की अहम भूमिका है। अगर महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलता, वह चुनाव लड़कर गांव की सत्‍ता नहीं संभालतीं, तो शायद अन्‍य महिलाएं भी जागरुक नहीं हो पातीं। पेश है तीन ऐसी गरीब ग्रामीण महिलाओं की कहानी, जिनसे हर कोई प्रेरणा लेने के लिए मजबूर हो जाएगा। - रिपोट : एम. अखलाक
पहली महिला जादूगरनी कंचन प्रिया

महज 19 वर्षीय कंचन प्रिया बिहार की पहली महिला जादूगरनी हैं। मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड स्‍थित सुस्‍ता मोहम्‍मदपुर गांव की रहने वाली इस दलित समुदाय की लड़की ने रिश्‍ते के भाई और पेशे से शिक्षक संजय कुमार चंचल से जादू की शिक्षा हासिल की। इसके बाद गांव की हमउम्र लड़कियों की मंडली बनाकर एक विशाल जादू टीम का गठन किया। गांवों में सीमित संसाधनों के बीच जादू शो करने लगी। गांव वालों को एक बेहतर मनोरंजन का माध्‍यम मिल गया। लेकिन शहरों तक पहुंच नहीं बना पा रही थी। वर्ष 2011 में गांव जवार जनसंगठन के संपर्क में आई। पहली प्रस्‍तुति खादी भंडार परिसर में आयोजित लोक जमघट नामक सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में हुई। गांव जवार ने युद्धस्‍तर पर ब्रांडिंग की। उसके बाद शहर के सबसे बड़े आम्रपाली आडिटोरियम में एक महीने का जादू शो किया। गांव के लोगों से कर्ज लेकर। कंचन प्रिया वह तमाम जादू शो करती हैं जो बड़े बड़े जादूगर करते हैं। मसलन लड़की को हवा में उड़ा देना, आरी से दो हिस्‍सों में काट देना, लड़के को जानवर बना देना, तलवार को गले के आरपार कर देना, खाली हाथों से रुपये बरसाना, आंखों पर पट़्टी बांध कर शहर में बाइक चलाना आदि आदि। कंचन अपने दर्शकों से हर शो में कहती है कि यह कोई जादू टोना नहीं है, बल्‍िक हाथों की सफाई है। पहली बार शहर में शो करना था। घर वाले इजाजत नहीं दे रहे थे। परिजनों का कहना था कि अखबार में फोटो छपेगा, बदनामी होगी, शादी में दिक्‍कत आएगी। लेकिन गांव जवार ने परिजनों की काउंसलिंग की तो वे मान गए। गांवों में जहा संसाधनों की कमी के कारण बड़े जादूगर नहीं पहुंच पाते हैं, वहीं कंचन अपनी टीम के साथ लगातार गांवों में शो कर रही है।
राजकुमारी बन गई किसान चाची
खेती-किसानी सिर्फ मर्द ही नहीं औरतें भी कर सकती हैं, इस सच को साबित कर दिखाया है किसान चाची ने। जी हां, पूरा नाम है राजकुमारी देवी। मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड की माणिकपुर पंचायत के आनंदपुर गांव की रहने वाली किसान चाची की उम्र करीब 57 साल है। बचपन में अपने शिक्षक पिता के साथ खेत में जाती थीं तो बड़े भाई विरोध करते थे। फिर भी उन्हें पिता का साथ मिलता रहा और उस समय से ही कृषि में रुचि रखने लगीं। अब स्‍वयंसहायता समूह के माध्‍यम से महिलाओं को खेती-किसानी का प्रशिक्षण देती हैं। मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार सम्‍मानित कर चुके हैं। मीडिया के लिए सेलिब्रेटि बन चुकी हैं। 1974 में शादी हुई। 1989  में घर का बंटवारा हुआ। पति के हिस्से में तीन एकड़ जमीन आई। घर की हालत ठीक नहीं थी। राजकुमारी से  रहा नहीं गया। खेती में हाथ बंटाने लगीं। पति ने भी इसका विरोध किया। पति के घर से बाहर जाने के बाद खेतों में जाकर सब्जी उगाने लगीं। इसी बीच स्वयं सहायता समूह से भी जुड़ गईं। इतना ही नहीं साइकिल से गांव-गांव घूमकर महिलाओं को जोड़ने लगीं। गांव में साइकिल चलाती महिला को देखकर लोग तंज भी कसते, लेकिन राजकुमारी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा।  1996 में राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा के वैज्ञानिकों से संपर्क किया। उन्नत बीजों से पपीता, खीरा, कद्‌दू की खेती शुरू की। किसान चाची मैट्रिक पास हैं। एक दिन पता चला कि तंबाकू खाने से कैंसर होता है, उन्‍होंने पति को समझाया और हमेशा के लिए तंबाकू की खेती बंद करा दी। खुद जैविक खाद बनाती हैं और उपयोग भी करती हैं। आज उनकी माली हालत काफी अच्छी है। 2007 में कृषि विभाग की गेहूं की खेती पर किसान पाठशाला योजना में उन्हें माणिकपुर पंचायत के वीरपुर गांव में प्रशिक्षण देने का जिम्मा सौंपा गया था। इसी समय से लोग उन्हें किसान चाची कहकर संबोधित करने लगे।
ब्रांड बन गई हनी गर्ल
मुजफ्फरपुर जिले के बोचहा प्रखंड के पटियासी गांव में जन्मी अनीता बचपन में बकरी चराया करती थी। छोटे स्‍तर पर मधुमक्खी पालन का व्यवसाय शुरू कर इतिहास रच दिया। आज वह ब्रांड बन गई है। हर कोई उसे ‘हनी गर्ल’ के नाम से पुकारता है। उसकी सफलता की कहानी राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की चौथी कक्षा की पाठ्य पुस्तक में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। अपनी पढ़ाई का खर्च पूरा करने के लिए अनीता ने सबसे पहले बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। जब उच्च शिक्षा के लिए और अधिक पैसों की जरूरत पड़ी तो उसने मधुमक्खी पालन का व्यवसाय शुरू किया। अब पिता और भाई भी इस काम में हाथ बंटाते हैं। वर्ष 2002 में दो बक्से से मधुमक्खी पालन का कार्य शुरू किया था। आगे चलकर राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा से मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लिया। विश्वविद्यालय ने उन्‍हें सर्वश्रेष्ठ पालक का पुरस्कार भी दिया। वर्ष 2006 में उसे जोरदार शोहरत मिली। यूनिसेफ ने उसकी कहानी पर रिपोर्ट जारी की। अनीता की प्रेरणा से आज गांव की करीब सात सौ महिलाएं आधुनिक तरीके से मधुमक्‍खी पालन करने लगी हैं। खैर, खुशी की बात यह है कि इसी साल 29 मई को अनीता शादी के बंधन में भी बंध चुकी हैं।

रविवार, 15 मई 2011

पानी पर नीतीश का 'जजिया कर'

विपक्ष विहीन बिहार में मिस्‍टर सुशासन उर्फ मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार की जनविरोधी नीतियां अब एक-एक कर जनता के सामने आने लगी हैं। पहले बिजली के बाजारीकरण का खेल शुरू हुआ। खेल खत्‍म होने से पहले ही पानी के बाजारीकरण का खेल भी शुरू हो गया है। पक्‍की खबर है कि सूबे में अब लोगों को अपनी जमीन से पीने के लिए पानी निकालने पर नीतीश सरकार को 'जजिया कर' (टैक्‍स) देना होगा। यही नहीं जो जितना अधिक पानी यूज करेगा उसे उतना ही अधिक टैक्‍स देना होगा। यानी पानी अब पराया गया है। जल पर जन का अधिकार नहीं होगा। वैसे मिस्‍टर सुशासन का तर्क है कि इससे भू-जल की बर्बादी नियंत्रित होगी। सूबे के सभी नगर निगमों और पंचायती राज संस्‍थाओं के पास इस बाबत तुगलकी फरमान भेज दिए गए हैं। कई जगह अखबार वालों ने 'गुड न्‍यूज' 'खास खबर' और जल संरक्षण की दिशा में राज्‍य सरकार द्वारा उठाए गए एक महत्‍वपूर्ण कदम जैसे भाव के साथ इस खबर को परोसा है। सूबे के किसी भी अखबार ने इसे जनविरोधी बताने की जुर्रत नहीं की है।
पहले ही बन गई थी रणनीति

करीब दो साल पहले बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार की सरकार ने इस विधेयक को पास कराया था। तब किसी भी विपक्षी दल (राजद-लोजपा-वामदल) या विधायकों ने विरोध नहीं जताया था। अखबारों में भी छोटी-छोटी खबरें प्रकाशित हुई थीं। दरअसल, यह विधेयक कितना जनविरोधी है उस समय कोई ठीक से समझ ही नहीं पाया। और भला समझता भी कैसे ? उसके लिए दिमाग जो चाहिए। खैर, बिहार में अक्‍सर ऐसा होता आया है कि विधेयक पारित होते समय विधानमंडल में कोई प्रतिरोध नहीं होता। जब विधेयक लागू होने की बारी आती है तो जनता और पार्टियां सड़क पर उतरने लगती हैं। शायद इस बार भी ऐसा ही होता, लेकिन आसार नहीं दिख रहे हैं। क्‍योंकि इस बार तो विपक्ष सिरे से ही गायब है। आखिर मुंह खोलेगा कौन ? मीडिया से तो उम्‍मीद ही बेमानी है। वह तो मुख्‍यमंत्री के मुखपत्र की भूमिका निभा रहा है। मुझे अच्‍छी तरह याद है जब विधेयक पास हुआ था तो मैंने मुजफ्फरपुर में भाकपा माले के कुछ साथियों से विरोध जताने की अपील की थी, लेकिन उन्‍होंने भी गंभीरता से नहीं लिया।
किसने दिखाई नीतीश को राह

यों तो देश में पानी के बाजारीकरण का खेल वर्ष 1990-91 में नई अर्थव्‍यवस्‍था को अपनाने के साथ ही शुरू हो गई थी। लेकिन बिहार में यह नीतीश कुमार के शासनकाल से दिखाई दे रहा है। मुख्‍यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार कुमार वर्ल्‍ड बैंक के एजेंट की भूमिका निभाने लगे हैं। ठीक उसी तरह जैसे आंध्र प्रदेश में कभी चंद्रबाबू नायडू निभाया करते थे। उन्‍होंने भी अपने यहां भू-जल पर टैक्‍स लगा रखा है। ऐसे में भला नीतीश कुमार पीछे कैसे रह सकते थे। इन्‍होंने भी आंध्र प्रदेश का माडल बिहार में चुपके चुपके लांच कर दिया।
क्‍यों जरूरी है नीतीश का विरोध

नीतीश कुमार के विकास का माडल हर तरह से वर्ल्‍ड बैंक को मालदार बनाने वाला है। पूंजीपतियों व विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाला है। आम आदमी को इससे कोई फायदा नहीं होगा। करीब 20-25 वर्षों के बाद बिहार का हर आदमी अप्रत्‍यक्ष रूप से वर्ल्‍ड बैंक को कर्जा चुकाते नजर आएगा। इतना ही नहीं सूबे के गरीब और गरीब हो जायेंगे। बुनियादी संसाधनों पर से उनका हक धीरे-धीरे छिन जाएगा। जल, जंगल और जमीन जैसी जन-जायदाद पर वर्ल्‍ड बैंक गिद्ध की तरह नजर गड़ाए हुए है। अगर नीतीश जैसे एजेंटों का विरोध नहीं हुआ तो देश गुलाम हो जाएगा।
- एम. अखलाक

बुधवार, 11 मई 2011

नीतीश, बिजली, बवाल और सच

बिजली संकट को लेकर इन दिनों बिहार में घमासान छिड़ा है। चहुंओर। बस नजर घुमाइए दिख जाएगा। क्‍या यह घमासान प्रायोजित है ? आपने इस दिशा में सोचने की पहल की ? आइए, आपको कुछ बातें याद दिलाते हैं, शायद इससे तस्‍वीर साफ हो जाए।

बात नंबर एक - बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार हर दिन केन्‍द्र की मनमोहन सरकार को कोस रहे हैं। केन्‍द्र भी सफाई दे रहा है। यानी आरोप - प्रत्‍यारोप का दौर जारी है। जनता भी इसे चाव से पसंद कर रही है। अखबार इस बात के सुबूत हैं। हर दिन खबरें छपने का मतलब है, खबर बिक रही है। और बिकने का मतलब है खरीदने वाली जनता पसंद कर रही है। तो भइया, असल बात यह है कि राज्‍य और केन्‍द्र के बीच चल रहे इस घमासान की जमीन विधानसभा चुनाव के दौरान ही तैयार हो गई थी। चुनावी सभाओं में नीतीश कुमार चिल्‍ला-चिल्‍ला कर कह रहे थे- अब बिजली के क्षेत्र में काम करना है। चुनाव खत्‍म हुआ। जीत का सेहरा बंध गया। काम करने का समय आ गया है। सो, बिजली मुद्दे को लेकर उनकी सियासत शुरू हो गई है। यह कब तक चलती रहेगी, सही-सही जवाब मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ही दे पाएंगे।

बात नंबर दो - बिजली की किल्‍लत लालू-राबड़ी के राजपाठ में सबसे अधिक थी। क्‍योंकि तब सुशासन नहीं जंगल राज था, जैसा कि नीतीश कुमार कहते हैं। 'साधु' शेर बनकर जंगल में मंगल मनाया रहे थे। सूबे में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद सुशासन आ गया। यही नहीं पांच साल में ही हालत भी तेजी से सुधर गए। लगभग सबकुछ दुरुस्‍त होता दिख रहा है। लेकिन बिजली को लेकर सुशासन में अचनाक बवाल मच गया। जनता हर जिले में, हर गांव में, हर टोला-मुहल्‍ला में टायर जलाकर, लाठी-डंडा लेकर विरोध प्रदर्शन करने लगी। बिजली दो, बिजली दो... के नारे लगा रही है। अखबरों में फोटोयुक्‍त खबरें छप रही हैं। अब सवाल उठता है कि जनता क्‍या सचमुच जागरूक हो गई है ? यदि जवाब हां है तो तब जनता इस कदर विरोध क्‍यों नहीं कर रही थी ? अखबार वाले इस कदर खबरें क्‍यों नहीं छाप रहे थे ? अचानक सबकुछ जागरूक कैसे हो गया ? क्‍या जनता और मीडिया पर नीतीश का कोई मंत्र काम कर रहा है ?

हकीकत क्‍या है - दरअसल, मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार का विकास माडल वर्ल्‍ड बैंक पोशक है। राज्‍य सरकार सबकुछ निजी हाथों में सौंपने के लिए आतुर है। इसी क्रम में सूबे में बिजली के बाजारीकरण की तैयारी पूरी हो चुकी है। प्रथम चरण में पटना, मुजफ्फरपुर और भागलपुर में बिजली को निजी हाथों में देने की योजना है। संभव है कुछ ही महीनों में यह खबर सामने आ भी जाए। नीतीश कुमार को अच्‍छी तरह पता है कि बिजली के बाजारीकरण का विरोध होगा। उनके लोक कल्‍याणकारी राज्‍य की छवि प्रभावित हो सकती है। इससे बचने के लिए उन्‍होंने खास रणनीति बनाई है। जिसके तहत जदयू कार्यकर्ता जगह-जगह जनता को विरोध प्रदर्शन के लिए उकसा रहे हैं। अगर आप गौर फरमाएं तो इन विरोध प्रदर्शनों में कहीं भी मुख्‍यमंत्री का पुतला दहन नहीं हो रहा है। टारगेट कोई और होता है। इतना ही नहीं नीतीश कुमार के इशारे पर नाचने वाले सूबे के अखबारों ने भी ऐसी खबरों को प्रमुखता से स्‍थान देने की हिदायत अपने रिपोर्टरों को दे रखी है। दरअसल, मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार आने वाले दिनों में यह कहकर बिजली को निजी हाथों में सौंपना चाह रहे हैं कि जनता को इससे राहत मिलेगी। जनता लगातार बिजली की मांग कर रही थी, सो उन्‍होंने ऐसा कदम मजबूरी में उठाया। केन्‍द्र ने उनकी कोई मदद नहीं की। आदि आदि। यानी कुल मिलाकर बिजली के बाजारीकरण का खेल चल रहा है।

- एम. अखलाक

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

कैसे गाएं, धरती बनी है दुल्हन साथियो

पृथ्वी दिवस : उत्तर बिहार में छिन गये जल-जंगल-जानवर रूपी गहने

धरती खुदा की लाजवाब नेमत है। आईना वही रहता, चेहरे बदल जाते हैं। एक वक्त ऐसा था जब उत्तर बिहार की धरती जल, जंगल और जानवर से आबाद थी। धरती जब हरियाली की चादर ओढ़कर मचल उठती तो कृषक फसल उत्सव का गान अलापते झूमने लगते। पर रफ्ता-रफ्ता धरती को हमारी ही नजर लग गई।

धरती के दामन पर हमने धड़ल्ले से रासायनिक खाद छिड़ककर हरियाली को लूट लिया। अब जैविक खाद के बहाने हरियाली लौटाने की बात कर रहे हैं। निर्झर बहने वाली नदियों को कुछ यों छेड़ा कि अब कहीं पानी-पानी है तो कहीं सूखा। इसी तरह पहले हमने झोले को ताक पर रखकर पॉलीथिन से दोस्ती गांठ ली, अब बांझ होती धरती पर मर्सिया गा रहे हैं।

मधुबनी, दरभंगा और समस्तीपुर में धरती की प्यास बुझाने वाले हजारों तालाबों, कुओं पर पिछले आठ-दस सालों में धड़ाधड़ हमने मकान खड़े कर लिए। अब माछ और मखाना का उत्पादन गिर रहा है तो छाती पीट रहे हैं। सिर्फ मधुबनी जिले में दस हजार तालाब थे। अब 3-4 हजार पर सिमट गये हैं। आखिर कहां गए तालाब?

उधर, समस्तीपुर जिले में वाया नदी और पश्चिमी चंपारण में चंद्रावत सूख चुकी है। पूर्वी चंपारण में लालबकेया नदी और सीतामढ़ी में लखनदेई नदियों की तलहटी भी चमक रही है। नेपाल से निकलने वाली सरिसवा नदी अब नाला बन चुकी है। कल-कारखाने नदी में ही जहर उगल रहे हैं। शान-ए-मोतिहारी यानी मोतीझील भी इतिहास बनने की ओर अग्रसर है। पर, इस बारे में सोचने की किसी को फुर्सत कहां? समस्तीपुर के तो दर्जनों गांवों में पीने के लिए पानी नहीं मिल रहा है। जहां धरती सौ फुट पर ही पानी उगल देती थी, अब वहां का जलस्तर 300 फुट नीचे चला गया है।पश्चिमी चंपारण स्थित वाल्मीकिनगर टाइगर रिजर्व आज भी सूबे का गौरव है, लेकिन कहने भर के लिए। जंगल से न सिर्फ घास, पेड़-पौधे बल्कि जानवर भी गायब हो चले हैं। यहां अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और जानवरों का शिकार आम बात बन गई है। कभी यहां दर्जनों बाघ दहाड़ते थे। अब बमुश्किल एक दर्जन बचे हैं। इसी तरह मोतिहारी शहर में सड़कों के किनारे लगाए गए ऐतिहासिक महोगनी के पेड़ सबकी आंखों के सामने काट डाले गए। धरती का आंचल सपाट हो गया। पर किसी को तरस नहीं आया। ऐसे संकट के दौर में हम ताल ठोक कर कैसे गाएं - आज धरती बनी है दुल्हन साथियो।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

(पृथ्‍वी दिवस पर यह रपट दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर के पेज वन पर छप चुकी है।)

ऐसे थे आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री

आचार्य श्री से जुड़े संस्मरण शहर के साहित्यकारों की जुबानी

भाषा में अशुद्धि बर्दाश्त नहीं थी -
गुरुदेव आचार्य प्रवर के सान्निध्य में रहकर छात्र जीवन से ही कविताएं लिखने लगा था। इस कारण उनके यहां आना जाना लगा रहता था। एक दिन सुबह नौ बजे कालेज जाने से पहले ही उनके दर्शनार्थ निराला निकेतन पहुंचा तो किसी ग्रामीण क्षेत्र से आए एक शिक्षक-कवि उन्हें लगातार अपनी कविताएं सुनाए जा रहे थे, घोर अशुद्धियों से भरी हुई। मगर विवश भाव से बिना कोई टिप्पणी किए आचार्य श्री उन्हें सुने जा रहे थे। मैं उन्हें प्रणाम कर ज्यों ही वहां बैठा, उन्होंने राहत की सांस ली। उन कवि महोदय से उन्होंने मेरा परिचय कराया और उन्हें कहा ये भी कवि-साहित्यकार हैं। बची हुई कविताएं इन्हें सुनाइए, मैं जरा गायों को चारा-पानी दे आऊं, भूखी होंगी बेचारी। आपकी कविताओं से तो उनका पेट नहीं भरेगा। यह घटना इस बात की पुष्टि करती है कि महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री को भाषा में अशुद्धि जरा भी बर्दाश्त नहीं थी।

- डा. शेखर शंकर, साहित्यकार


सिर्फ वर्तमान मुझमें जीता है -
महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री हर स्थिति में वर्तमान के पल के साथ जीने के आदी थे। लगता ही नहीं था कि उनकी चेतना कभी अतीत में डूबकर वर्तमान का अनदेखी कर देगी। अभी-अभी की बात है, शास्त्री जी एसकेएमसीएच में अपनी धर्मसंगनी छाया देवी के साथ सघन चिकित्सा में चल रहे थे। परिवेश में हरकत थी। लोग सोचते थे, पता नहीं कब उनकी सांस की डोर ढीली पड़ जाए और उनकी चेतना चिरविस्मृति की चादर ओढ़कर शून्य में विलीन हो जाए। शायद ऐसा सोचकर ही कुछ लोग पारंपरिक संस्कार से वशीभूत हो चले थे। शास्त्री जी के अत्यंत निकट छाया की तरह निरंतर उनके पीछे डोलने वाले उनके साले जयमंगल मिश्र आइसीयू कक्ष में उनके साथ थे। इसी बीच मैं वहां पहुंचा। मुझे देखकर शास्त्री जी की बेचैनी स्निग्ध मुस्कान में परिणत हो गई। लेकिन होंठो पे शब्द आने से रहे। श्री मिश्र ने शास्त्री जी से पूछा, इन्हें पहचानते हैं आप? उत्तर मिला, इस तरह उटपटांग प्रश्न क्यों पूछते हो? ऐसा प्रश्न तो उनसे पूछा जाता है जो आखिरी सांस लेते हुए मृत्यु के आलिंगन के लिए विवश दिखाई देते हैं। मैं कोई विवश व्यक्ति नहीं हूं। पूरे रूप में वही हूं जिस रूप में दुनिया मुझे निरंतर देखती रही है। शायद तुम्हारे चले जाने के बाद उसी रूप में देखती रहेगी।

- डा.रामप्रवेश सिंह, हिन्दी विभागाध्यक्ष, बीआरए बीयू मुजफ्फरपुर


अपने वंश का अंतिम आदमी -
1990 के दशक की बात है। शास्त्री जी की बड़ी बहन मानवती मिश्रा बीमार थीं। उन दिनों मैं दलसिंह सराय कॉलेज का प्राचार्य था। शास्त्री जी के अत्यंत निकट होने तथा उन पर पहला शोध प्रबंध लिखने के कारण उनका मुझे स्नेह मिलता था। यही वजह थी कि बहन के बीमार होने पर उन्होंने मुझे सूचना देकर बुलाया। जब मैं निराला निकेतन आया तो संयोगवश बीमार मानवती मिश्रा कराहने लगीं। जोर-जोर से चिल्लाने लगीं। सहयोग के लिए वे दौड़कर वहां गए। मैं भी गया। बाद में उन्होंने सेवा के लिए दो आदमी भेजने को कहा। मैंने कॉलेज के दो चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों को निराला निकेतन में तैनात कर दिया। पर मानवती मिश्रा नहीं बच सकीं। उनका निधन हो गया। श्राद्ध में जब यहां आया तो बहुत साहित्यकार जुटे हुए थे। आंगन में पगड़ी बांधने का काम हुआ। तत्पश्चात वे एकाएक आंगन के बाहर पिताजी के मंदिर में आए और अपनी पगड़ी उतार उनके चरणों पर रख दिया- 'लीजिए पिताजी यह पगड़ी। मैं आपके वंश का अंतिम आदमी हूं।' और कुछ देर तक वहीं लेटे रहे। मौजूद लोग स्तब्ध!

- डा. आश नारायण शर्मा, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, मिथिला विवि, दरभंगा


पिता-पुत्र आमने सामने बैठते हों -
आचार्य श्री जहां बैठा करते थे उसके ठीक सामने उनके पिता की मूर्ति है। ऐसा लगता था मानों पिता और पुत्र आमने-सामने बैठे हों। मेरा घर बगल में है। सो, उनका सानिध्य मुझे बचपन से ही मिलता रहा। वे बिना पिता को भोग लगाए अन्न की थाली ग्रहण नहीं करते थे। कहते थे कि आज मैं जो भी हूं उन्हीं के कड़े अनुशासन का फल है। पिता ने मेरे कारण दूसरा विवाह नहीं किया। शास्त्री जी के ठीक पीछे नीम का एक पेड़ है। एक बार उस पर करैले की लतर चढ़ गई। वे आने-जाने वालो को दिखाकर कहा करते- 'देखो यह मेरा प्रतीक है। एक तो करैला, उस पर नीम चढ़ा।' गालिब की तरह अपना मजाक उड़ाने की क्षमता कम रचनाकारों में होती है। शास्त्री जी के व्यक्तित्व की यह एक खास पहलू थी। पांव की हड्डी टूटने पर वे कभी कभी खीज जाते। कहते, 'हे इश्वर, मैं अपने आसपास के इन कुछ मनुष्यों को बर्दाश्त नहीं कर पाता हूं। तुम सृष्टि के सारे मनुष्यों को कैसे बर्दाश्त करते होगे। सचमुच तुम महान हो।'

- डा. रश्मि रेखा, साहित्यकार


... इस तरह अपने हो गए शास्त्री जी -
1974 की बात है। आचार्य श्री भीखना पहाड़ी पटना में बेला पत्रिका छपवाया करते थे। हिन्दुस्तानी प्रेस के निकट ही एक मकान में आलोक धनवा रहते थे। मैं दिन के साढ़े दस बजे आलोक के साथ गपशप कर रहा था। इसी बीच नीचे से आवाज आई। आलोक जी हैं? मैंने कहा- ये तो शास्त्री जी की आवाज लगती है। आलोक नीचे गए और शास्त्री जी को लेकर ऊपर आए। मुझे देखकर शास्त्री जी ने अपनी सहज विनोदमयी मुद्रा में कहा- अरे, यह नास्तिक आपके यहां कैसे? आलोक ने कहा- नंदन जी हमारे सहज आत्मीय मित्रों में से एक हैं। उल्लेखनीय है कि गंगा में ऐसी बाढ़ आई थी कि पहलेजा होकर लौटना बंद हो गया था। हमलोगों ने मैटनी-शो में गुलजार निर्मित फिल्म मौसम देखने का प्रोग्राम बनाया। इसके बाद पटना से समस्तीपुर पैसेंजर से दोनों साथ लौटे। यात्रा के बाद हम दोनों न केवल रचनात्मक स्तर पर बल्कि मानवीय स्तर पर इतने गहरे आत्मीय हो गये कि हमारे सुख दुख और चिंताएं एक हो गई।

- नंद किशोर नंदन, साहित्यकार


हाय, तू भी मनुष्य हुआ चाहती हो -
एक बार की बात है। अपने कुत्ते और बिल्लयों से घिरे आचार्य श्री बैठे हुए थे। कई साहित्यकार और पत्रकार भी मौजूद थे। इसी बीच उनकी एक कुतिया बिल्ली पर झपट पड़ी। आचार्य श्री ने उसे डांटते हुए बड़े प्यार से कहा- हाय तू भी मनुष्य हुआ चाहती हो।

- डा. संजय पंकज, साहित्यकार


प्रस्तुति : एम. अखलाक

(ये संस्‍मरण दैनिक जागरण में प्रकाशित हो चुके हैं।)

'मेरे लिए पिता ही मां थे और बाप भी'

आर्चाय जानकी वल्लभ शास्त्री की कहानी उन्हीं की जुबानी

कुछ माह पहले महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने एक इंटरव्यू में अपने बारे में कुछ-कुछ बताया था। पेश है उनसे जुड़ी एक छोटी-सी कहानी उन्हीं की जुबानी -
शास्त्री जी कहने लगे- 'गया से भी 40 मील आगे एक गांव है मैगरा। फिर उसे समझाते हुए अंग्रेजी में स्पेलिंग भी बताते हैं, एम ए आई जी आर ए। शायद पुरातनकाल में यह मायाग्राम रहा हो, और समय के साथ मैगरा बन गया हो। गौतम बुद्ध वाली जगह से हूं।
मां को मैंने कभी नहीं जाना। मेरी मां बचपन में ही मुझे छोड़ कर चली गई। एक दिन घर में लकड़ी नहीं थी, उन दिनों लकड़ी पर भोजन पकता था। पिताजी कहीं जा रहे थे, मां ने उनसे कहा, किसी को बोल दो लकड़ी दे जाएगा। नहीं तो भोजन नहीं बन पाएगा। क्रोध से पिताजी ने कहा कि सामने जो लकड़ी है उसी को जला लो। वह लकड़ी पूजा में प्रयोग के लिए किसी चीज की थी। काफी कीमती। ... दूसरे दिन मां को सांप ने काटा। मां चली गई। 5 वर्ष का रहा होऊंगा मैं।
मेरे पिताजी महापुरुष थे। मेरे पिता इतने बहादुर निकले कि लोगों के लाख कहने और समझाने पर भी उन्होंने दूसरी शादी नहीं की। किसके लिए? मेरे लिए। लड़के के लिए। अखंड मंडलाकार रह गए। पूजनीय थे। चले गए पिताजी, मैंने पिता का मंदिर बनवा लिया। वो देखो सामने। ये मंदिर मैंने अपने पिता की याद में बनवाया है। मैं कभी मंदिर में नहीं गया और न ही किसी देवता को पूजा। मेरे भगवान मेरे पिता हैं। उन्होंने कभी मेरा नाम नहीं लिया। बस एक ही बार बोले, तब चलें न जानकी वल्लभ? और चल पड़े! दुनिया में ऐसा पिता कहां मिलता है! सबसे बड़ी बात है कि यों कहने के लिए पिता होते हैं, वो नहीं थे, बकायदा पिता थे! बहुत बड़े विद्वान थे। छोटी उम्र में मां चली गई। मेरा जीवन चौपट हो गया था। मातृविहीन बालक था मैं। किसी के कहने पर शादी के लिए तैयार नहीं थे। किसी काम के लिए तैयार नहीं थे। सब काम मेरा गड़बड़ा गया। उन्होंने मां की भूमिका भी निभाई। मेरे लिए मेरे पिता ही मां थे और बाप भी। जब मैं मुजफ्फरपुर आ गया तो उनको भी अपने पास ले आया।''

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

(यह खबर आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री के निधन पर दैनिक जागरण मुजफ्फरपुर में छप चुकी है)

अस्त हुआ उत्तर छायावाद का सूरज

अब फिजां में गूंजेंगे 'किसने बांसूरी बजाई'

सूबे की सांस्कृतिक राजधानी मुजफ्फरपुर को साहित्यिक ऊर्जा प्रदान करने वाला, साहित्य की नई पीढिय़ों को तराशकर पहचान दिलाने वाला और देश भर में उत्तर छायावाद के गढ़ के रूप में बहुचर्चित निराला निकेतन के हिस्से में अब केवल अफसाने ही शेष रहे गए हैं। क्योंकि महाकवि आर्चाय जानकी वल्लभ शास्त्री अपनी यादों के सहारे हमें छोड़कर बहुत दूर चले गए हैं। हवा जब-जब निराला निकेतन की माटी को छूकर खुशबू बिखेरती हुई इठलाएगी, तब-तब आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की कही बातें, चेहरे के भाव, गीत और कविताएं हमारे बीच उनके जिंदा होने का एहसास दिलाती रहेंगी।कोई भी शहर, राज्य या देश वहां रहने वाले लोगों के होने से होता है। लेकिन इस शहर में आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के होने का एक गंभीर मतलब था। सच-सच कहा जाए तो यह शहर उनसे था। उनके कारण जाना-पहचाना जाता रहा है। यहां की साहित्यिक लीची की मिठास अगर दूर देश के लोगों को भाती थी तो नि:संदेह आचार्य श्री के कारण। इस शहर ने भले ही उन्हें बहुत कुछ नहीं दिया हो, पर वे अपनी साहित्यिक पीढिय़ों के लिए बहुत कुछ छोड़ गए हैं। उनके संस्कारों में पल-बढ़ कर जवान हुआ यह शहर शायद ही कभी उन्हें भूल पाएगा।एक ऐसा भी दौर रहा है जब आचार्य श्री की साहित्यिक गतिविधियां न सिर्फ फलक पर थीं, बल्कि महाप्राण निराला, पृथ्वीराज कपूर, उदय शंकर भट्ट, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेद्वी, आचार्य त्रिलोचन शास्त्री, कलम के जादूगर रामवृक्ष बेनीपुरी, क्रांतिकारी कवि रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, आचार्य महाशंकर मिश्र, आचार्य जयकिशोर नारायण सिंह व नवगीत प्रवर्तक राजेन्द्र प्रसाद सिंह सरीखे दर्जनों कवि-साहित्यकार निराला निकेतन का आतिथ्य स्वीकार कर गर्व करते थे। इतना नहीं नहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, स्व। चंद्रशेखर, उप राष्ट्रपति रहे स्व। भैरो सिंह शेखावत और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर भी निराला निकेतन में दस्तक दे चुके हैं। ये नेता कितने दीवाने थे। इसकी बानगी आचार्य श्री सुनाया करते थे। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने स्व. कर्पूरी ठाकुर के बारे में बताया था- 'उन्होंने केवल एक, मेरी एक कविता सुनी, मोहित हो गए, भक्त हो गए वो। 'किसने बांसूरी बजाई' करके उस जमाने में एक गीत गाता था मैं। इस गीत को जब उन्होंने मेरे गले से सुना तो गला पसंद आ गया उनको। गला ही काट लिया मेरा। जिन्दगी भर के लिए उन्हीं का हो के रह गया मैं। उन्होंने ही मुझको प्रोफेसर बनाया पटना में। जो कुछ काम किया वहीं किया। बताइए कहां मैं ब्राह्मण और कहां वो ठाकुर। किसी के यहां खा-पी नहीं सकता था मैं। उसको निभाते हुए इतना माना। मैं कोई महापुरुष नहीं था। पर उनके साथ रहकर इतना जाना कि कवि की भी इज्जत होती है। कर्पूरी जी सारी जिन्दगी मुझे काफी मान-सम्मान देते रहे।' खैर, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री पर इस सांस्कृतिक राजधानी को हर समय नाज रहा है, अब भी नाज है और हमेशा रहेगा।

प्रस्‍तुति - एम. अखलाक

(यह खबर दैनिक जागरण में पेज वन पर बाटम छप चुकी है।)