सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना

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शुक्रवार, 19 मार्च 2010

यह ठीक नहीं हो रहा नर्मदा माई

नर्मदा माई,

प्रणाम।

12 मार्च को तुमसे मिलने घाट पर पहली बार आया था। तुमको लहराते देखकर बचपन याद आ गया। तब गांव की छठी मइया के पोखर में दादी के संग नहाने जाया करता था। दादी कहती थी- पहले इसमें कोई साबुन से नहीं नहाता था। इसी पानी से हमलोग दाल पकाते थे। खूब पीला॥ जल्दी गल जाता था, लेकिन दादी के मरने से पहले ही साला सब सत्यानाश हो गया। राजा-रजवाड़ों के साथ रिवाज भी॥। नर्मदा माई, तुम भी तो अब हमारी छठी माई के पोखर की तरह ही हो गई हो। अब इसी को देखो न! किस तरह रगड़-रगड़ कर साबुन से तुम्हें नाश रहा है। कहता है- आया हूं नर्मदा माई से मिलने, पूजा करने, आशीर्वाद लेने, लेकिन आंख वाले अंधे को सरकारी हिदायत भी दिखाई नहीं देती। देखकर भी अनजान बन जाता है। माई, तुम्हीं इन्हें समझाओ न, आखिर ये तुम्हारे ही तो बेटे हैं? या तुम चुपचाप यों ही खत्म हो जाना चाहती हो?

खैर, मैं तुम्हारी गोद में उतर आया। तैरने नहीं आता। सो, छाती भर पानी में खूब डुबकी लगाई। मन नहीं माना तो तुम्हारी छाती पर नाव के सहारे तैरते हुए प्राचीन शिव मंदिर तक चला गया। हां वही मंदिर, जो अब भी अपने वजूद को बचाये हुए है तुम्हारी तरह। हर आने-जाने वाले को महेश्वर शहर की गौरव गाथा सुनाना नहीं भूलता।

माई! मन भला कैसे मानता? दूसरे दिन फिर सुबह-सबेरे ही तुम्हारे चरणों में आ पहुंचा। नील गगन में लाली बिखेर रहा सूरज तुम्हारे माथे की बिंदिया लग रहा था। तुममें लीन साधु बाबा एकतारा की धुन पर कबीर के दोहे सुना रहे थे। पता है, तुमसे मिलने के लिए दूर-दूर से आई औरतें तो उनको बीच में ही रोक कर तुम्हारी वंदना गीत गाने लगतीं। उनकी आस्था देखकर मेरा मन भी तुम्हारे लिए पसीज गया। सो, मैं भी साधु बाबा और उन औरतों के गीत चाव से सुनता रहा, जो कुछ-कुछ समझ में आए। वह तुमसे कुछ कहना चाहती थीं। अपनी पीड़ा बांटना चाहती थीं।

जानती हो माई, दोपहर में मेधा ताई भी मिली थीं। कह रही थीं- कुछ लोग तुम्हारी छाती चीर कर बांध बना रहे हैं। जिससे बिजली बनायेंगे। बड़े-बड़ों का घर, कारखाना गुलजार होगा। फिर तुम्हारे अपने बेटे तुमसे बहुत दूर चले जाएंगे। उनके गांव भी उजड़ जायेंगे। कुछ नहीं बचेगा। तभी तो तुम्हारे बेटे तुम्हें बचाने के लिए लड़ भी रहे हैं। जेल जाते हैं, छूटकर आते हैं, फिर लड़ते हैं, बार-बार लड़ते हैं और समवेत स्वर में कहते हैं- लड़ेंगे, जीतेंगे। माई, उनका क्या होगा पता नहीं, पर बेटे लड़ रहे हैं। और लड़े भी क्यों नहीं? तुम्हीं से तो उनकी जिंदगी है। तुम्हारे पानी से ही तो उनके खेत साल में तीन-तीन बार सोना उगलते हैं।

लेकिन माई, एक बात तुम्हारे तट पर अच्छी नहीं लगी। तीसरे दिन जो कुछ मैंने अपनी आंखों देखा, कलेजा मुंह को आ गया! मेरी जगह कोई भी होता उसका भी यही हाल होता। रोली तो रो ही पड़ी। और रोए भी क्यों नहीं? आखिर कोई कैसे देख-सह सकता है किसी बेबस औरत पर अत्याचार? माई, यह सबकुछ हो रहा था सिर्फ आस्था के नाम पर। तुम्हारी दुहाई दे-देकर ही तो वे महिलाएं उस बेजान-सी औरत का भूत भगा रही थीं। तुम्हारा ही तो हवाला देकर उसके कष्टों को तुम्हारे आंचल में बहाने का नाटक कर रही थीं। माई, उस बेजान-सी औरत को जंजीरों से पीटने की इजाजत क्या सचमुच तुमने दे रखी थी? भला तुम ऐसा कैसे कर सकती हो? तुम इतना क्रूर कैसे हो सकती है? माई, तुम तो जीवनदायिनी हो। तुम तो हरेक की पीड़ा हर कर निर्झर बहते रहने का न्यौता देती हो। तुम्हें ही तो देखने-पूजने के लिए देवी अहिल्या बाई ने तुम्हारे तट पर अपना राज-पाट बसा लिया था। तुम तो उनके लिए भी प्रेरणादायिनी रही हो। फिर ऐसा क्यों है? तुम्हारे सामने कोई अबला क्यों प्रताडि़त होती है? कोई कुछ क्यों नहीं बोलता? ऐसे समय में तुम भी खामोश क्यों हो? माई, काश! तुम्हारी लहरें इस बदनुमा दाग को धो पातीं। तुम्हारी लहरें इस कलंक को बहा ले जातीं। काश! कोई स्त्री तुम्हारे तट पर आकर जंजीरों से नहीं पिटती। यहां आने वाली हर स्त्री तुम्हारा ही गुणगान करती। कितना अच्छा होता जो तुम उन्हें देवी अहिल्या बाई बनने के लिए प्रेरित करती।

माई, माफ करना, जो देखा सो लिख डाला। आखिर तुम्हारा ही तो बेटा हूं। तुमसे नहीं कहूंगा तो किससे कहने जाऊंगा? बहुत जल्द आ रहा हूं तुम्हारे पास। हां, मेधा ताई और तुम्हारे लड़वैए बेटों के साथ मुझे कदम से कदम भी तो मिलाना है, माई! उम्मीद करता हूं अबकी आऊंगा तो शायद कोई साबुन लगाते या कोई तुम्हारी छाती पर बांध बनाते या तुम्हारे तट पर कोई अबला स्त्री प्रताडि़त होती नहीं दिखेगी। हां, सुनाई देंगे तो सिर्फ कबीर के दोहे, तुम्हारे लिए मंगलाचरण गाती हुई औरतें और देवी अहिल्या बाई के त्याग के किस्से।

रिपोर्ट - एम. अखलाक

सोमवार, 25 जनवरी 2010

इतने साल बाद आयी याद


ये हैं महाकवि आचार्य जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री। मुजफ्फरपुर स्थित अपने निराला निकेतन में अपने कुत्‍तों के साथ जीवन बिता रहे हैं। इन्‍हें सरकार ने पदमश्री देने की घोषणा की है। लेकिन आचार्य खुश नहीं है। कहते हैं- इतने साल बाद आई याद।

...और कुत्तों से इस तरह हो गया इश्क

लगा कि उससे मेरा पूर्व जनम का कोई रिश्ता है : आचार्य जानकी वल्लभ शास्‍त्री

मुजफ्फरपुर : यूं तो आपने महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री को गोद में कुत्तों को खेलते-खिलाते कई बार देखा होगा। लेकिन, बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि उन्हें कुत्तों से प्रेम हुआ कैसे? आइए जानते हैं महाकवि के ही शब्दों में, 'बहुत पहले की बात है। निराला निकेतन के लिए जमीन खरीद चुका था। मकान बनाने की तैयारी चल रही थी। मेरी जमीन के सामने प्रतिदिन एक कुत्ता आकर खड़ा हो जाता। शुरू में मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया। फिर वह मेरी निगाहों में चढ़ गया। उसे फटकार कर बहुत बार भगाने की कोशिश की, लेकिन विफल रहा। वह घूम फिर कर आ धमकता। मुझे निहारते रहता। मैं उसे देखकर दंग रह जाता। पता नहीं मुझे कैसे उससे लगाव हो गया। फिर तो वह मेरे साथ ही रहने लगा। मैंने ईश्वर का उपहार समझ कर उसे स्वीकार कर लिया। मुझे लगा कि पूर्व जन्म में उससे मेरा कोई रिश्ता रहा होगा, तभी भगाने का नाम नहीं ले रहा। तभी से कुत्ते भी मेरे वफादार साथी बन गये। देखिए ना, किस तरह मेरी गोद में उछल-कूद रहे हैं। अब इस कुतिए को ही देखिए, इसने चंद रोज पहले ही इन बच्चों को जन्म दिया है, बच्चे मेरी गोद में खेल रहे हैं और यह मेरे बगल में आराम से बैठी है। इसे पता है कि बच्चे सुरक्षित हैं।' यह रोचक संस्मरण आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने नवंबर 2009 में सुनाई थी। मौका था 'कौआ' नामक साहित्यिक पुस्तक के लोकार्पण का। तब सेहत ठीक नहीं होने के कारण वह निराला निकेतन के मंच तक नहीं पहुंच पाये थे। जिस बरामदे में रोजाना बैठते हैं, वहीं पुस्तक का लोकार्पण किया था। शहर के दर्जनों साहित्यकार, प्रकाशक और मीडियाकर्मी इसके गवाह बने थे। इस मौके पर आचार्य ने कोई औपचारिक भाषण तो नहीं दिया, लेकिन बज्जिका रामायण के रचयिता अवधेश्वर अरुण से करीब एक घंटे बातचीत की थी। इसी दरम्यान उन्होंने अपने पशु प्रेम का यह वाक्या भी सुनाया था।बहरहाल, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के संरक्षण में प्रकाशित होने वाली 'बेला' पत्रिका के संपादक विजय शंकर मिश्र के अनुसार निराला निकेतन का निर्माण 1950 में हुआ था। वर्तमान में यहां विनायक और भालचंद्र नामक दो कुत्तों और 40 गायों की समाधि है। ये दोनों महाकवि को बहुत प्यारे थे। 1997 में भालचंद्र और 1998 में विनायक ने इनका साथ छोड़ दिया। आचार्य कहते हैं कि व्यक्ति से धोखे की गुजांइश रहती है, लेकिन पशु जिससे प्रेम करता है, तन-मन से उसी का हो जाता है। फिलहाल, आचार्य के पास तीन कुत्ते और छह गायें हैं जिन्हें दिलो-जां से प्यार करते हैं। उनकी पहली गाय का नाम कृष्णा था।
रपट - एम अखलाक

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

लोक जमघट में जुटेंगे एक हजार लोक गायक

मुजफ्फरपुर : लोक कलाकार सफदर हाशमी और भिखारी ठाकुर की याद में रविवार को 'गांव जवार' सांस्कृतिक संगठन के बैनर तले एक हजार ग्रामीण कलाकार जिला स्कूल मैदान में जुटेंगे।'लोक जमघट' नामक यह सांस्कृतिक आयोजन सुबह 9 बजे प्रारंभ हो जायेगा और शाम पांच बजे तक चलेगा। इसमें प्रत्येक प्रखंड के तीन-तीन चुनिंदा लोक गायक पारंपरिक लोकगीतों की प्रस्तुति देंगे। इनमें कई प्रस्तुतियां ऐसी होंगी जो अब लुप्त होती जा रही हैं। कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले कुल 50 लोक गायकों की सूची तैयार कर ली गयी है। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित कलाकार, कला प्रेमी, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकता, शिक्षाविद् और पंचायत प्रतिनिधि प्रस्ताव पारित कर 'बिहार की कला नीति 2004' को सूबे में शीघ्र लागू करने की मांग राज्य सरकार से करेंगे।इस जमघट का उद्घाटन सूबे के लघु सिंचाई मंत्री दिनेश प्रसाद कुशवाहा, आपदा प्रबंधन मंत्री देवेश चंद्र ठाकुर, सांसद व पूर्व मंत्री कैप्टन जयनारायण प्रसाद निषाद, जिला परिषद अध्यक्ष किरण देवी, पूर्व उपमहापौर विवेक कुमार, बेटी बचाओ आंदोलन के संयोजक अरुण कुमार सिंह, दैनिक जागरण के संपादकीय प्रभारी धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव, प्रात:कमल के संपादक ब्रजेश कुमार व एमएसकेवी की प्राचार्या डा. ममता रानी संयुक्त रूप से करेंगी।'गांव जवार' संयोजक मंडल के सदस्य एम. अखलाक के अनुसार यह अबतक का सबसे बड़ा लोक जमघट होगा। इसकी विशेषता यह होगी कि सिर्फ ग्रामीण कलाकार ही अपनी प्रस्तुति देंगे, जबकि शहर के संस्कृतिकर्मी इनकी मेजबानी करेंगे। यही नहीं बिहार में यह ग्रामीण कलाकारों का पहला नेटवर्क है। यह जनसंगठन की तरह काम करेगा। भविष्य में इसका विस्तार उत्तर बिहार के अन्य जिलों में भी होगा। उन्होंने बताया कि ग्रामीण कलाकार खुद संसाधन जुटाकर इस आयोजन को अंजाम दे रहे हैं। यही नहीं ग्रामीण इलाकों से आने वाले कला -प्रेमियों व कलाकारों के लिए यहां भोजन की भी व्यवस्था की गयी है।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

रथयात्रा व रामलीला देख जागा भिखारी का कलाकार

यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि भिखारी ठाकुर का कलाकार मन आखिर जागा कैसे? वाक्या कुछ यूं है- किशोरावस्था में ही उनका विवाह मतुरना के साथ हो गया था। लुक-छिपकर वह नाच देखने चले जाते थे और नृत्य-मंडलियों में छोटी-मोटी भूमिकाएं भी अदा करने लगे थे। पर, मां-बाप को यह कतई पसंद न था। एक रोज गांव से भागकर वह खडग़पुर जा पहुंचे और इधर-उधर का काम करने लगे। मेदिनीपुर जिले की रामलीला और जगन्नाथपुरी की रथयात्रा देख-देखकर उनके भीतर का सोया कलाकार फिर से जाग उठा। फिर वे जब गांव लौटे तो कलात्मक प्रतिभा और धार्मिक भावनाओं से पूरी तरह लैस थे। परिवार के विरोध के बावजूद नृत्य मंडली का गठन कर वह शोहरत की बुलंदियों को छूने लगे। तीस वर्ष की उम्र में उन्होंने विदेसिया की रचना की, फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। जन-जन की जुबान पर बस एक ही नाम गूंजने लगा- भिखारी ठाकुर!उत्तर बिहार के छपरा शहर से लगभग दस किलोमीटर पूर्व में चिरान नामक स्थान के पास कुतुबपुर गांव में भिखारी ठाकुर का जन्म पौष मास शुक्ल पंचमी संवत् 1944 तद्नुसार 18 दिसंबर, 1887 (सोमवार) को दोपहर बारह बजे शिवकली देवी और दलसिंगार ठाकुर के घर हुआ था। अब भी अपनी दीन-हीन दशा पर आंसू बहाता खड़ा है कुतुबपुर गांव, जो कभी भोजपुर (शाहाबाद) जिले में था, पर गंगा की कटान को झेलता सारण (छपरा) जिले में आ गया है। इसी गांव के पूर्वी छोर पर स्थित है भिखारी ठाकुर का पुश्तैनी, कच्चा, पुराना, खपरैल मकान।अपने मां-बाप की ज्येष्ठ संतान भिखारी ने नौ वर्ष की अवस्था में पढ़ाई शुरू की। एक वर्ष तक तो कुछ भी न सीख सके। साथ में छोटे भाई थे बहोर ठाकुर। बाद में गुरु भगवान से उन्होंने ककहरा सीखा और स्कूली शिक्षा अक्षर-ज्ञान तक ही सीमित रही। बस, किसी तरह टो-टाकर वह रामचरित मानस पढ़ लेते थे। वह कैथी लिपि में ही लिखते थे, जिसे दूसरों के लिए पढ़ पाना मुश्किल होता था। पर, लेखन की मौलिक प्रतिभा उनमें जन्मजात थी। इस प्रकार, शिक्षा में वह कबीर की श्रेणी में आते हैं।वर्ष 1938 से 1962 के मध्य भिखारी ठाकुर की लगभग तीन दर्जन पुस्तिकाएं छपीं, जिन्हें फुटपाथों से खरीदकर लोग चाव से पढ़ा करते थे। अधिकतर पुस्तिकाएं दूधनाथ प्रेस, सलकिया (हावड़ा) और कचौड़ी गली (वाराणसी) से प्रकाशित हुई थीं। नाटकों व रूपकों में बहरा बहार (विदेसिया), कलियुग प्रेम (पियवा नसइल), गंगा-स्नान, बेटी वियोग (बेटी बेचवा), भाई विरोध, पुत्र-वधू, विधवा-विलाप, राधेश्याम बहार, ननद-भौजाई, गबरघिचोर आदि मुख्य हैं।समालोचक महेश्वराचार्य ने पहले 1964 में जनकवि भिखारी ठाकुर, फिर 1978 में परिवद्र्धित संस्करण भिखारी की रचना की। बाद में उन्होंने समालोचनात्मक मोनोग्राफ भी लिखा। प्रख्यात कथाकार संजीव ने भी भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित सूत्रधार उपन्यास की रचना की है। मगर, आलोचना-समालोचना से परे सादा जीवन, उच्च विचार की जीवंत प्रतिमूर्ति थे भिखारी ठाकुर। रोटी, भात, सत्तू-जो भी मिल जाता, ईश्वर का प्रसाद मानकर प्रेमपूर्वक ग्र्रहण करते थे। भोजन के बाद गुड़ वे शौकिया खाते थे। बिना किनारी की धोती, छह गज की मिरजई, सिर पर साफा और पैरों में जूता उनका पहनावा था। उनकी दिली तमन्ना थी-सदा भिखारी रहसु भिखारी!10 जुलाई, 1971 (शनिवार) को चौरासी वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ। राय बहादुर का खिताब, बिहार सरकार से ताम्रपत्र, जिलाधिकारी (भोजपुर) से शील्ड, विदेसिया फिल्म से प्रसिद्धि और जनता में अभूतपूर्व लोकप्रियता मिलने के बाद भी आजीवन कोई अहम् भाव नहीं। दरवाजे के सामने जमीन पर चटाई बिछाकर बैठे रहते, अपने आपको सबसे छोटा आदमी मानकर चलते और उम्र में छोटा हो या बड़ा, सबका हाथ जोड़कर ही अभिवादन किया करते थे। महापंडित राहुल जी ने भिखारी को जहां भोजपुरी का शेक्सपीयर व अनगढ़ हीरा कहा, वहीं जगदीशचंद्र माथुर ने उन्हें भरतमुनि की परंपरा का (प्रथम) लोकनाटककार माना। भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी को अभूतपूर्व ऊंचाई, गहराई व विस्तार दिया। खांटी माटी और जनजीवन से गहरा जुड़ा उनका साहित्य जनसामान्य का कंठहार बन गया तथा भोजपुरी व भिखारी- दोनों एक-दूसरे के पूरक-से हो गए। अपनी नृत्य मंडली के माध्यम से भिखारी धूमकेतु की तरह छा गए और ज्यों-ज्यों वक्त गुजरता जा रहा है, भिखारी के व्यक्तित्व-कृतित्व की चमक और बढ़ती जा रही है। गोस्वामी तुलसीदास व कबीर की तरह यदि लोकभाषा के किसी कवि-कलाकार को संपूर्ण उत्तर भारत के जन-जन में प्रचंड लोकप्रियता मिली, तो वह थे भिखारी ठाकुर। भिखारी का अभ्युदय उस समय हुआ, जब देश की आम जनता विदेशियों की त्रासद दासता झेलने के साथ ही अज्ञानता, सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास व रूढिय़ों की बेडिय़ों में बुरी तरह जकड़ी हुई थी। सर्वाधिक बुरी स्थिति नारियों की थी, जो खूंटे से बंधी गाय की तरह बाल विवाह, बेमेल विवाह का शिकार हो, विधवा का जीवन जीने को अभिशप्त थीं। भिखारी ने अत्यंत निर्धन परिवार में जन्म लेकर न सिर्फ समाज के दबे-कुचले वर्ग का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि मुख्य रूप से आधी आबादी की बदहाली को ही अपनी सृजनधर्मिता का विषय बनाया। वह लोकभाषा की अकूत क्षमता से बखूबी परिचित थे, तभी तो निरक्षर होने के बावजूद जन-जन तक पहुंचने के लिए उन्होंने अपनी मातृभाषा भोजपुरी में न केवल सबसे पहले लोक नाटकों का प्रभावोत्पादक प्रणयन व मंच-प्रस्तुति की, वरन लोकशैली विदेसिया के प्रवर्तक केरूप में भी प्रख्यात हुए। लोकनाटककार, जनकवि, अभिनेता, निर्देशक, सूत्रधार आदि अनेक मौलिक गुणों से संपन्न भिखारी सबसे पहले मनुष्य थे- मनुष्यता की कसौटी पर खरे उतरने वाले अप्रतिम कलाकार।

रिपोर्ट - एम अखलाक

बुधवार, 11 नवंबर 2009

भूखा है दुनिया का हर छठा आदमी

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि दुनिया में भुखमरी बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया की सभी सरकारों व नागरिक संगठनों से भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए हर संभव कोशिश करने की अपील की है। एक आकलन के मुताबिक दुनिया में गरीबी के चलते एक अरब से ज्यादा लोगों को रोज भूखा सोना पड़ता है। वैश्विक भुखमरी से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम [डब्ल्यूएफपी] और मिलेनिया विलेज प्रोजेक्ट [एमवीपी] आपसी भागीदारी पर सहमत हो गए है हैं। डब्ल्यूएफपी की प्रमुख जोसेट शीरान ने बताया, 'दुनिया में भूखे लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है। यह सहस्राब्दि विकास लक्ष्य [मिलेनियम डेवलपमेंट गोल] के लिए सबसे बड़ा खतरा है। वर्तमान में इस धरती पर हर छह में एक व्यक्ति भूखा जागता है। यह दावा भी नहीं किया जा सकता कि शाम तक वह खुद के लिए खाना जुटा पाएगा या नहीं। जब दुनिया में एक अरब लोग भूखे सोते और जागते हों तो तत्काल निर्णय लेना जरूरी हो जाता है।' शीरान ने भोजन सीधे किसान से खरीदे जाने पर जोर दिया। उनका कहना है कि 'बाजार से दूर किसानों से खाद्यान्न खरीदना उनकी भूख के कुचक्र को तोड़ने का सबसे प्रभावशाली तरीका हो सकता है। डब्ल्यूएफपी ने भूख की समस्या से जूझ रहे देशों की मदद के लिए नियमों में काफी बदलाव किया है। यह विकासशील देशों के किसानों से खाद्य आपूर्ति का 80 फीसदी हिस्सा खरीदती है।' शीरान के मुताबिक विकासशील देशों में 70 फीसदी किसान महिलाएं हैं। एमवीपी ने भुखमरी से सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में महिलाओं व बच्चों को कुपोषण मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। वैज्ञानिक शोधों से भी स्पष्ट है कि दो साल से कम उम्र के बच्चे को पर्याप्त पोषण नहीं मिलने पर उसके मस्तिष्क और शरीर का विकास नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र महासभा के उद्घाटन भाषण में हिलेरी क्लिंटन ने दुनिया से भुखमरी खत्म करना ओबामा प्रशासन का प्रमुख लक्ष्य बताया था।

भारतीय बच्‍चे कुपोषण के शिकार

भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के ऐसे बच्चों की संख्या काफी अधिक है जिनका कुपोषण के कारण विकास अवरुद्ध हो गया है। यूनीसेफ की ताजा रपट के अनुसार विकासशील दुनिया में पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग 20 करोड़ ऐसे बच्चे हैं जिनका कुपोषण के कारण विकास अवरुद्ध हो गया है। बाल विकास एवं मातृत्व पोषण प्रगति स्थिति रपट के अनुसार बच्चों का विकास अवरुद्ध होने का प्रधान कारण बचपन में कुपोषण रहा है। यह पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में एक तिहाई मौतों का प्रमुख कारण भी है। भारत में पांच वर्ष से कम आयु वर्ग में कम वजन वाले बच्चों की संख्या भी अधिक है। इसके अलावा दुनिया में विभिन्न कारणों से मौत का सामना करने वाले बच्चों की एक तिहाई संख्या भारत में है। रपट के अनुसार विकासशील देशों में प्रति वर्ष जन्मे कम वजन वाले 1.9 करोड़ बच्चों में 74 लाख बच्चे भारत के होते हैं, जो सर्वाधिक है। संयुक्त राष्ट्र की रपट के अनुसार विकासशील विश्व के 80 प्रतिशत अविकसित बच्चे 24 देशों में रह रहे हैं। यूनिसेफ प्रमुख एन्न एम वेनेमैन ने कहा कि कुपोषण के कारण बच्चे की शक्ति क्षीण हो जाती है और वह बीमार हो जाता है जिसके कारण शरीर और जीर्ण शीर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा, न्यूमोनिया, डायरिया और अन्य रोगों के कारण जिन बच्चों की मौत होती है उनमें से एक तिहाई से अधिक बच्चें अगर कुपोषण का शिकार नहीं होते तो उन्हें बचाया जा सकता था। भारत में कुपोषण के कारण अविकसित बच्चों की अधिक संख्या का कारण देश की आबादी अधिक होना है। कुपोषण के कारण अविकसित बच्चों की व्यापकता के मामले में अफगानिस्तान पहले नंबर पर है जबकि भारत का स्थान 12वां है। पांच वर्ष के कम आयु वर्ग के कम वचन वाले बच्चों की व्यापकता के संदर्भ में 17 देशों में यह दर 30 प्रतिशत से अधिक है। इस श्रेणी में अधिक व्यापकता दर वाले देशों में बांग्लादेश, भारत, तिमोर लेस्ते और यमन शामिल है जहां कम वजन वाले बच्चों की व्यापकता दर 40 प्रतिशत से अधिक है। रपट में कहा गया है कि पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों में विकासशील देशों में 13 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जो विभिन्न कारणों से मौत का सामना कर रहे हैं। इसमें पांच प्रतिशत बच्चों की स्थिति गंभीर है।