सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना

LATEST:


गुरुवार, 14 जनवरी 2010

लोक जमघट में जुटेंगे एक हजार लोक गायक

मुजफ्फरपुर : लोक कलाकार सफदर हाशमी और भिखारी ठाकुर की याद में रविवार को 'गांव जवार' सांस्कृतिक संगठन के बैनर तले एक हजार ग्रामीण कलाकार जिला स्कूल मैदान में जुटेंगे।'लोक जमघट' नामक यह सांस्कृतिक आयोजन सुबह 9 बजे प्रारंभ हो जायेगा और शाम पांच बजे तक चलेगा। इसमें प्रत्येक प्रखंड के तीन-तीन चुनिंदा लोक गायक पारंपरिक लोकगीतों की प्रस्तुति देंगे। इनमें कई प्रस्तुतियां ऐसी होंगी जो अब लुप्त होती जा रही हैं। कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले कुल 50 लोक गायकों की सूची तैयार कर ली गयी है। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित कलाकार, कला प्रेमी, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकता, शिक्षाविद् और पंचायत प्रतिनिधि प्रस्ताव पारित कर 'बिहार की कला नीति 2004' को सूबे में शीघ्र लागू करने की मांग राज्य सरकार से करेंगे।इस जमघट का उद्घाटन सूबे के लघु सिंचाई मंत्री दिनेश प्रसाद कुशवाहा, आपदा प्रबंधन मंत्री देवेश चंद्र ठाकुर, सांसद व पूर्व मंत्री कैप्टन जयनारायण प्रसाद निषाद, जिला परिषद अध्यक्ष किरण देवी, पूर्व उपमहापौर विवेक कुमार, बेटी बचाओ आंदोलन के संयोजक अरुण कुमार सिंह, दैनिक जागरण के संपादकीय प्रभारी धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव, प्रात:कमल के संपादक ब्रजेश कुमार व एमएसकेवी की प्राचार्या डा. ममता रानी संयुक्त रूप से करेंगी।'गांव जवार' संयोजक मंडल के सदस्य एम. अखलाक के अनुसार यह अबतक का सबसे बड़ा लोक जमघट होगा। इसकी विशेषता यह होगी कि सिर्फ ग्रामीण कलाकार ही अपनी प्रस्तुति देंगे, जबकि शहर के संस्कृतिकर्मी इनकी मेजबानी करेंगे। यही नहीं बिहार में यह ग्रामीण कलाकारों का पहला नेटवर्क है। यह जनसंगठन की तरह काम करेगा। भविष्य में इसका विस्तार उत्तर बिहार के अन्य जिलों में भी होगा। उन्होंने बताया कि ग्रामीण कलाकार खुद संसाधन जुटाकर इस आयोजन को अंजाम दे रहे हैं। यही नहीं ग्रामीण इलाकों से आने वाले कला -प्रेमियों व कलाकारों के लिए यहां भोजन की भी व्यवस्था की गयी है।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

रथयात्रा व रामलीला देख जागा भिखारी का कलाकार

यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि भिखारी ठाकुर का कलाकार मन आखिर जागा कैसे? वाक्या कुछ यूं है- किशोरावस्था में ही उनका विवाह मतुरना के साथ हो गया था। लुक-छिपकर वह नाच देखने चले जाते थे और नृत्य-मंडलियों में छोटी-मोटी भूमिकाएं भी अदा करने लगे थे। पर, मां-बाप को यह कतई पसंद न था। एक रोज गांव से भागकर वह खडग़पुर जा पहुंचे और इधर-उधर का काम करने लगे। मेदिनीपुर जिले की रामलीला और जगन्नाथपुरी की रथयात्रा देख-देखकर उनके भीतर का सोया कलाकार फिर से जाग उठा। फिर वे जब गांव लौटे तो कलात्मक प्रतिभा और धार्मिक भावनाओं से पूरी तरह लैस थे। परिवार के विरोध के बावजूद नृत्य मंडली का गठन कर वह शोहरत की बुलंदियों को छूने लगे। तीस वर्ष की उम्र में उन्होंने विदेसिया की रचना की, फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। जन-जन की जुबान पर बस एक ही नाम गूंजने लगा- भिखारी ठाकुर!उत्तर बिहार के छपरा शहर से लगभग दस किलोमीटर पूर्व में चिरान नामक स्थान के पास कुतुबपुर गांव में भिखारी ठाकुर का जन्म पौष मास शुक्ल पंचमी संवत् 1944 तद्नुसार 18 दिसंबर, 1887 (सोमवार) को दोपहर बारह बजे शिवकली देवी और दलसिंगार ठाकुर के घर हुआ था। अब भी अपनी दीन-हीन दशा पर आंसू बहाता खड़ा है कुतुबपुर गांव, जो कभी भोजपुर (शाहाबाद) जिले में था, पर गंगा की कटान को झेलता सारण (छपरा) जिले में आ गया है। इसी गांव के पूर्वी छोर पर स्थित है भिखारी ठाकुर का पुश्तैनी, कच्चा, पुराना, खपरैल मकान।अपने मां-बाप की ज्येष्ठ संतान भिखारी ने नौ वर्ष की अवस्था में पढ़ाई शुरू की। एक वर्ष तक तो कुछ भी न सीख सके। साथ में छोटे भाई थे बहोर ठाकुर। बाद में गुरु भगवान से उन्होंने ककहरा सीखा और स्कूली शिक्षा अक्षर-ज्ञान तक ही सीमित रही। बस, किसी तरह टो-टाकर वह रामचरित मानस पढ़ लेते थे। वह कैथी लिपि में ही लिखते थे, जिसे दूसरों के लिए पढ़ पाना मुश्किल होता था। पर, लेखन की मौलिक प्रतिभा उनमें जन्मजात थी। इस प्रकार, शिक्षा में वह कबीर की श्रेणी में आते हैं।वर्ष 1938 से 1962 के मध्य भिखारी ठाकुर की लगभग तीन दर्जन पुस्तिकाएं छपीं, जिन्हें फुटपाथों से खरीदकर लोग चाव से पढ़ा करते थे। अधिकतर पुस्तिकाएं दूधनाथ प्रेस, सलकिया (हावड़ा) और कचौड़ी गली (वाराणसी) से प्रकाशित हुई थीं। नाटकों व रूपकों में बहरा बहार (विदेसिया), कलियुग प्रेम (पियवा नसइल), गंगा-स्नान, बेटी वियोग (बेटी बेचवा), भाई विरोध, पुत्र-वधू, विधवा-विलाप, राधेश्याम बहार, ननद-भौजाई, गबरघिचोर आदि मुख्य हैं।समालोचक महेश्वराचार्य ने पहले 1964 में जनकवि भिखारी ठाकुर, फिर 1978 में परिवद्र्धित संस्करण भिखारी की रचना की। बाद में उन्होंने समालोचनात्मक मोनोग्राफ भी लिखा। प्रख्यात कथाकार संजीव ने भी भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित सूत्रधार उपन्यास की रचना की है। मगर, आलोचना-समालोचना से परे सादा जीवन, उच्च विचार की जीवंत प्रतिमूर्ति थे भिखारी ठाकुर। रोटी, भात, सत्तू-जो भी मिल जाता, ईश्वर का प्रसाद मानकर प्रेमपूर्वक ग्र्रहण करते थे। भोजन के बाद गुड़ वे शौकिया खाते थे। बिना किनारी की धोती, छह गज की मिरजई, सिर पर साफा और पैरों में जूता उनका पहनावा था। उनकी दिली तमन्ना थी-सदा भिखारी रहसु भिखारी!10 जुलाई, 1971 (शनिवार) को चौरासी वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ। राय बहादुर का खिताब, बिहार सरकार से ताम्रपत्र, जिलाधिकारी (भोजपुर) से शील्ड, विदेसिया फिल्म से प्रसिद्धि और जनता में अभूतपूर्व लोकप्रियता मिलने के बाद भी आजीवन कोई अहम् भाव नहीं। दरवाजे के सामने जमीन पर चटाई बिछाकर बैठे रहते, अपने आपको सबसे छोटा आदमी मानकर चलते और उम्र में छोटा हो या बड़ा, सबका हाथ जोड़कर ही अभिवादन किया करते थे। महापंडित राहुल जी ने भिखारी को जहां भोजपुरी का शेक्सपीयर व अनगढ़ हीरा कहा, वहीं जगदीशचंद्र माथुर ने उन्हें भरतमुनि की परंपरा का (प्रथम) लोकनाटककार माना। भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी को अभूतपूर्व ऊंचाई, गहराई व विस्तार दिया। खांटी माटी और जनजीवन से गहरा जुड़ा उनका साहित्य जनसामान्य का कंठहार बन गया तथा भोजपुरी व भिखारी- दोनों एक-दूसरे के पूरक-से हो गए। अपनी नृत्य मंडली के माध्यम से भिखारी धूमकेतु की तरह छा गए और ज्यों-ज्यों वक्त गुजरता जा रहा है, भिखारी के व्यक्तित्व-कृतित्व की चमक और बढ़ती जा रही है। गोस्वामी तुलसीदास व कबीर की तरह यदि लोकभाषा के किसी कवि-कलाकार को संपूर्ण उत्तर भारत के जन-जन में प्रचंड लोकप्रियता मिली, तो वह थे भिखारी ठाकुर। भिखारी का अभ्युदय उस समय हुआ, जब देश की आम जनता विदेशियों की त्रासद दासता झेलने के साथ ही अज्ञानता, सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास व रूढिय़ों की बेडिय़ों में बुरी तरह जकड़ी हुई थी। सर्वाधिक बुरी स्थिति नारियों की थी, जो खूंटे से बंधी गाय की तरह बाल विवाह, बेमेल विवाह का शिकार हो, विधवा का जीवन जीने को अभिशप्त थीं। भिखारी ने अत्यंत निर्धन परिवार में जन्म लेकर न सिर्फ समाज के दबे-कुचले वर्ग का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि मुख्य रूप से आधी आबादी की बदहाली को ही अपनी सृजनधर्मिता का विषय बनाया। वह लोकभाषा की अकूत क्षमता से बखूबी परिचित थे, तभी तो निरक्षर होने के बावजूद जन-जन तक पहुंचने के लिए उन्होंने अपनी मातृभाषा भोजपुरी में न केवल सबसे पहले लोक नाटकों का प्रभावोत्पादक प्रणयन व मंच-प्रस्तुति की, वरन लोकशैली विदेसिया के प्रवर्तक केरूप में भी प्रख्यात हुए। लोकनाटककार, जनकवि, अभिनेता, निर्देशक, सूत्रधार आदि अनेक मौलिक गुणों से संपन्न भिखारी सबसे पहले मनुष्य थे- मनुष्यता की कसौटी पर खरे उतरने वाले अप्रतिम कलाकार।

रिपोर्ट - एम अखलाक

बुधवार, 11 नवंबर 2009

भूखा है दुनिया का हर छठा आदमी

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि दुनिया में भुखमरी बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया की सभी सरकारों व नागरिक संगठनों से भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए हर संभव कोशिश करने की अपील की है। एक आकलन के मुताबिक दुनिया में गरीबी के चलते एक अरब से ज्यादा लोगों को रोज भूखा सोना पड़ता है। वैश्विक भुखमरी से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम [डब्ल्यूएफपी] और मिलेनिया विलेज प्रोजेक्ट [एमवीपी] आपसी भागीदारी पर सहमत हो गए है हैं। डब्ल्यूएफपी की प्रमुख जोसेट शीरान ने बताया, 'दुनिया में भूखे लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है। यह सहस्राब्दि विकास लक्ष्य [मिलेनियम डेवलपमेंट गोल] के लिए सबसे बड़ा खतरा है। वर्तमान में इस धरती पर हर छह में एक व्यक्ति भूखा जागता है। यह दावा भी नहीं किया जा सकता कि शाम तक वह खुद के लिए खाना जुटा पाएगा या नहीं। जब दुनिया में एक अरब लोग भूखे सोते और जागते हों तो तत्काल निर्णय लेना जरूरी हो जाता है।' शीरान ने भोजन सीधे किसान से खरीदे जाने पर जोर दिया। उनका कहना है कि 'बाजार से दूर किसानों से खाद्यान्न खरीदना उनकी भूख के कुचक्र को तोड़ने का सबसे प्रभावशाली तरीका हो सकता है। डब्ल्यूएफपी ने भूख की समस्या से जूझ रहे देशों की मदद के लिए नियमों में काफी बदलाव किया है। यह विकासशील देशों के किसानों से खाद्य आपूर्ति का 80 फीसदी हिस्सा खरीदती है।' शीरान के मुताबिक विकासशील देशों में 70 फीसदी किसान महिलाएं हैं। एमवीपी ने भुखमरी से सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में महिलाओं व बच्चों को कुपोषण मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। वैज्ञानिक शोधों से भी स्पष्ट है कि दो साल से कम उम्र के बच्चे को पर्याप्त पोषण नहीं मिलने पर उसके मस्तिष्क और शरीर का विकास नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र महासभा के उद्घाटन भाषण में हिलेरी क्लिंटन ने दुनिया से भुखमरी खत्म करना ओबामा प्रशासन का प्रमुख लक्ष्य बताया था।

भारतीय बच्‍चे कुपोषण के शिकार

भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के ऐसे बच्चों की संख्या काफी अधिक है जिनका कुपोषण के कारण विकास अवरुद्ध हो गया है। यूनीसेफ की ताजा रपट के अनुसार विकासशील दुनिया में पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग 20 करोड़ ऐसे बच्चे हैं जिनका कुपोषण के कारण विकास अवरुद्ध हो गया है। बाल विकास एवं मातृत्व पोषण प्रगति स्थिति रपट के अनुसार बच्चों का विकास अवरुद्ध होने का प्रधान कारण बचपन में कुपोषण रहा है। यह पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में एक तिहाई मौतों का प्रमुख कारण भी है। भारत में पांच वर्ष से कम आयु वर्ग में कम वजन वाले बच्चों की संख्या भी अधिक है। इसके अलावा दुनिया में विभिन्न कारणों से मौत का सामना करने वाले बच्चों की एक तिहाई संख्या भारत में है। रपट के अनुसार विकासशील देशों में प्रति वर्ष जन्मे कम वजन वाले 1.9 करोड़ बच्चों में 74 लाख बच्चे भारत के होते हैं, जो सर्वाधिक है। संयुक्त राष्ट्र की रपट के अनुसार विकासशील विश्व के 80 प्रतिशत अविकसित बच्चे 24 देशों में रह रहे हैं। यूनिसेफ प्रमुख एन्न एम वेनेमैन ने कहा कि कुपोषण के कारण बच्चे की शक्ति क्षीण हो जाती है और वह बीमार हो जाता है जिसके कारण शरीर और जीर्ण शीर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा, न्यूमोनिया, डायरिया और अन्य रोगों के कारण जिन बच्चों की मौत होती है उनमें से एक तिहाई से अधिक बच्चें अगर कुपोषण का शिकार नहीं होते तो उन्हें बचाया जा सकता था। भारत में कुपोषण के कारण अविकसित बच्चों की अधिक संख्या का कारण देश की आबादी अधिक होना है। कुपोषण के कारण अविकसित बच्चों की व्यापकता के मामले में अफगानिस्तान पहले नंबर पर है जबकि भारत का स्थान 12वां है। पांच वर्ष के कम आयु वर्ग के कम वचन वाले बच्चों की व्यापकता के संदर्भ में 17 देशों में यह दर 30 प्रतिशत से अधिक है। इस श्रेणी में अधिक व्यापकता दर वाले देशों में बांग्लादेश, भारत, तिमोर लेस्ते और यमन शामिल है जहां कम वजन वाले बच्चों की व्यापकता दर 40 प्रतिशत से अधिक है। रपट में कहा गया है कि पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों में विकासशील देशों में 13 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जो विभिन्न कारणों से मौत का सामना कर रहे हैं। इसमें पांच प्रतिशत बच्चों की स्थिति गंभीर है।

सोमवार, 9 नवंबर 2009

प्रभाष जोशी की एक कृति मैं भी

प्रभाष जोशी जी की एक कृति मैं भी हूं। 1996-97 में जो के.के. बिड़ला फाउंडेशन फेलोशीप मुझे मिला उसके लिए मैंने पहले से आवेदन नहीं कर रखा था। पता नहीं उन्होंने मेरे में क्या खूबी देखी कि बुलाकर यह फेलोशीप दिलवा दी। यूं तो मैं छात्र जीवन से ही एक्टविस्ट था और पत्रकारिता में भी अभियानी पत्रकार के रूप में जाना जाता था, लेकिन इस फेलोशीप ने मेरी जीवनधारा पूरी तरह बदल दी और मैं एक्टविस्ट हो गया।पत्रकारिता के क्षेत्र में मैंने 'जनशक्ति' से 'जनसत्ता' तक का सफर तय किया है। जिस तरह फिराक गोरखपुरी के बारे में किसी ने कहा था कि आने वाली नस्लें तुम पर फक्र करेगी कि तुमने फिराक को देखा है। मैं भी उन खुशनसीब लोगों में से हूं जिसे प्रभाष जोशी के मातहत दो-ढाई साल काम करने का मौका मिला है। इन्हीं दिनों की दो-तीन घटनाओं का यहां जिक्र करना चाहता हूं। जनसत्ता के पटना कार्यालय में सुरेन्द्र किशोर जी हमारे सीनियर थे। एक दिन खबर आयी कि जोशी जी पटना आ रहे हैं। इसके पहले कभी मैं उनसे नहीं मिला था। सच पूछिए तो मैं काफी अंदर से डरा हुआ था। मगर जब वह कार्यालय आए और कंधे पर हाथ रखकर दुलारते हुए बातें की तो सारा डर फौरन काफूर हो गया। सुरेन्द्र जी ने अपनी कुर्सी पर उन्हें बैठाना चाहा मगर वह मेरे सामने रखी कुर्सी पर आकर बैठ गये। फिर वह हम दोनों को मौर्या होटल ले गये और वहां साथ में खाना भी खिलाया।दूसरी घटना मैं सुरेन्द्र किशोर जी के हवाले से सुनाना चाहता हूं। दिल्ली में देश भर के जनसत्ता ब्यूरोचीफ की बैठक से सुरेन्द्र जी पटना लौटे थे। उन्होंने खुशी पूर्वक सुनाया कि बैठक में जोशी जी ने कहा कि मैं यहां हिन्दू साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ रहा हूं तो पटना में हमारा संवाददाता अली अनवर मुस्लिम फिरकापरस्ती के खिलाफ कलम की लड़ाई लड़ रहा है। जाहिर है कि वह दौर अयोध्या विवाद और शिलापूजन का था जिसमें जोशी जी की लेखनी गरज रही थी। इधर मैंने भी खुदाबख्श लाइब्रेरी के डायरेक्टर बेदार साहब के खिलाफ मुस्लिम फंडामेनटलिस्टों द्वारा चलाये जा रहे अभियान के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था।तीसरी घटना को रांची की जनसत्ता संवाददाता वासवी के हवाले से आपको बताना चाहता हूं। वासवी जोशी जी से मिलकर लौटी थीं। वह लंबे समय से रांची में स्ट्रींगर थीं। स्टाफर बनाना चाहती थीं। जोशी जी ने कहा कि पटना में अनवर को भी स्टाफर बनाना है। तब जनसत्ता आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा था। जोशी जी मुझे और वासवी को स्टाफर नहीं बना सके। इसका मलाल उन्हें बराबर रहा। इसबीच मैंने स्वतंत्र भारत में नौकरी कर ली। इसमें रहते हुए ही जोशी जी ने मुझे के.के.बिड़ला फाउंडेशन फेलोशीप दिलवाया। एक साल के अध्ययन के बाद जब मेरी किताब 'मसावात की जंग' तैयार हुई तो उसे छपवाने से लेकर उसका विमोचन कराने तक जोशी जी पेश-पेश रहे। वह मुझे लेकर पूर्व प्रधानमंत्री बीपी सिंह के यहां गये। बीपी सिंह ने पटना के गांधी मैदान में हमारी किताब का विमोचन किया। उन दिनों यहां पुस्तक मेला लगा था। बीपी सिंह जी पिछले सात साल से पटना नहीं आये थे और मृत्युपर्यन्त वह कभी पटना नहीं आ सके। 2004 में जब मेरी दूसरी किताब 'दलित मुसलमान' आयी तो जोशी जी ने उसका भी विमोचन बीपी सिंह से दिल्ली के रामलीला मैदान में कराया। यहां मैं बताते चलूं कि अपनी दोनों पुस्तकों का विमोचन मैं जोशी जी से ही कराना चाहता था, लेकिन उन्होंने ही बीपी सिंह का नाम सुझाया और मुझे उसके लिए राजी किया।जोशी जी ने अपने सभी संगी साथियों के बीच मुझे मकबूल बना दिया था। अपने 'कागद कारे' कालम में भी कई बार मेरे जैसे अदना आदमी की चर्चा कर दी। उनके अचानक चले जाने से पसमांदा तहरीक को बहुत नुकसान हुआ है। मेरे सर से एक अभिभावक का हाथ हट गया है। हम उन्हें खराज-ए-अकीदत पेश करते हैं।

- अली अनवर अंसारी
(लेखक राज्यसभा सांसद हैं)

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

आरएसएस प्रमुख भागवत के नाम पत्र

जिन दिनों भाजपा सरकार के नेतृत्व वाले गुजरात में मजहब के नाम पर इंसानियत का कत्लेआम हो रहा था। लोगों को घरों में जिंदा इसलिए जलाया जा रहा था, क्योंकि वे मुसलमान थे। भाई-भाई को लहू का प्यासा बनाया जा रहा था। जिन दिनों बाबरी मस्जिद ढाहने का जश्न मनाया जा रहा था। देश को दंगे की आग में झोंका गया था..., उस दिन आरएसएस वाले मोहन भागवत आप कहां थे? क्या कर रहे थे? यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि इन दिनों आप बहुत बोलने लगे हैं - देश की सम्प्रभुता खतरे में है।
हिटलर के वंशज समझे जाने वाले आपकी बिरादरी से जनता जानना चाहती है कि क्या उन दिनों देश खतरे में नहीं था? संप्रभुता व अखंडता को खतरा नहीं था?आप कहते हैं कि बंग्लादेश से घुसपैठ हो रहा है। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि बंग्लादेशी घुसपैठियों से ज्यादा खतरनाक आरएसएस के गुंडे हैं जो देश में सांप्रदायिक उत्पात मचा रहे हैं? घुसपैठियों से तो भारतीय फौज निबट लेगी, लेकिन इन आस्तीन के सांपों से निबटने के लिए क्या किया जाये? आपके शब्दों में अगर बंग्लादेश से आतंकवादी भारत में घुस रहे हैं! तो क्या यह सच नहीं कि नेपाल के रास्ते सदियों से आतंकी देश घुसते आये हैं। जब वह हिन्दू राष्ट्र था, उस समय आपने नेपाल बार्डर सील करने की बात क्यों नहीं की?दूसरा मुद्दा आपने उठाया है नक्सलियों का। आप मानते हैं इन्हें गोलियों से भून दिया जाये। आपको अपनी इस सोच पर शर्म करना चाहिए। जिन्हें आप गोलियों से भून डालने के लिए सरकार को उकसा रहे हैं, वह गांव के गरीब हैं जिन्हें वर्षों से रोटी व रोजगार नसीब नहीं हुआ है। इन्हें आपके स्वयंसेवकों की तरह हथियार प्रदर्शन का शौक नहीं है। जरा सोचिए- आप पूजा के बहाने हथियार लहरा कर शक्ति प्रदर्शन करते हैं, कुर्सी हथियाने की सियासत करते हैं। और ये गरीब रोटी के लिए हथियार उठाते हैं, पकड़े जाने पर जेल भी जाते हैं। श्रीमान, कोई मां के पेट से बंदूक लेकर पैदा नहीं होता, और ना ही कोई बंदूक उठाना चाहता है। यह तो आप जैसे अद्र्ध सामंतों की देन है कि गरीब बंदूक उठा रहे हैं। आप व्यवस्था की खामियों को दूर करने की सियासत करते तो शायद इनके हित में होता। लेकिन आपको मंदिर, मस्जिद से फुर्सत कहां? आपको तो लोगों की लाश पर राजनीति करने में मजा आता है।

(पिछले दिनों बिहार के समस्तीपुर व मध्यप्रदेश के जबलपुर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिये गये भाषण पर एक प्रतिक्रिया)

सोमवार, 2 नवंबर 2009

ठाकरे तुम्हारे बाप की है मुंबई?

देश तोडऩे और सांप्रदायिक फसादों के लिए कुख्यात बर्बरता की ढाल ठाकरे उर्फ बाल ठाकरे के भतीजा राज ठाकरे ने एक बार फिर अपने चुतियापे का परिचय दिया है। उसने कहा है कि महाराष्ट्र में जो नये विधायक चुनकर आये हैं उन्हें मराठी में ही शपथ लेना होगा। यह धमकी उसने इस अंदाज में दी है जैसे महाराष्ट्र उसके बाप का है! इस हरामखोर ने यह भी धमकी दी है कि 'सिर्फ मराठी में' शपथ नहीं लेने पर नये विधायकों को मनसे विधायकों के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। लगता है शपथ-ग्रहण समारोह विधानसभा के बजाये उसकी मां के .... में होने जा रहा है।ठाकरे इस तरह का चुतियापा क्यों कर रहा है? मुझे लगता है इस सवाल का जवाब उन तमाम लोगों को मालूम है जो हर दिन गुनगुनाते हैं- सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा। हिन्दी हमारी हिन्दोस्तान में रहने वाले लोगों की जुबान है। मराठी और अन्य भाषाएं उसकी बहन स्वरूप हैं। किसी को मराठी बोलने के लिए बाध्य करना न सिर्फ फांसीवादी मानसिकता का परिचायक है, बल्कि देश को तोडऩे और तबाह करने की विदेशी साजिश है। इस हरामखोर की औलाद ठाकरे बंधुओं को कोई यह समझाये कि यदि हिन्दी फिल्मों का कारोबार मुंबई में नहीं होता तो क्या मुंबई सुर्खियों में होती? उसे आज जो सम्मान है, क्या मिल पाता? कोई इन ठाकरे बंधुओं से पूछे - मुंबई को दिया क्या है? जवाब मैं बता रहा हूं- इन्होंने दिया है दाउद इब्राहिम, आतंकवाद, मुंबई ब्लास्ट, दंगा-फसाद आदि? यानी यहां जो कुछ अमानवीय है, ठाकरे बंधुओं की देन है।
और अंत में, आईए ठाकरे बंधुओं को उन्ही की भाषा में जवाब देकर देश की अखंडता की हिफाजत करें।